June 21, 2021

Nishpaksh Dastak

Nishpaksh Dastak

शरीर,बुद्धि,चेतना एवं आत्मा का विज्ञान योग

परमहंस स्वामी महेश्वरानंद

हर मानव की इच्छा स्वयं से और पर्यावरण से समरस होकर जीवित रहने की है। तथापि आधुनिक युग में अधिक शारीरिक और भावात्मक इच्छायें लगातार जीवन के अनेक क्षेत्रों पर भारी हो रही हैं। परिणामत: अधिकाधिक व्यक्ति खिंचाव, चिंता, अनिद्रा जैसे शारीरिक और मानसिक तनावों से पीडि़त रहते हैं और शारीरिक सक्रियता और उचित व्यायाम में एक असंतुलन बन गया है। यही कारण है कि स्वस्थ बने रहने और उसमें सुधार के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक समरसता बनाए रखने के लिए नई नई विधियों और तकनीकों का महत्व बढ़ गया है और इसी भावना से ”दैनिक जीवन में योग” पुस्तक व्यक्ति के स्व में सहायता के लिए विशुद्ध रूप से सामग्री प्रस्तुत करती है।

मैने पश्चिमी देशों में बहुत वर्ष सक्रियता से बिताए हैं। मैं आधुनिक जीवन पद्धति और आज के लोगों के सम्मुख विद्यमान शारीरिक और मनौवैज्ञानिक समस्याओं से भलीभाँति परिचित हो गया हूँ। जो ज्ञान और अनुभव मुझे प्राप्त हुआ उससे मुझे “दैनिक जीवन में योग की प्रणाली विकसित करने का अवसर मिला। यह प्रणालीबद्ध और क्रमिक है जिसमें जीवन के हर मौके के लिए कुछ मूल्यवान अवसरों और जीवन के सभी क्षेत्रों को एकत्र किया है। आयु या शारीरिक बनावट का ख्याल न करते हुए प्रणाली सभी लोगों के लिए योग का श्रेष्ठ पथ खोलती है। आज के व्यक्तियों की आवश्यकताओं को समाविष्ट करने के लिए इस प्रणाली को विकसित करते समय आधुनिक समाज में मौजूद स्थितियों पर ध्यान दिया गया था। ऐसा करते समय प्राचीन शिक्षाओं के मूल स्वरूप और प्रभाव को भी अनदेखा नहीं किया गया।

“योग” शब्द का उद् गम संस्कृत भाषा से है और इसका अर्थ “जोडऩा, एकत्र करना” है। योगिक व्यायामों का एक पवित्र प्रभाव होता है और यह शरीर, मन, चेतना और आत्मा को संतुलित करता है। योग हमें दैनन्दिन की माँगों, समस्याओं और परेशानियों का मुकाबला करने में सहायक होता है। योग स्वयं के बारे में समझ, जीवन का प्रयोजन और ईश्वर से हमारे संबंध की जानकारी विकसित करने के लिए सहायता करता है। आध्यात्मिक पथ पर योग हमको ब्रह्माण्ड के स्व के साथ वैयक्तिक स्व के शाश्वत परमानंद मिलन और सर्वोच्च ज्ञान को प्रशस्त करता है। योग सर्वोच्च ब्रह्मांडमय सिद्धान्त है। यह जीवन का प्रकाश, विश्व की सृजनात्मक चेतना है जो सदैव सजग रहती है और कभी सोती नहीं; जो हमेशा थी, हमेशा है और हमेशा होगी-रहेगी।

योगी को दिल्ली किया गया तलब

हजारों वर्ष पहले भारत में ऋषियों (बुद्धिजीवियों और संतों) ने अपनी ध्यानावस्था में प्रकृति और ब्रह्माण्ड की खोज की थी। उन्होंने भौतिक और आध्यात्मिक शासनों के कानूनों का पता किया था और विश्व में संबंधों की अंतर्दृष्टि प्राप्त की थी। उन्होंने ब्रह्माण्ड के नियमों, प्रकृति के नियम और तत्त्वों, धरती पर जीवन और ब्रह्माण्ड में कार्यरत शक्तियों और ऊर्जाओं-बाह्य संसार और आध्यात्मिक स्तर दोनों पर ही, जांच की थी। पदार्थ और ऊर्जा की एकता, ब्रह्माण्ड का उद् गम और प्राथमिक शक्तियों के प्रभावों का वर्णन और स्पष्टीकरण वेदों में किया गया है। इस ज्ञान का पर्याप्त अंश पुन: खोजा गया और आधुनिक विज्ञान द्वारा उसकी पुष्टि-सत्य अनुभूति की गई है।

इन अनुभवों और अंतर्दृष्टियों से एक अति दूरगामी और योग नाम से ज्ञात प्रणाली प्रारम्भ हुई और उसने हमको शरीरिक स्वास्थ्य, श्वास एकाग्रचित्तता, तनावहीनता और ध्यान के लिए व्यवहारिक अनुदेश दिए हैं। इस पुस्तक में जो अभ्यास प्रस्तुत किए गए हैं, वे पिछले हजारों वर्षों में सत्य सिद्ध हुए हैं और उन्हें लाखों-करोड़ों लोगों ने सहायक एवं लाभदायक पाया है।

”दैनिक जीवन में योग” पद्वति विश्वव्यापी योग केन्द्रों, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों, स्वास्थ्य संस्थाओं, दक्षता और खेलकूद (Fitness & Sports Clubs), पुनस्र्थापन केन्द्रों और स्वास्थ्य विहारों (Health Resorts) में सिखाई जाती है। यह सभी आयु वर्गों के लिए समीचीन, उपयुक्त है -इसके लिए किसी ”करतबी” बुद्धि की आवश्यकता नहीं है और यह अयोग्य, विकलांग, बीमार और स्वास्थ्य लाभ करने वाले सभी व्यक्तियों को योगाभ्यास करने की संभावना प्रदान करती है। इसका नाम स्वयं इस बात का द्योतक है कि योग का प्रयोग “दैनिक जीवन में” किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए।

व्यायाम स्तरों का निर्धारण चिकित्सकों से परामर्श के बाद किए गये हैं और इस प्रकार-कथित नियमों और सावधानियों के पर्यवेक्षण के साथ-किसी भी व्यक्ति द्वारा घर पर स्वतंत्र रूप से अभ्यास किया जा सकता है। “दैनिक जीवन में योग” एक पुण्यप्रदा देने वाली प्रणाली है जिसका अर्थ है कि इसमें न केवल शारीरिक, अपितु मानसिक और आध्यात्मिक पक्षों पर भी विचार किया जा सकता है। सार्थक-सकारात्मक विचार, दृढ़ता, अनुशासन, सर्वोच्च के प्रति अभिविन्यास, प्रार्थना के साथ-साथ दयालुता और समझ, आत्मज्ञान और आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।