नेहरू-शास्त्री के दौर को यूपी बोर्ड ने हटाया

यूपी बोर्ड ने नेहरू-शास्त्री के दौर को सिलेबस से हटाया, कांग्रेस ने दी आंदोलन करने की धमकी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष लल्लू ने कहा कि अगर बच्चे इस देश के इतिहास से वाकिफ नहीं रहेंगे तो वह नेहरू, शास्त्री जैसे महान नेताओं के बारे में कैसे जानेंगे, ये सब सरकार के इशारे पर किया जा रहा है।

प्रशांत श्रीवास्तव

लखनऊ, उत्तर प्रदेश के बोर्ड ऑफ हाई स्कूल एंड इंटरमीडिएट एजुकेशन ने 9वीं से 12वीं तक के सिलेबस में 30% तक कटौती कर दी है. सिलेबस से कांग्रेस के इतिहास के कई अहम हिस्से को भी हटाने का निर्णय लिया गया है, जिनमें जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री के दौर समेत 1971 के चुनावों में जीत से जुड़ा पूरा अध्याय शामिल है।

इस फैसले के बाद प्रदेश के कांग्रेसी नेता गुस्से में हैं और उन्होंने इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने की धमकी भी दी है।पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अनिल शास्त्री ने सीएम योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को पत्र लिखकर कांग्रेस के इतिहास से जुड़े अध्याय फिर से जोड़ने की अपील की है।इस मसले पर अनिल शास्त्री ने दिप्रिंट से कहा, ‘देश के बच्चे अगर नेहरू-शास्त्री को नहीं जानेंगे तो वे इतिहास के बारे में क्या सीखेंगे।’

प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय लल्लू ने कहा है कि अगर सरकार इस चिट्ठी का संज्ञान नहीं लेती है तो वे इस मुद्दे पर आंदोलन करेंगे, उन्होंने कहा कि सिलेबस में राहत देने का मतलब ये नहीं की कांग्रेस का इतिहास उससे हटा दिया जाए।

लल्लू ने कहा कि अगर बच्चे इस देश के इतिहास से वाकिफ नहीं रहेंगे तो वह नेहरू, शास्त्री जैसे महान नेताओं के बारे में कैसे जानेंगे, ये सब सरकार के इशारे पर किया जा रहा है. यूपी कांग्रेस इसका खुलकर विरोध करेगी।वहीं प्रयागराज के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं ने भी यूपी बोर्ड को पत्र लिखकर इसे वापस शामिल करने की मांग की है।

बता दें कि यूपी बोर्ड देश का सबसे बड़ा बोर्ड माना जाता है, हाई स्कूल व इंटर को मिलाकर यहां 50 लाख से अधिक छात्र पढ़ते हैं और प्रदेश भर में 8 हजार से अधिक स्कूल हैं।

सिलेबस से महत्वपूर्ण हिस्सों को हटाया गया

यूपी बोर्ड की ओर से पिछले दिनों घोषणा की गई थी कि कोरोना महामारी के कारण अकादमिक कैलेंडर छोटा हुआ है इस कारण सिलेबस को कम किया गया है।दरअसल यूपी बोर्ड के 12वीं क्लास में नागरिक शास्त्र (राजनीति विज्ञान) से स्वतंत्र भारत में राजनीति नाम की यूनिट जिसे खंड ‘ख’ कहते हैं उसके चैप्टर पांच से एक दल (कांग्रेस) के प्रभुत्व का दौर: प्रथम तीन आम चुनाव, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के प्रभुत्व की प्रकृति, कांग्रेस की गठबंधीय प्रकृति को हटा दिया गया है।

वहीं इसी यूनिट के छठे अध्याय से कांग्रेस कार्यप्रणाली की चुनौतियां से लेकर नेहरू के बाद की राजनीतिक परिपाटीगैर कांग्रेसवाद, 1967 का चुनाव, कांग्रेस का विभाजन एवं पुनर्गठन, कांग्रेस की 1971 के चुनावों में जीत का अध्याय भी हटा दिया गया है।

केवल नागरिक शास्त्र में ही नहीं बल्कि अन्य विषयों का भी सिलेबस कम किया गया है।

अंग्रेजी विषय में शेक्सपियर का नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस ‘ को हटाया गया है वहीं हिंदी से लोकप्रिय व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के निंदा रस को कम किया गया है।

10वीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान से चुनावी राजनीति स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव  का हिस्सा हटाया गया है वहीं 11वीं के नागरिक शास्त्र से चुनावी राजनीति और चुनाव सुधार को हटाया गया।हैइतिहास की पुस्तक से नाजीवाद और हिटलर का उदय  और हड़प्पा सभ्यता जैसे विषय हटाए गए हैं।

माध्यमिक शिक्षा परिषद के सचिव दिव्या कांत शुक्ला ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि सिलेबस से ये टॉपिक हटाया गया है न कि किताबों से, जो इसे पढ़ना चाहते हैं उनके लिए ये उपलब्ध है।

उनका कहना है कि कोरोना महामारी के कारण बच्चों की कक्षाों का नुकसान हुआ इसी कारण उनके एग्जाम्स के लिए कोर्स कम किया गया है, उन्होंने कहा कि आपत्तियों का स्वागत है और उन पर विचार किया जाएगा।

लाल बहादुर शास्त्री और जवाहर लाल नेहरू. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

ये सब साजिश के तहत किया गया: अनिल शास्त्री

कांग्रेस नेता अनिल शास्त्री ने कहा, ‘उनके पिता लाल बहादुर शास्त्री व परिवार की ईमानदारी के कसीदे लोग पढ़ते हैं । उनकी मां ने शास्त्री जी की मृत्यु के बाद पेंशन से कार का लोन चुकाया था. ये सब नई पीढ़ी के लिए सीखने वाली बातें हैं जो कोर्स से हटाई गई हैं।’

उनका कहना है कि ये सब साजिश के तहत किया गया है, उन्होंने कहा कि केंद्र एवं प्रदेश सरकार शैक्षिक पाठ्यक्रम से आजादी के इतिहास से लेकर देश निर्माण में कांग्रेस के योगदान को खत्म करना चाहती है।शास्त्री ने कहा कि सरकार की मंशा साफ है वरना इतने अहम चैप्टर्स कैसे कम किए जा सकते हैं, अगर बच्चे पहले तीन आम चुनाव के बारे में ही नहीं जानेंगे तो भला कैसे वे देश के चुनावी इतिहास को समझेंगे।