प्रशांत भूषण को सजा देने के मामले में 24 अगस्त को फैसला

भारत में सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भी बोलने की आजादी है। कौन कहता है विरोध की आवाज दबाई जा रही है…?

अब आरोप लगाने वाले वकील प्रशांत भूषण को सजा देने में भी झिझक। साधारण मामलों में कोर्ट अब तक जेल भेज देती। जिन लोगों को लगता है कि भारत में विरोध की आवाज दबाई जा रही है, उन्हें वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की बोलने की आजादी को समझना चाहिए। प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की ईमानदारी पर शक करने वाला ट्वीट किया। इस पर वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे के प्रस्ताव पर भूषण के खिलाफ कोर्ट की अवमानना करने का मामला दर्ज किया। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यी बैंच ने माना कि प्रशांत भूषण अवमानना के दोषी है। सजा का ऐलान करने से पहले बैंच ने भूषण के समक्ष माफी मांगने का प्रस्ताव रखा। बैंच का कहना है कि यदि भूषण माफी मांग लेते हैं तो मामले को समाप्त कर दिया जाएगा। लेकिन भूषण ने माफी मांगने से साफ इंकार कर दिया। लेकिन इसके बावजूद भी बैंच ने भूषण को तीन दिन का समय दिया, ताकि वे माफी मांगने पर विचार कर सकें।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एडवोकेट प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक ट्वीट के लिए क्षमा याचना से इंकार करने वाले बयान पर पुनर्विचार करने और बिना शर्त माफी मांगने के लिए 24 अगस्त तक का समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को उनके दो ट्वीटों के कारण अवमानना का दोषी माना है।

अब इस मामले में 24 अगस्त को सुनवाई होगी। न्यायिक इतिहास में पहला अवसर होगा, जब दोषी पाए जाने के बाद भी देश की सर्वोच्च अदालत दोषी व्यक्ति से ही माफी मांगने का आग्रजह कर रही है। वह भी तब जब सर्वोच्च अदालत के पांच जजों की ईमानदारी पर शक किया गया है। देश में इससे ज्यादा विरोध करने की और क्या आजादी हो सकती है? सवाल यह नहीं है कि पूर्व में भी चार जजों ने देश के प्रधान न्यायाधीश के काम काज पर अंगुली उठाई थी। असल बात यह है कि भारत में कोई किसी की आवाज नहीं दबा रहा। सुप्रीम कोर्ट के चार जज अपने ही प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ बोल सकते हैं तो एक वरिष्ठ वकील सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की ईमानदारी पर शक करने वाला बयान दे सकता है।

दुनिया के किसी भी देश में विरोध की ऐसी आजादी सुनने और देखने को नहीं मिलती। जब सुप्रीम कोर्ट के जजों को ही नहीं बख्शा जा रहा है, तब प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तो कोई स्थिति ही नहीं है। इतनी आजादी के बाद कुछ लोगों को लगता है कि भारत में विरोध की आवाज को दबाया जा रहा है। आखिर विरोध करने वालों को और कितनी आजादी चाहिए। गंभीर बात यह है कि लोकतंत्र की दुहाई देकर देश की संवैधानिक संस्थाओं पर हमला किया जा रहा है। यदि सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था ही सुरक्षित नहीं रहेगी तो फिर देश का क्या होगा? प्रशांत भूषणा जैसे लोग चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट भी उन्हीं की मंशा के अनुरूप फैसला दे। यदि फैसला नीहं आया तो फैसला देने वाले जजों की ईमानदारी पर शक किया जाएगा। इसे सुप्रीम कोर्ट की मजबूरी ही कहा जाएगा कि दोषी घोषित करने के बाद भी पूरी बंच प्रशांत भूषण के सामने गिड़गिड़ा रही है।

24 अगस्त को यदि भूषण को सजा सुनी भी दी जाती है तो उसकी क्रियान्विति नहीं होगी। सजा के फैसले के विरुद्ध बड़ी बैंच में अपील का अधिकार प्रशांत भूषण के पास सुरक्षित है। अपील के निर्णय से पहले सजा की क्रियान्विति नहीं हो सकती है। सब जानते हैं कि यूपीए के शासन में अरविंद केजरीवाल के साथ मिल कर प्रशांत भूषण ने भ्रष्टाचार के अनेक मामले उजागर किए थे। कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट से निर्णय भी करवाया। अब प्रशांत भूषण एनडीए सरकार पर भी हमलावर हैं। जो लोग कभी प्रशांत पर गंभीर आरोप लगाते थे, वो ही आज प्रशांत के साथ खड़े हैं। इतना ही नहीं भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल भी चाहते हैं कि प्रशांत को कोई सजा नहीं मिले। इसके लिए वेणुगोपाल के बैंच के समक्ष आग्रह भी किया है। सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सजा के ऐतान में जो नरम रुख प्रशांत भूषण के प्रति अपनाया है, वैसा रुख आम आदमी के मामले में भी अपनाया जाएगा…?

मुंसिफ कोर्ट में भी यदि गलीत से किसी पक्षकार के मोबाइल की घंटी बज जाए तो कुर्सी पर बैठा मजिस्ट्रेट जुर्माना या एक दो दिन की जेल की सजा दे देता है। यदि कोई अधिकारी आदेश की पालना नहीं करने पर दोषी पाया जाता है तो संबंधित कोर्ट दोषी अधिकारी की वेतनवृद्धि रोकने या जेल भेजने का आदेश सुना देती है। भले ही ऐसा अधिकारी सौ बार माफी मांगने को तैयार हो। सुप्रीम कोर्ट माने या नहीं लेकिन प्रशांत भूषण का मामला नजीर बनेगा। जब प्रशांत भूषण सजा से बच सकते हैं तो फिर अन्य लोगों को भी मुंंसिफ मजिस्ट्रेट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ बोलने की छूट मिल जाएगी।