आख़िर कैसे सुधरेगी कांग्रेस….?

राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने चिंतन शिविर के संकल्पों को तोड़ा,भाजपा ने हर समुदाय को साथ जोड़ा।कांग्रेस के एजेंडे में 55-56 प्रतिशत पिछड़े नहीं,कैसे सुधरेगी कांग्रेस की सूरत।


राजेन्द्र सिंह


राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने उदयपुर के नवसंकल्प चिंतन शिविर के संकल्पों को तोड़ दिया,वही भाजपा ने हर समुदाय को साथ जोड़ने का पूरा प्रयास किया है।खस्ताहाली के दौर से गुजर रही कांग्रेस अभी भी सुधरने का प्रयास नहीं कर रही। देश प्रदेश में 55-56 प्रतिशत की आबादी साले पिछड़े वर्ग को को कांग्रेस बिल्कुल नकार कर चल रही है।पिछडों,अतिपिछडों को दरकिनार कर काँग्रेस कैसे अपनी सूरत सुधार पाएगी।राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस की सूची में शामिल सारे नामों को देखेंगे तो सिर्फ गांधी परिवार के वफादारों व गणेश परिक्रमा करने वालों के नाम ही मिलेंगे, तो दूसरी ओर भाजपा की सूची को देखेंगे तो कुछ वरिष्ठ मंत्रियों के नामों के अलावा बाकी सारे नाम आपको अनजाने लगेंगे। कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने जहां वफादारों व भाट सरीखों को टिकट दिया है वहीं भाजपा ने आम कार्यकर्ताओं को सोशल इंजीनियरिंग का ध्यान रखकर अपना उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस ने हाल ही में उदयपुर के चिंतन शिविर में जो भी संकल्प लिये थे उनमें से किसी का पालन भी पार्टी ने राज्यसभा के उम्मीदवारों को तय करते हुए नहीं किया है। कांग्रेस पर परिवारवाद व तुच्छ जातिवाद के जो आरोप लगते हैं,पार्टी ने शायद उसके साथ ही जीने का संकल्प लिया है। कांग्रेस ने तमिलनाडु से पी. चिदम्बरम को उम्मीदवार बनाया है जो कि वर्षों से लगातार राज्यसभा और लोकसभा के सदस्य बनते रहे हैं। चिदम्बरम तमिलनाडु से राज्यसभा उम्मीदवार बनाये गये हैं जबकि उनके बेटे कार्ति चिदम्बरम तमिलनाडु से कांग्रेस के लोकसभा सांसद हैं। यही नहीं राजस्थान पर नजर डालिये। राजस्थान से कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के पार्टी नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया है। प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा मोना उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की विधायक हैं। प्रमोद तिवारी उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के अलावा पार्टी का कहीं भी विस्तार नहीं कर पाये लेकिन उन्हें दूसरी बार राज्यसभा का टिकट थमा दिया गया।


दिलचस्प हुआ राजस्थान का रण।कांग्रेस उम्मीदवारों ने दाखिल किया नामांकन, समीकरण बिगाड़ने के लिए सुभाष चंद्रा ने भी भरा पर्चा,संकल्पों को कांग्रेस ने दे दी तिलांजलि।पिछड़े-वंचित वर्ग को कांग्रेस ने सिरे से खारिज कर दिया है,वही भाजपा ने 23 में 14 ओबीसी,एससी टिकट देकर सोशल इंजीनियरिंग का नट-बोल्ट कस दिया है।भाजपा में ओबीसी मोर्चा के गथन 27 जून,2012 को सामाजिक न्याय चिन्तक चौ.लौटनराम निषाद ने कराया था,उससे पयरव बीजेपी में ओबीसी सेल हुआ करता था।बीजेपी में ओबीसी मोर्चा क्या बना,यह भाजपा की सत्ता का मूल आधार बन गया।यही नहीं, कांग्रेस ने उदयपुर के चिंतन शिविर में युवाओं,पिछडों, वंचितों,महिलाओं को तरजीह देने की बात कही थी और कहा था कि लोकसभा या राज्यसभा की उम्मीदवारी कितनी बार मिले इसके बारे में सीमा तय की जायेगी। लेकिन 90 के दशक से राज्यसभा सदस्य रहे राजीव शुक्ला, जयराम रमेश और कई बार सांसद रहे मुकुल वासनिक को टिकट थमा दिया। यही नहीं कांग्रेस जिन युवा नेताओं को टिकट देने की बात कह रही है जरा उनका जनाधार भी देख लीजिये। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला हरियाणा विधानसभा चुनावों में अपनी कैथल सीट नहीं बचा पाये थे। यही नहीं हरियाणा चुनाव से पहले सुरजेवाला ने जींद विधानसभा सीट पर उपचुनाव भी लड़ा था और तीसरे नंबर पर रहे थे। अजय माकन लगातार कई बार से दिल्ली में लोकसभा और विधानसभा चुनाव तो हार ही रहे हैं, साथ ही वह उपचुनाव भी हार गये थे। यही नहीं उनके दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहते हुए पार्टी नगर निगम का चुनाव भी बुरी तरह हारी थी। छत्तीसगढ़ से रंजीत रंजन को उम्मीदवार बनाया गया है लेकिन वह भी 2019 का लोकसभा चुनाव हार गयी थीं।

मध्य प्रदेश से वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा को कांग्रेस ने दोबारा मौका दिया है। तन्खा भी 2019 का लोकसभा चुनाव जबलपुर सीट से हार गये थे। महाराष्ट्र से उम्मीदवार बनाये गये इमरान प्रतापगढ़ी भी 2019 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की मुरादाबाद सीट से हार गये थे। 2019 में कांग्रेस में शामिल होने वाले इमरान पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने तक के आरोप लगे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस इन उम्मीदवारों के जरिये किस तरह की राजनीति करना चाहती है। उम्मीदवारों को लेकर जिस तरह का बवाल कांग्रेस के भीतर देखने को मिल रहा है वह पार्टी की सेहत के लिए अच्छा नहीं है।भारतीय ओबीसी महासभा के प्रवक्ता व सामाजिक न्याय चिन्तक चौ.लौटनराम निषाद ने प्रतिक्रिया स्वरूप कहा है कि लगभग 60 प्रतिशत पिछड़ी जातियों को नकार व दरकिनार कर कोई राजनीतिक दल आगे नहीं बढ़ सकता।भाजपा का असली चरित्र पिछड़ा-दलित वर्ग विरोधी है,पर टिकट वितरण व राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर भाजपा माइक्रो सोशल इंजीनियरिंग को बखूबी अपनाती है।काँग्रेस के 10 राज्यसभा उम्मीदवारों में 5 ब्राह्मण,1-1 मुस्लिम,दलित व 3 सामान्य वर्ग के हैं,वहीं भाजपा के 21 राज्यसभा उम्मीदवारों में 10 पिछड़े,3 दलित व शेष सवर्ण हैं।उसने सोशल इंजीनियरिंग को साधते हुए निषाद, यादव/मौर्य, कम्मा,वोक्कालिगा, कुर्मी/पटेल, सैनी, गुजर, साहू, वाल्मीकि, जाटव,धानुक/कठेरिया को उम्मीदवार बनाया है।अब जरा भाजपा के उम्मीदवारों की बात कर ली जाये। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और निर्मला सीतारमण केंद्रीय मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं, इसलिए उन्हें फिर से राज्यसभा जाने का मौका मिला है। यह पहले से ही माना जा रहा था। लेकिन भाजपा ने नये चेहरों और खासकर जमीनी स्तर पर काम कर रहे लोगों को मौका देने के लिए दुष्यंत गौतम, विनय सहस्रबुद्धे, प्रकाश जावडेकर, मुख्तार अब्बास नकवी, सैयद जफर इस्लाम और ओम प्रकाश माथुर को फिर से टिकट नहीं दिया है।


उत्तर प्रदेश से भाजपा के उम्मीदवारों पर नजर डालें तो मिथिलेश कुमार, के. लक्ष्मण, दर्शना सिंह और संगीता यादव का नाम शायद पहले लोगों ने सुना भी नहीं होगा। हम आपको बता दें कि मिथिलेश कुमार शाहजहांपुर से लोकसभा के पूर्व सदस्य हैं। वह 2009 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा के लिए चुने गए थे। वह एक बार निर्दलीय (2002-2007) और फिर समाजवादी पार्टी के टिकट (2007-2012) पर शाहजहांपुर जिले के पोवायां विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मिथिलेश कुमार ने सपा का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। हालांकि उस समय लोकसभा चुनाव में उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया गया था। लेकिन जून 2021 में मिथिलेश कुमार को एससी-एसटी आयोग का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया था और अब ठीक एक साल बाद उन्हें राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार बना दिया गया। माना जा रहा है कि कठेरिया समाज से आने वाले मिथिलेश कुमार को संसद के उच्च सदन में भेजकर भाजपा अनुसूचित जाति के वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।

दर्शना सिंह की बात करें तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के गृह जिले चंदौली से ताल्लुक रखने वालीं राजपूत जाति की दर्शना सिंह वर्तमान में भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। माना जा रहा है कि पिछले एक दशक से वह जिस तरह पार्टी की सेवा कर रही हैं उसका ईनाम उन्हें दिया गया है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में जिन विधायकों का हालिया संपन्न विधानसभा चुनावों में टिकट काटा था उनमें गोरखपुर से चार बार के विधायक डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल और चौरी-चौरा की विधायक संगीता यादव का नाम भी था। डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए गोरखपुर शहर सीट खाली की थी, वहीं संगीता यादव की चौरी-चौरा सीट गठबंधन के तहत निषाद पार्टी को दे दी गयी थी। टिकट कटने के बावजूद इन दोनों नेताओं ने पाला नहीं बदला और भाजपा उम्मीदवारों के लिए प्रचार कर उनकी जीत सुनिश्चित की, जिसका ईनाम इन्हें मिला है। संगीता यादव वर्तमान में भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय मंत्री और महिला मोर्चा की दिल्ली प्रभारी भी हैं। संगीता यादव की अति पिछड़ा वोट बैंक में अच्छी पकड़ मानी जाती है।अतिपिछड़ी जातियों में पकड़ का कारण यह है कि इनके पति मौर्य/कुशवाहा बिरादरी के हैं।इसी तरह उत्तर प्रदेश से जिन के. लक्ष्मण को उम्मीदवार बनाया गया है वह भाजपा के ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। साथ ही वह भाजपा की तेलंगाना इकाई के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं। डॉ. के.लक्ष्मण आंध्र प्रदेश विधानसभा और उसके बाद तेलंगाना विधानसभा के भी सदस्य रह चुके हैं। तेलंगाना में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए लक्ष्मण को राज्यसभा भेजा जाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी तरह उत्तर प्रदेश से पार्टी के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई को उम्मीदवार बनाना उनके दशकों तक समर्पण और सेवा का ही फल है। इसके अलावा पार्टी ने मौजूदा राज्यसभा सदस्य सुरेंद्र सिंह नागर को दोबारा उम्मीदवार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जातिगत समीकरणों को देखते हुए ही बनाया है। इसके अलावा जिन बाबूराम निषाद को उम्मीदवार बनाया गया है वह वर्तमान में उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम के अध्यक्ष हैं। बुंदेलखंड में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है।निषाद नेताओं में ये मिलनसारिता व व्यवहार में अच्छे माने जाते हैं। विधानसभा चुनावों में उन्हें टिकट नहीं मिला था लेकिन उन्होंने पार्टी के लिए मेहनत से काम किया और अब परिणाम सामने है।


वहीं मध्य प्रदेश से कैलाश विजयवर्गीय और अन्य कई बड़े नामों को पछाड़ते हुए भाजपा ने जिन सुमित्रा वाल्मिकी और कविता पाटीदार को उम्मीदवार बनाया है उनका परिचय जान कर भी आप चौंक जायेंगे। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आम्बेडकर की जन्मस्थली महू की रहने वालीं कविता पाटीदार भाजपा की प्रदेश महासचिव हैं। उन्होंने वर्ष 2005 से सक्रिय राजनीति की शुरुआत की थी। कविता पाटीदार, इंदौर जिला पंचायत की अध्यक्ष रह चुकी हैं। कविता पाटीदार ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। वहीं जबलपुर की सुमित्रा वाल्मीकि भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। वह अनुसूचित जाति वर्ग से ताल्लुक रखती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मध्य प्रदेश के आगामी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले, ओबीसी आरक्षण पर तेज होते सियासी घमासान के बीच कविता पाटीदार और सुमित्रा वाल्मीकि को राज्यसभा चुनावों में उम्मीदवार बनाकर सत्तारुढ़ भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वही इस तबके की सबसे बड़ी हितैषी है।इसी प्रकार उत्तराखण्ड से उम्मीदवार बनायी गयीं कल्पना सैनी का नाम देख लीजिये। एक समय था जब राज्यसभा चुनावों के समय माना जाता था कि किसी बड़े नाम को मौका दिया जायेगा लेकिन भाजपा ने यह परम्परा बदलते हुए साधारण कार्यकर्ताओं को मौका देना शुरू कर दिया है। कल्पना सैनी हरिद्वार जिले से हैं तथा वर्तमान में प्रदेश में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्ष हैं। यानि इस राज्य में भी भाजपा ने पिछड़ा वर्ग को ही ध्यान में रखा है।


वहीं महाराष्ट्र में पीयूष गोयल के अलावा जिन अनिल बोंडे और धनंजय महादिक को अवसर मिला है जरा उनका भी परिचय जान लीजिये। महाराष्ट्र में माना जा रहा था कि भाजपा पंकजा मुंडे अथवा विनोद तावड़े को अवसर देगी लेकिन यहां भी भाजपा ने ओबीसी को ही महत्व दिया। अनिल बोंडे महाराष्ट्र में भाजपा की ओर से बड़े ओबीसी नेता माने जाते हैं। राज्य में जल्द ही स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं, वह भी बिना ओबीसी आरक्षण के। ऐसे में अनिल बोंडे का चयन काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। अनिल बोंडे किसानों की समस्याओं को समझने वाले नेता भी माने जाते हैं। वह देवेंद्र फडणवीस सरकार में कृषि मंत्री भी रह चुके हैं। वहीं धनंजय महादिक की बात करें तो वह कोल्हापुर से सांसद रह चुके हैं। वह महाराष्ट्र भाजपा प्रवक्ता के साथ ही सहकारी शक्कर कारखाने से भी जुड़े हुए हैं। धनंजय महादिक महाराष्ट्र में भाजपा के उभरते हुए युवा नेताओं में भी गिने जाते हैं।


वहीं राजस्थान की बात करें तो भाजपा ने यहां से वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी को उम्मीदवार बनाकर कई संदेश दिये हैं। घनश्याम तिवाड़ी जनसंघ के समय से ही साथ रहे हैं लेकिन वसुंधरा राजे से नाराजगी के चलते उन्होंने 2017 में राजे के खिलाफ तब मोर्चा खोला था जब वह मुख्यमंत्री थीं। उस समय घनश्याम तिवाड़ी को अनुशासनहीनता का नोटिस भी जारी किया गया था। बाद में उन्होंने जून 2018 में पार्टी से त्यागपत्र दे दिया था। तिवाड़ी ने 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले ‘‘भारत वाहिनी पार्टी’’ बनाकर जयपुर की सांगानेर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था लेकिन उनकी जमानत जब्त हो गयी थी। बाद में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली थी लेकिन दिसंबर 2020 में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व से बातचीत के बाद वे वापस भाजपा में आ गये थे। अब तिवाड़ी को टिकट देकर जहां भाजपा ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की है वहीं वसुंधरा राजे के गुट को भी सख्त संदेश दे दिया है। वैसे घनश्याम तिवाड़ी अब तक एक ही चुनाव हारे हैं। वह कई बार राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहने के अलावा राज्य मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं।


जहां तक कर्नाटक से भाजपा के उम्मीदवारों की बात है तो यहां पार्टी ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अलावा जग्गेश और लहर सिंह सिरोया को उम्मीदवार बनाया है। अभिनेता से नेता बने जग्गेश को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने विधानसभा चुनावों से पहले वोक्कालिगा समुदाय को लुभाने और तुमकुरु जिले में पार्टी के जनाधार को मजबूत करने का प्रयास किया है। जग्गेश कांग्रेस के विधायक और भाजपा के विधान परिषद सदस्य रहे हैं। अभिनय जगत में उनकी धाक मानी जाती है। इसके अलावा लहर सिंह सिरोया जिन्हें उम्मीदवार बनाया गया है वह कर्नाटक विधान परिषद के सदस्य हैं और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के करीबी माने जाते हैं। लहर सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी बड़े प्रशंसकों में से हैं। गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा वहां पंचायत चुनाव जीती थी तो लहर सिंह सिरोया ने देश के सभी बड़े हिंदी समाचार पत्रों में पूरे पेज का विज्ञापन देकर मोदी को बधाई दी थी। यह वह अवसर था जब बिहार विधानसभा चुनावों के प्रचार के समय सुषमा स्वराज ने कहा था कि गुजरात में मोदी का जादू बढ़िया चला, उन्होंने पंचायत चुनाव में शानदार जीत हासिल की लेकिन उनके जादू की और जगह जरूरत नहीं है। ऐसे में लहर सिंह सिरोया की ओर से दिये गये विज्ञापन को मोदी के लिए राष्ट्रीय भूमिका तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा गया था। यही नहीं लहर सिंह सिरोया तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी पर आरोप लगाकर कुछ समय तक भाजपा से निलंबित भी रह चुके हैं।


वहीं जहां तक बिहार से उम्मीदवार बनाये गये सतीश चंद्र दुबे और शंभू शरण पटेल की बात है तो भाजपा ने इन उम्मीदवारों के जरिये भी कार्यकर्ताओं के सम्मान के साथ ही जातिगत समीकरण साधने की कोशिश की है। 2005 में नरकटियागंज से विधायक रहे सतीश चंद्र दुबे 2014 में वाल्मीकि नगर संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव जीते थे लेकिन 2019 के चुनाव में उनकी सीट गठबंधन के तहत जदयू के पास चली गयी तो भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया। अब एक बार फिर सतीश चंद्र दुबे पर भरोसा जताते हुए पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा है। वैसे भी सतीश चंद्र दुबे को अभी राज्यसभा में तीन वर्ष का ही कार्यकाल मिला था क्योंकि वह राम जेठमलानी के निधन से खाली हुई सीट पर उपचुनाव जीते थे। वहीं शंभू शरण पटेल बिहार में भाजपा का युवा चेहरा होने के साथ ही प्रदेश पार्टी संगठन में मंत्री पद पर हैं। शंभू शरण पटेल के चयन के जरिये भाजपा ने संगठन के लोगों को यह संदेश दिया है कि सभी के कामकाज पर केंद्रीय नेतृत्व की नजर है और मेहनत का फल एक दिन मिलता ही है।वहीं हरियाणा में भाजपा ने अनुसूचित जाति के बड़े चेहरे पूर्व मंत्री कृष्ण लाल पंवार को उम्मीदवार बनाकर बड़ा दांव चल दिया है। कृष्ण लाल पंवार हरियाणा विधानसभा में पांच बार विधायक रह चुके हैं। वह इंडियन नेशनल लोकदल के विधायक भी रहे हैं। वर्ष 2014 में टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने भाजपा का दामन थामा था और जीत के बाद खट्टर सरकार में परिवहन मंत्री बनाए गए थे। वह 2019 का विधानसभा चुनाव हार गये थे लेकिन अपने समाज के बीच उनका बड़ा आधार देखते हुए पार्टी ने उन्हें राज्य भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था।


बहरहाल, राज्यसभा चुनावों के लिए क्षेत्रीय दलों ने जो नाम घोषित किये हैं वह भी परिवारवाद की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले या किसी को खुश करने के लिए किये गये प्रयास के रूप में ही नजर आ रहे हैं। वैसे जल्द ही होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले इस बार के राज्यसभा चुनाव काफी महत्वपूर्ण हो गये हैं। अभी यह देखना भी बाकी है कि भाजपा और कांग्रेस की ओर से जिन दिग्गजों को संसद से बाहर कर दिया गया है उनका आगे का राजनीतिक भविष्य क्या रहता है। खासतौर पर सबकी नजरें केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी पर हैं। राज्यसभा की सदस्यता खत्म होते ही अब उन्हें मंत्री पद छोड़ना होगा या फिर रामपुर से संसद का सदस्य बन कर मंत्री पद बचाना होगा। माना जा रहा है कि आजम खान की ओर से खाली की गयी रामपुर लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में भाजपा उन्हें उम्मीदवार बना सकती है। इसके अलावा एक अन्य केंद्रीय मंत्री और जदयू नेता आरसीपी सिंह का राजनीतिक भाग्य भी अधर में लटक गया है क्योंकि उनकी पार्टी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा है।

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