आजमगढ़ उपचुनाव सपा सुप्रिमों का धर्मेंद्र पर भरोसा

राजू यादव

आजमगढ़ लोकसभा सीट से धर्मेंद्र यादव के पर्चा भरने के साथ ही उपचुनाव में सपा प्रत्याशी को लेकर काफी दिनों से चल रहा सस्पेंस खत्म हो गया। धर्मेंद्र यादव पहले मैनपुरी और बदायूं से सांसद रह चुके हैं और अब उन्हें आजमगढ़ लोकसभा उप चुनाव मे उतारा गया है। यादव परिवार अखिलेश यादव के सबसे भरोसेमंद धर्मेंद्र यादव मने जाते हैं।धर्मेंद्र यादव, मुलायम सिंह यादव के भाई अभय राम यादव के बेटे हैं।सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने आजमगढ़ के लोकसभा उप चुनाव में भाई धर्मेंद्र यादव पर भरोसा जताया है।जनपद में सक्रिय तमाम छोटे बडे़ राजनेताओं ने अखिलेश से डिंपल या धर्मेंद्र यादव में से किसी एक को चुनाव मैदान मे उतारने की बात कही थी।अब आखिरी मौके पर बाजी धर्मेंद्र यादव के पक्ष मे आ खड़ी हुई। इसी के तहत धर्मेंद्र यादव को सपा ने उप चुनाव में उम्मीदवार बना कर मैदान में उतार दिया। नामांकन के आखिरी दिन धर्मेंद्र यादव ने भी पर्चा भर दिया। अखिलेश यादव की छोड़ी गई इस सीट पर धर्मेंद्र के जरिये एक बार फिर से समाजवादी पताका फहराने की तैयारी में है। जब कि उनके सामने भाजपा के दिनेश लाल यादव निरहुआ और बसपा के गुडडू जमाली कड़ी चुनौती देते नज़र आ रहे हैं।

डिंपल की जगह आजमगढ़ से धर्मेंद्र यादव को उतारने के पीछे एक बड़ी वजह आजमगढ़ का जातीय समीकरण है। इस यादव लैंड में अधिकतर जीत सैफई परिवार और यादव को ही मिलती है। ऐसे में धर्मेंद्र बेहतर विकल्प माने जा सकते हैं। धर्मेंद्र यादव परिवार से भी हैं। पार्टी के यूथ के बीच अच्छी पकड़ है। माना जा रहा है कि धर्मेंद्र के चुनावी मैदान में उतरने से कार्यकर्ताओं में उत्साह बना रहेगा।

सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव के परिवार के निकटवर्ती कुछ लोगों में धर्मेंद्र यादव का नाम सबसे ऊपर आता है। धर्मेंद्र यादव और अखिलेश यादव ने एक साथ चुनावी राजनीति की शुरुआत की थी। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव और धर्मेंद्र यादव एक साथ चुनावी मैदान में उतरे थे। उस समय अखिलेश यादव की उम्र 27 साल तो धर्मेंद्र यादव की 25 साल थी। दोनों ही भाइयों ने लगभग एक साथ राजनीति शुरू की, लेकिन अखिलेश यादव आगे निकलते चले गए। उत्तर प्रदेश चुनाव 2022 में धर्मेंद्र यादव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया गया। इसके बाद से उनकी नाराजगी की खबरें थीं। लखनऊ की राजनीति में वे सक्रिय नहीं थे। उनकी नाराजगी को दूर कर सपा की ओर से उनका नामांकन आजमगढ़ लोकसभा सीट पर होने वाले उप चुनाव में कराया गया है। धर्मेंद्र यादव ने आजमगढ़ पहुंचकर नामांकन दाखिल किया।

आजमगढ़ में दलित-यादव से ज्यादा मजबूत मुस्लिम-यादव समीकरण है।आजमगढ़ सीट पर अखिलेश ने पहले दलित-यादव समीकरण को सेट करने के लिए सुशील कुमार आनंद के नाम दांव लगाया। मगर, पार्टी के कई नेताओं ने विरोध जता दिया। माना गया कि बसपा के गुड्डु जमाली के मैदान में रहने से दलित वोट सपा के साथ नहीं आएगा। अगर सैफई परिवार का यादव आता है, तो फिर मुस्लिम समाज का भरोसा और बढ़ जाएगा। इस तरह यादव-मुस्लिम का समीकरण इस सीट पर जीत की गारंटी बन सकता है।

धर्मेंद्र यादव पर 2004 के लोकसभा में पहली बार मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीते। उस समय प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार चल रही थी। वर्ष 2007 में प्रदेश की सत्ता बदली। मायावती का शासन आया तो मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से चुनावी मैदान में उतरे। इसके बाद धर्मेंद्र यादव को बदायूं भेज दिया गया। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में बदायूं लोकसभा सीट से धर्मेंद्र चुनावी मैदान में उतरे और जीते। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने बदायूं से जीत हासिल की। धर्मेंद्र यादव के आजमगढ़ से उम्मीदवार बनने के साथ ही तय हो गया है कि वे भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार दिनेश लाल यादव निरहुआ और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार गुड्‌डू जमाली से सीधा मुकाबला करते दिखाई देंगे।

यादव परिवार में अखिलेश के सबसे करीबी हैं धर्मेंद्र यादव,धर्मेंद्र यादव अखिलेश के रिश्ते में भाई लगते हैं। संगठन पर पकड़ मजबूत है। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय हैं। सबसे अहम बात यह है कि बदले पारिवारिक माहौल में अखिलेश सबसे ज्यादा भरोसा धर्मेंद्र पर करते हैं। धर्मेंद्र को प्रत्याशी बनाने के पीछे एक वजह यह भी है कि बदायूं से चुनाव हारने के बाद भी धर्मेंद्र पार्टी के साथ मजबूती से जुड़े रहे। उनके पास लोकसभा का अनुभव भी है। सदन में अखिलेश की जगह को संभालने की कुव्वत रखते हैं।


धर्मेंद्र यादव ने बदायूं लोकसभा सीट से वर्ष 2009 में 32,542 वोटों से जीत दर्ज की थी। चुनाव में बसपा के धर्म यादव उर्फ डीपी यादव को उन्होंने मात दी थी। वर्ष 2014 के चुनाव में धर्मेंद्र यादव ने मोदी लहर के बाद भी बदायूं का रण बड़े अंतर से जीता था। धर्मेंद्र यादव ने भाजपा के वागीश पाठक को 1,66,347 वोटों से मात दी थी। लेकिन, वर्ष 2019 में भाजपा ने यहां से स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी डॉ. संघमित्र मौर्य को चुनावी मैदान में उतारा और उन्होंने धर्मेंद्र यादव को 16,454 वोटों से मात देकर खेल ही पलट दिया। इसके बाद से ही धर्मेंद्र यादव समाजवादी पार्टी में हाशिए पर चले गए।

डिंपल की वजह से अखिलेश की साख दांव पर लगने का भी था खतरा। आजमगढ़ संसदीय सीट शुरू से ही सपा के हाथ में रही है। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव भी इस सीट से सांसद रह चुके हैं। ऐसे में यह सीट सपा के लिए खास है। सपा इसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती है। पत्नी डिंपल की इस सीट पर जीत को लेकर अखिलेश यादव बहुत भरोसा नही कर पा रहे थे।डिंपल दो लोकसभा चुनाव हार चुकी हैं और अगर आजमगढ़ में भी डिंपल हार जाती हैं, तो सीधे अखिलेश की साख पर सवाल उठ जाता। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी दिनेश लाल निरहुआ दूसरे नंबर पर रहे थे। ऐसे में अखिलेश रिस्क नहीं उठाना चाहते थे।

आजमगढ़ में निरहुआ और गुड्डू जमाली से धर्मेंद्र ही कर सकते हैं मुकाबला।आजमगढ़ में सपा नेताओं का मानना है कि अगर मुकाबला धर्मेंद्र यादव से होगा, तो फिर यादव सपा के साथ मजबूती से खड़ा रहेंगे। मुस्लिम समाज का वोट भी सपा को ही मिलेगा। धर्मेंद्र यादव एक बड़े नेता माने जाते हैं। लिहाजा कार्यकर्ता भी मजबूती के साथ लड़ेंगे। दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ यादव वोट में सेंध नहीं लगा पाएंगे। जमाली और निरहुआ आपस में लड़ेंगे जिसका फायदा धर्मेंद्र यादव को मिल जाएगा।

अखिलेश ने बनाई अलग रणनीति –

धर्मेंद्र यादव को समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव के लिए संकटमोचक कहा जाता रहा है। परिवार में सदस्यों को एकजुट रखने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। वर्ष 2017 में जब शिवपाल यादव सपा से अलग हो रहे थे, तो परिवार के अधिकांश युवा चेहरे उनके समर्थन में दिखे थे। लेकिन, धर्मेंद्र यादव ने सबको अखिलेश के पाले में बनाए रखा। मुलायम सिंह यादव के भाई अभय राम यादव के बेटे धर्मेंद्र यादव ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र से पीजी और एलएलबी का कोर्स किया है। वे छात्र राजनीति से ही काफी सक्रिय रहे हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी के भीतर उनकी पकड़ काफी मजबूत है। अखिलेश यादव उनके जरिए परिवार के भीतर अपनी पकड़ को एक बार फिर मजबूत बनाने का प्रयास करते दिख रहे हैं।

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