उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड परिसम्पत्तियों के विवाद में एक महत्वपूर्ण कदम..!

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उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तराखण्ड सरकार ने परिसम्पत्तियों के विवाद के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया।

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ज हरिद्वार में उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद डॉ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ द्वारा रचित ‘स्पर्श गंगा गीत’ एवं खण्ड काव्य ‘मैं गंगा बोल रही’ का विमोचन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने स्पर्श गंगा पत्रिका का विमोचन, स्पर्श गंगा अभियान द्वारा स्थापित किये जा रहे लेखक गांव का लोकार्पण किया। उन्होंने गंगा प्रहरियों को सम्मानित भी किया। मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तराखण्ड सरकार ने परिसम्पत्तियों के विवाद के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है। हरिद्वार में अलकनन्दा पर्यटक आवास गृह उत्तराखण्ड सरकार को सौंपा गया है तथा उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नवनिर्मित भागीरथी पर्यटक आवास गृह का लोकार्पण किया गया है। उन्होंने कहा कि गंगा तब बनती है, जब भागीरथी और अलकनन्दा मिलती हैं। गंगा भारत की जीवनधारा है। दुनिया के अन्दर जितनी भी संस्कृतियां पनपी हैं, वे किसी न किसी नदी के तट पर पनपी हैं। हमारे यहां किसी भी नदी को सामान्य जन भाषा में गंगा के रूप में सम्बोधित करते हैं।


मॉरिशस में लगभग 200 वर्ष पूर्व भारत से गये कामगारों व श्रमिकों ने उस देश का निर्माण किया है। वे गिरमिटिया श्रमिक के रूप में वहां गये थे। वे अपने साथ भारत की आस्था को लेकर गये थे। अपनी मॉरिशस यात्रा का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वहां लोगों ने रामचरितमानस की पोथी आज भी अपने साथ रखी है। वहां मीठे पानी के तालाब का गंगा तालाब के रूप में नामकरण कर उसकी पूजा उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार हमारे यहां गंगा जी की पूजा व आरती की जाती है। दुनिया भर में भारतवंशियों ने इसी प्रकार अपनी परम्परा को संजोया है। गंगा के प्रति निष्ठा व आस्था हर जगह देखने को मिलती है। हम सब गंगा पुत्र व हिमालय पुत्र हैं। यह हमारा दायित्व है कि हम अपने इस दायित्व का निर्वहन करें। नमामि गंगे परियोजना ने इस दिशा में अभिनन्दनीय कार्य किया है। मां गंगा गंगोत्री से गंगा सागर तक 2,500 किलोमीटर से अधिक की यात्रा तय करती हैं। इस यात्रा का सर्वाधिक 1,000 किलोमीटर का हिस्सा उत्तर प्रदेश में आता है। बिजनौर से बलिया 1,000 किलोमीटर की जिस यात्रा को गंगा पूरी करती है, उसमें हरिद्वार के बाद अनेक क्रिटिकल प्वाइंट थे। यहां गंगा नदी नहीं बल्कि नाले जैसी दिखती थी। कानपुर में सीसामऊ नाले से 14 करोड़ लीटर सीवर प्रतिदिन गंगा में गिरता था। जाजमऊ नाले से चमड़ा उद्योग का जहरीला कचरा गंगा जी में जाता था। इसके कारण मां गंगा में एक भी जलीय जीव नहीं बचा था। पिछले 05 वर्षाें के दौरान उत्तर प्रदेश में नमामि गंगे परियोजना के प्रभावी क्रियान्वयन से अब सीसामऊ नाले से एक भी बूंद सीवर गंगा जी में नहीं गिरता है। आज वहां सेल्फी प्वाइंट बना दिया गया है। जाजमऊ में भी चमड़ा उद्योगों के गन्दे पानी को ट्रीट कर खेती में सिंचाई के लिए उपयोग किया जा रहा है। आज कानपुर के जाजमऊ में गंगा जी में जलीय जीव पुनः दिखायी देने लगे हैं।


प्रयागराज कुम्भ-2019 में सबसे बड़ी चुनौती शुद्ध एवं अविरल गंगा जल उपलब्ध कराने की थी। वर्ष 2019 में दिव्य एवं भव्य कुम्भ के आयोजन में 24 करोड़ श्रद्धालु प्रयागराज आये। यूनेस्को ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रयागराज कुम्भ को मान्यता दी। वर्ष 2017 से पूर्व उत्तर प्रदेश में नमामि गंगे परियोजना प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रही थी, लेकिन वर्ष 2017 के बाद से नमामि गंगे परियोजना पर केन्द्र व राज्य सरकार ने मिलकर कार्य किया। अब वाराणसी में गंगा जी में डॉल्फिन दिखायी देने लगी है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में नमामि गंगे परियोजना में इतना पवित्र कार्य किया गया है कि एक मर रही नदी को पुनर्जीवित किया गया है। जो काम किसी कालखण्ड में महाराजा भगीरथ ने किया था, वही काम आज नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से प्रधानमंत्री ने किया है। सरकार पैसा लगा सकती है, प्रोजेक्ट बना सकती है, सरकार अपने स्तर पर एक अभियान को आगे बढ़ा सकती है, लेकिन उसे सस्टेनेबल बनाने में योगदान समाज को करना होता है। यह समाज की जिम्मेदारी है कि वह गंगा जी एवं उसकी सहायक नदियों में किसी प्रकार की गन्दगी न करे। नमामि गंगे परियोजना का तात्पर्य केवल गंगा नदी से नहीं है, गंगा व उसकी सभी सहायक नदियों को हमें इसके अन्तर्गत लेना होगा। हमारे अन्दर एक संकल्प होना चाहिए कि किसी भी नदी, तालाब, पोखर के प्रति पवित्र भाव अपने मन में रखें। इन्हें गन्दा न होने दें, अपवित्र न होने दें। इनमें कचरा न फेंकें, कपड़े न धोएं, मृतकों को जलप्रवाहित न करें। इस तरह हम पूरी जीव सृष्टि के साथ खिलवाड़ करते हैं।


प्लास्टिक फ्री गंगा का अभियान चलाया जाना चाहिए। केमिकल, पेस्टीसाइड, फर्टिलाइजर आदि का प्रयोग नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में नहीं होने देना चाहिए। नदी के मार्ग को अवरुद्ध नहीं होने देना चाहिए। इन सभी कार्याें, अभियान से जब तक सामाजिक एवं स्वयंसेवा संगठन नहीं जुड़ेंगे, तो आने वाले समय में हमारे सामने कुछ नहीं बचेगा। आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी। उन्होंने डॉ0 निशंक द्वारा स्पर्श गंगा अभियान को प्रारम्भ किये जाने के लिए उनकी सराहना की। प्रधानमंत्री ने नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए जो कार्य किया है, उससे प्रत्येक उस नागरिक को जुड़ना होगा, जो यह मानता है कि गंगा हमारी आस्था ही नहीं, हमारा जीवन भी है। यदि गंगा-यमुना जैसी नदियां उत्तर भारत में नहीं होतीं, तो यहां भी थार मरुस्थल जैसी स्थिति होती। दुनिया की सबसे उर्वरा भूमि गंगा-यमुना के दोआब में हरिद्वार से गंगा सागर तक देखने को मिलती हैं। गंगा हमारा जीवन, जीविका, आस्था और जीवन का आधार भी है। जब यह आपस में जुड़कर चलेंगे तो नमामि गंगे अभियान सफलता की एक नई ऊँचाई तक पहुंचेगा। इस अभियान से एक-एक नागरिक को जोड़ने का कार्य किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में सरकार के स्तर से भी प्रयास किया जा रहा है। बलिया एवं बिजनौर से गंगा यात्रा निकाली गयी थी। इसका उद्देश्य जनजागरण था। यदि गंगा जी के प्रति आस्था रखने वाले संगठन एकजुट होकर कार्य करना प्रारम्भ कर देंगे तो परिणाम हम सबके सामने आ जाएंगे।


मुख्यमंत्री ने कहा कि आज स्पर्श गंगा कार्यक्रम के साथ स्पर्श हिमालय कार्यक्रम को भी देखने का अवसर प्राप्त हुआ है। पर्वतराज हिमालय के कारण ही देवभूमि की पहचान है। हिमालय उत्तर भारत के जल संसाधन की आपूर्ति भी करता है और हमारी आस्था की प्यास को बुझाने का कार्य भी करता है। हिमालय हर प्रकार से हमें संतुष्टि देता है। स्पर्श हिमालय का कार्यक्रम, ‘मैं गंगा बोल रही’ पुस्तक का विमोचन तथा ‘गंगा गीत’ के माध्यम से चलाये जा रहे अभियान से हम सबको जुड़ना चाहिए। यह हमारा नैतिक दायित्व भी है और राष्ट्रीय कर्तव्य भी।मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में नमामि गंगे कार्यक्रम सफलता के साथ आगे बढ़ रहा है। इस दिशा में प्रदेश में अनेक कार्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। गंगा जी के तटवर्ती क्षेत्रों में फर्टिलाइजर, केमिकल, पेस्टिसाइड के प्रयोग को रोकने के लिए गंगा जी के तटवर्ती क्षेत्रों में 10-10 किलोमीटर के दायरे में जैविक खेती, प्राकृतिक खेती, बागबानी को बढ़ावा देने की व्यवस्था की गयी है। इसके लिए सरकार की तरफ से प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है। लोगों को मुफ्त में फलदार पौधे दिये जा रहे हैं। 03 वर्ष तक उन्हें सरकार द्वारा सब्सिडी/इंसेंटिव दिया जा रहा है। जो भी जैविक उत्पाद वहां से उत्पादित हो, इसके लिए मण्डल स्तर पर एक टेस्टिंग लैब स्थापित करके उसकी ब्रॉण्डिंग व मार्केटिंग की व्यवस्था की जा रही है। जैविक उत्पादों का अच्छा मूल्य उत्पादक को मिल रहा है।


आज कैंसर एक भयंकर बीमारी बनती जा रही है। पंजाब में केमिकल व फर्टिलाइजर के कारण कैंसर ट्रेन चलानी पड़ रही है। हम भौतिक उपलब्धि के लिए पूरी मानवीय सृष्टि के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इसका एक मात्र विकल्प है गो-आधारित प्राकृतिक खेती। अर्थात गौमाता की रक्षा करना, गंगा माता की रक्षा करना और इसके माध्यम से हिमालय की रक्षा करना। स्पर्श गंगा, स्पर्श हिमालय जैसी संस्थाएं नमामि गंगे के साथ जुड़कर इन सभी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करें। उत्तर प्रदेश में गंगा के तटवर्ती जनपदों में गंगा समिति गठित की गयी है। इनसे स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक संगठन, जनप्रतिनिधिगण एवं अधिकारी भी जुड़े हुए हैं। यदि स्पर्श गंगा अभियान जैसी संस्थाएं भी इस कार्यक्रम के साथ जुड़ती हैं, तो इसे और गति प्राप्त होगी।इससे पूर्व, उत्तराखण्ड राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पुष्पगुच्छ एवं अंगवस्त्र प्रदान कर स्वागत किया गया।इस अवसर पर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामीआचार्य महामण्डलेश्वर जूनापीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज, अन्य जनप्रतिनिधिगण, उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश कुमार अवस्थी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। [/Responsivevoice] ….न्यूज़ ऑफ इंडिया ( एजेंसी)