सधे हुए मजबूर चल पड़े

धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव

फिर चुनाव की बजी डुगडुगी,
लड़ने को मशकूर चल पड़े।
कोल्हू के बैलों के माफिक,
सधे हुए मजबूर चल पड़े।

ना निर्णय में राय कहीं पर,
ना पाने में हिस्सेदारी,
फिर भी सर पर कफ़न बांधकर,
मरने को मजदूर चल पड़े।

फिर चुनाव की बजी डुगडुगी,
लड़ने को मशकूर चल पड़े।
कोल्हू के बैलों के माफिक,
सधे हुए मजबूर चल पड़े।

कुछ घी की रोटी पाए हैं,
कुछ पा जाने की आशा में,
भेड़ चाल को कह अनुशासन,
मूल सत्य से दूर चल पड़े।

फिर चुनाव की बजी डुगडुगी,
लड़ने को मशकूर चल पड़े।
कोल्हू के बैलों के माफिक,
सधे हुए मजबूर चल पड़े।

कुछ के सिर पर नशा धर्म का,
कुछ खा जात वाद की गोली,
कुछ चाँदी का टुकड़ा पाकर,
बन मालिक की हूर चल पड़े।

फिर चुनाव की बजी डुगडुगी,
लड़ने को मशकूर चल पड़े।
कोल्हू के बैलों के माफिक,
सधे हुए मजबूर चल पड़े।

लोकतंत्र की समर भूमि में,
लोकतंत्र का वध करने को,
दो सेठों का परचम लेकर,
उत्साही मगरूर चल पड़े।

फिर चुनाव की बजी डुगडुगी,
लड़ने को मशकूर चल पड़े।
कोल्हू के बैलों की माफिक,
सधे हुए मजबूर चल पड़े।

हर कुर्सी की एक चाह है,
कीलें भी सब रहें जेब की,
फिर भी कुर्सी की रक्षा को,
सभी समर्पित सूर चल पड़े।

फिर चुनाव की बजी डुगडुगी, लड़ने को मशकूर चल पड़े।
कोल्हू के बैलों के माफिक,
सधे हुए मजबूर चल पड़े।

जान रहा हूँ जीत कठिन है,
इस सोने की कवचपुरी पर,
फिर भी इसके चक्रव्यूह को,
हम करने को चूर चल पड़े।

फिर चुनाव की बाजी डुगडुगी, लड़ने को मशकूर चल पड़े।
कोल्हू के बैलों के माफिक,
सधे हुए मजबूर चल पड़े।


  • ( सम्पूर्ण क्रांति की तलाश में भटक रहा मन जो पाया, उसे पांच जून की स्मृति में प्रस्तुत कर रहा है। इसे लेकर किसी को कष्ट हो तो वह क्षमा करे। इसे प्रस्तुत करने का एक मात्र लक्ष्य है कि हम सभी लोग मिलकर सोंचे कि इस स्थिति का अंत कैसे हो )