अतिपिछड़ी जातियों के पास है राजनीति बदलने का समीकरण….!

उच्च न्यायालय द्वारा अधिसूचना रद्द करने का पड़ेगा राजनीति पर दूरगामी असर। 18 अतिपिछड़ी जातियों के पास है राजनीतिक समीकरण बदलने की ताकत।

सी. लाल

उच्च न्यायालय द्वारा 18 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने सम्बंधित अधिसूचना को रद्द करने से प्रदेश सरकार को तगड़ा झटका लगा है। योगी सरकार ने 2019 में एक, जबकि पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार ने 2016 में इस संदर्भ में दो अधिसूचनाएं जारी की थीं। जिसके माध्यम से उत्तर प्रदेश की निषाद, मल्लाह, केवट, मछुआ, माँझी, बिन्द, धीवर, धीमर,रैकवार,तुरहा, गोड़िया, बाथम,कश्यप,कहार,भर,राजभर,कुम्हार,प्रजापति आदि 18 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में परिभाषित कर इन्हें एससी की सुबिधा देने की अधिसूचना 21,22 व 31 दिसम्बर 2016 को समाजवादी पार्टी की सरकार ने अधिसूचना जारी किया था। डॉ. बीआर अम्बेडकर ग्रन्थालय एवं जनकल्याण समिति गोरखपुर की याचिका पर उच्च न्यायालय ने 24 जनवरी, 2017 को इन जातियों को एससी प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगा दी थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की 18 जातियों को अनुसूचित जाति (एससी) में शामिल करने की सभी अधिसूचनाओं को बुधवार 31 अगस्त को रद्द कर उत्तर प्रदेश सरकार को तगड़ा झटका दिया है।


मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और जस्टिस जे.जे. मुनीर की पीठ ने यह फैसला गोरखपुर की संस्था डॉ. भीमराव आंबेडकर ग्रंथालय एवं जन कल्याण समिति और अन्य जनहित याचिकाओं पर दिया है। पीठ ने कहा, संविधान में केंद्र व राज्य सरकारों को ऐसा फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। इससे पहले, प्रदेश सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता अजय कुमार मिश्रा ने बुधवार को हलफनामा दायर कर कहा कि सरकार के पास अधिसूचना बनाए रखने का सांविधानिक अधिकार नहीं है।इस दलील के आधार पर ही हाईकोर्ट ने याचिकाओं को मंजूर किया और सभी अधिसूचनाएं रद्द कर दीं।याचिकाकर्ताओं के वकील राकेश गुप्ता ने दलील दी कि ओबीसी की जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का अधिकार केवल देश की संसद के पास निहित है।


विधानसभा चुनाव-2017 से पहले 21-22 दिसंबर, 2016 को अखिलेश यादव सरकार ने चुनाव से ठीक पहले इन जातियों के लिए दो अधिसूचनाएं जारी कीं। कुछ दिन बाद ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्थगन दे दिया। राष्ट्रीय निषाद संघ की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश बोबड़े की पीठ ने 29 मार्च,2017 को स्टे वैकेट करते हुये राज्य सरकार को जाति प्रमाण पत्र जारी करने का निर्णय दिया।राज्य सरकार इस सम्बंध में मौन धारण किये हुए थी। वृजेन्द्र कश्यप की याचिका के संदर्भ में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायधीश की पीठ ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई।राज्य सरकार ने जाति प्रमाण पत्र निर्गत करने का आदेश न जारी कर 24 जून, 2019 को योगी सरकार ने हाईकोर्ट के एक फैसले का गलत संदर्भ लेते हुए नई अधिसूचना जारी की। इस पर भी हाईकोर्ट ने स्थगन दे दिया था।

लौटनराम निषाद ने बताया कि 17 दिसम्बर,2021 को रमाबाई पार्क में निषाद पार्टी-भाजपा की संयुक्त सरकार बनाओ अधिकार पाओ रैली का आयोजन किया गया था।जिसमें गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य,दिनेश शर्मा व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह आदि शामिल हुए थे।निषाद पार्टी द्वारा प्रचारित किया गया था कि इस रैली में गृहमंत्री निषाद समाज को आरक्षण के सौगात की घोषणा करेंगे।आरक्षण के नाम पर बड़ी संख्या में निषाद समुदाय के लोग जुटे।परन्तु रैली में न तो आरक्षण की घोषणा हुई और न निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद द्वारा मंच पर आरक्षण का प्रस्ताव ही रखा गया।जिससे निषादों का गुस्सा फूट पड़ा, भीड़ कुर्सियों को तोड़ने लगी और नारा लगाया जाने लगा कि-“आरक्षण नहीं तो वोट नहीं।” निषादों की नाराजगी को देखते हुए मुख्यमंत्री ने चुनाव से 20 दिसंबर,2021 को मझवार की पर्यायवाची जातियों के सम्बंध में जानकारी के लिए आरजीआई को पत्र भेजा गया।परन्तु अभी तक आरजीआई के जवाब को सार्वजनिक नहीं किया गया।

2004 से ही चला आ रहा मामला 5 व 10 मार्च,2004 को तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार ने भर,राजभर व निषाद मछुआ समुदाय की मल्लाह,केवट,बिन्द, धीवर, गोड़िया, रैकवार आदि को अनुसूचित जाति में शामिल करने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा।केन्द्र के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने आरजीआई के हवाले से उत्तर प्रदेश शासन से इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का औचित्य व इथनोग्राफिकल अध्ययन रिपोर्ट माँगा।उत्तर प्रदेश शासन ने उ.प्र.अनुसूचित जाति एवं अनु.जनजाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान से सर्वे कराकर 31 दिसम्बर,2004 को औचित्य सहित केन्द्र सरकार को भेज दिया।वर्ष 2005 में मुलायम सिंह यादव सरकार ने 10 अक्टूबर,2005 को इन जातियों को एससी में शामिल करने की अधिसूचना कार्मिक विभाग से जारी करा दिए। हाईकोर्ट ने इस अधिसूचना पर 20 दिसम्बर 2005 को रोक लगा दिया, तो सरकार ने फैसला वापस ले लिया था।


मायावती ने भी केन्द्र सरकार से की थीं सिफारिश


2007 में सत्ता परिवर्तन हुआ।13 मई,2007 मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं।उन्होंने पहले ही कैबिनेट की बैठक में 30 मई,2007 को केन्द्र सरकार के पास विचाराधीन प्रस्ताव को वापस मंगाने का निर्णय किया। 6 जून,2007 को प्रस्ताव वापस मंगाकर रद्द कफ दिया।अब क्या था राष्ट्रीय निषाद संघ ने सरकार के निर्णय के विरुद्ध धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया।अंत मद निषाद कश्यप समाज की नाराज़गी को देखते हुये मायावती ने 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नाम अर्द्धशासकीय पत्र भेजवाईं।

सियासी फायदे के लिए बार-बार बदलाव

  हाईकोर्ट ने अधिसूचना को रद्द करते हुए प्रदेश सरकार के कामकाज पर भी तल्ख टिप्पणी की। कहा, संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित वर्ग की सूची में बदलाव का अधिकार सिर्फ और सिर्फ देश की संसद को है। सांविधानिक अधिकार न होने के बावजूद यूपी में सियासी फायदे के लिए बार-बार अनुसूचित जातियों की सूची में फेरबदल किया जा रहा था। पीठ ने संविधान के प्रावधानों का बार-बार उल्लंघन करने वाले अफसरों को दंडित करने के भी निर्देश दिए।

जब सभी दल चाहते हैं तो राजनीतिक नाटक क्यों….?


निषाद आरक्षण आंदोलन के सूत्रधार व राष्ट्रीय निषाद संघ के राष्ट्रीय सचिव चौ.लौटनराम निषाद ने राजनीतिक दलों व सरकारों की मंशा पर सवाल उठाया है।कहा कि जब सभी राजनीतिक दल अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के पक्षधर हैं,तो राजनीतिक नाटक क्यों किया जा रहा है? विधानसभा चुनाव-2007 में कांग्रेस ने अन्य राज्यों की भाँति उत्तर प्रदेश की निषाद/मछुआ समुदाय की जातियों को एससी दर्जा दिलाने का वादा किया था।भाजपा ने 2012 में 18 अतिपिछड़ी जातियों सहित नोनिया, लोनिया, बंजारा,बियार को अनुसूचित जाति का आरक्षण दिलाने का संकल्प लिया।सपा,बसपा ने केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजकर सिफारिश कर चुकी हैं,तो इन्हें अनुसूचित जाति में शामिल करने में देरी क्यों? भाजपा सरकार ने संविधान व उच्चतम न्यायालय के निर्णय से परे जाकर 72 घण्टे में आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण दे दिया तो इन अतिपिछड़ी जातियों के प्रति सौतेला व्यवहार क्यों?वर्तमान में तो भाजपा की डबल इंजन की सरकार है।उत्तर प्रदेश सरकार विधिसम्मत प्रस्ताव भेजकर केन्द्र सरकार से इन जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाये।कहा कि भाजपा सरकार बनवाने में इन अतिपिछड़ी जातियों की अहम भूमिका रही है।


भाजपा सरकार कैसे करेगी डैमेज कंट्रोल


उत्तर प्रदेश के जातिगत समीकरण में 16 प्रतिशत से अधिक आबादी है।जिसमें 12.91 प्रतिशत निषाद मछुआ समुदाय की 18 में 14 उपजातियाँ,1.84 प्रतिशत कुम्हार/प्रजापति व 1.31 प्रतिशत भर/राजभर है।इन जातियों के पास राजनीतिक समीकरण बदलने की ताकत है।अब देखना है कि उत्तर प्रदेश सरकार इन जातियों की नाराजगी को दूर करने के लिए डैमेज कंट्रोल का क्या तरीका अपनाती है।लौटनराम निषाद ने कहा कि भाजपा दोष लगाती रही है कि सपा,बसपा के चलते इन जातियों को आरक्षण नहीं मिल पाया, तो अब सवाल खड़ा होगा कि भाजपा ने इन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा क्यों नहीं दिलाया?इस समस्या का समाधान तो चुटकी बजाते हो सकता है।उक्त 18 अतिपिछड़ी जातियाँ अनुसूचित जाति में 1950 से शामिल मझवार,तुरैहा,गोंड़,पासी तड़माली व शिल्पकार की ही पर्यायवाची व वंशानुगत जाति नाम है।श्रीराम-निषादराज की मित्रता के नाम पर भाजपा ने थोक में निषाद जातियों का वोट लिया।अब भाजपा के लिए कोई बहाना नहीं चलेगा।निषाद,कश्यप,बिन्द जातियों के पास इतनी ताकत है कि लोकसभा चुनाव में हॉफ से भी कम हो जाएगी।


निषाद/कश्यप/बिन्द प्रभावित क्षेत्र-

उत्तर प्रदेश की 80 में से आधा से अधिक लोकसभा क्षेत्रों में निषाद, बिन्द, कश्यप का विशेष प्रभाव है।गोरखपुर, ग़ाज़ीपुर,मिर्जापुर,सुल्तानपुर, फतेहपुर, जौनपुर, संतकबीरनगर, कुशीनगर,मुजफ्फरनगर,सिद्धार्थनगर,अम्बेडकरनगर,संतरविदासनगर(भदोही),इलाहाबाद,कौशाम्बी,फूलपुर,उन्नाव,बहराइच,बलिया,चंदौली,बाँदा-हमीरपुर, जालौन,फिरोजाबाद, फतेहपुर सीकरी,बदायूं,आंवला,शाहजहांपुर, कैराना,अयोध्या,बस्ती, देवरिया,सलेमपुर,इटावा,मैनपुरी,लालगंज, मछलीशहर, श्रावस्ती,पीलीभीत, धौरहरा,रामपुर,एटा,बांसगांव आदि में निषाद,कश्यप, बिन्द जातियों का अच्छा प्रभाव है।वैसे यह एक ऐसा जातीय समूह है,जिसकी अधिक या कम कुशीनगर से ललितपुर, सोनभद्र से सहारनपुर, बाँदा से बहराइच व ग़ाज़ीपुर से ग़ाज़ियाबाद तक हर क्षेत्र में उपस्थिति है।राजभर जाति बलिया,देवरिया,सलेमपुर,कुशीनगर,घोषी,आजमगढ़, लालगंज,चंदौली लोकसभा क्षेत्र में विशेष प्रभाव रखती है।वही ग़ाज़ीपुर, जौनपुर, बस्ती, अम्बेडकरनगर,महराजगंज में भी निर्णायक है।प्रजापति का प्रभाव क्षेत्र बुंदेलखंड क्षेत्र व सहारनपुर,मेरठ मण्डल के 7-8 लोकसभा क्षेत्र में ठीकठाक है।वैसे यह जाति भी उत्तर प्रदेश के हर क्षेत्र में 30 से 50 हजार की संख्या में है।

(लेखक- एक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक समीक्षक है)