जानें जाति और पितृसत्ता के बीच क्या संबंध…..

जाति और पितृसत्ता के बीच क्या संबंध है। इस बात को आधुनिक युग में जिन व्यक्तित्वों ने सबसे पहले समझा, वे थे – फूले दंपत्ति। जोती राव  फुले और उनकी पत्नी सावित्री बाई फूले। जाति/ वर्ण के साथ स्त्री की स्थिति को जोड़कर देखने का, जहां बड़े इतिहासकारों ने नहीं के बराबर प्रयास किया, वहीं जाति- व्यवस्था की दलित चिंतकों-सुधारकों ने जो समझ विकसित की और जमीनी स्तर पर जो कार्य किया उसमें स्त्री की पराधीनता और जाति के बीच का गठबंधन स्पष्ट होकर सामने आया। जोती राव फुले ने शूद्रों, अति-शूद्रों और स्त्रियों को ब्राह्मणों द्वारा खड़ी की गई व्यवस्था में शोषित- उत्पीडित की तरह देखा। फुले ने जाति और स्त्री प्रश्न को एक ही सिक्के के दो पहलूओं के रूप में देखा और दोनों को अपने संघर्ष का निशाना बनाया। हिंदू समाज व्यवस्था को उसकी समग्रता में समझने और बदलने की कोशिशों और जाति को भौतिक संसाधनों, ज्ञान और जेंडर –संबंधों के जटिल तानेबाने के तहत समझ विकसित करने के फुले के प्रयासों के कारण गेल ऑम्वेट ने उन्हें जाति का पहला ऐतिहासिक भौतिकवादी सिद्धांतकार कहा है।

जाति और जातिवादी पितृसत्ता के बीच के संबंधों को  रेखांकित करते हुए आंबेडकर कहते है कि जाति- व्यवस्था के लिए सजातीय विवाह और स्त्रियों की यौनिकता के नियंत्रण के लिहाज से उँची जातियों खासकर ब्राह्मणों में सती, बलात् विधवापन, बाल-विवाह जैसे अस्त्र ईजाद किए गए। जो जाति ब्राह्मणों के नजदीक हैं उन्होने स्त्री पर ये तीनों ही कायदे लाद रखे हैः जो उनसे तनिक दूर है उन्होंने विधवापन और बाल विवाह अपना रखा है; जो और भी दूर हैं उन्होंने बाल-विवाह अपना रखा है, और जो सबसे दूर हैं वे केवल जाति के नियमों में आस्था बनाए रख कर जाति- व्यवस्था के परिचालन में सहयोग करते रहे हैं। हिंदू धर्म ग्रंथों, मिथकों , स्मृतियों, पुराणों आदि ने शूद्र और स्त्री को एक ही श्रेणी में रखा।

आंबेडकर ने विस्तार से हिंदू समाज में स्त्री की स्थिति और जाति/ वर्ण के पितृसत्ता से उसके संबंधों को समझा और उसे तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने अपनी किताब ‘हिंदू नारी उत्थान और पतन’ में तथ्यों-तर्कों से यह प्रमाणित किया कि बौद्ध धर्म के अन्दर स्त्रियों को बराबरी का अधिकार प्राप्त था और स्त्रियों को पराधीनता और दोयम दर्जे की स्थित में ब्राह्म्णवाद ने डाला। राहुल सांकृत्यायन भी अपनी विविध किताबों में स्त्री-पुरूष के बीच पूर्ण बराबरी की हिमायत करते हैं और भोजपुरी के अपने नाटक ‘ मेहररूअन की दुरदशा’ में स्त्री पराधीनता के विविध रूपों पर कड़ा प्रहार करते हैं।

भारत की आधुनिकता की परियोजना के इन महानायकों के साझा तत्वों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि हिंदू संस्कृति, ब्राहमणवादी मूल्य व्यवस्था, संस्कारों, परंपराओं, वर्ण-जाति व्यवस्था, पितृसत्ता और इसका समर्थन करने वाले ईश्वरी अवतारों, धर्मग्रन्थों और इनके रचयिता ऋषियों-महाऋषियों पर इन लोगों ने निर्णायक प्रहार किया है। फुले की किताब ‘ गुलामगिरी’, ‘ तृतीय रत्न’ ,  आंबेडकर ने अपनी किताब ‘ जाति का विनाश’ और अन्य किताबों और राहुल ने अपनी किताब ‘ तुम्हारी क्षय’ में वर्ण-जाति व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है। यह सभी एक स्वर से स्वीकार करते थे कि हिदुओं के धर्म, ईश्वर, मूल्य व्यवस्था में बुनियादी तौर पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बेहतर मानव समाज के निर्माण में मददगार हो। तीनों जातिवाद और ब्राहमणवादी मूल्य व्यवस्था के समूल उच्छेद के पक्ष में थे। इसके बरक्स किस चीज की स्थापना की जाए, इस बारे में तीनों के दृष्टिकोण में भिन्नता के कुछ तत्व हैं।