भाषाओं की भी अपनी संस्कृति होती है…

हृदयनारायण दीक्षित

संस्कृति सामाजिक व राष्ट्रीय एकता की संवर्द्धक होती है। दुनिया की सभी भाषाओं की अपनी संस्कृति होती है। भाषा गतिशील रहती है। यह अपनी यात्रा में संस्कृति भी साथ ले जाती है। भारतीय भाषाओं के कारण हमारी संस्कृति गतिशील है। राजभाषा हिन्दी के अपने उदात्त संस्कार हैं। मैं एक बार दिल्ली में विचार गोष्ठी में था। मैंने कहा कि जहां उपद्रव है, वहां हिन्दी पहुंचा दीजिए। उपद्रव शांत हो जाएगा। कानून/पुलिस से उपद्रव का शमन अल्पकालिक होता है। भाषा और संस्कृति के प्रभाव दीर्घकालिक होते हैं। लेकिन उन क्षेत्रों में जब हिन्दी पहुंचेगी तो तुलसीदास पहुंचेगे। तुलसीदास पहुंचेगे तो अराजकप्रियता के स्थान पर मर्यादा और शालीनता का विकास होगा। सांस्कृतिक राष्ट्रभाव का विकास होगा। तुलसीदास के पहुंचने से तनावपूर्ण समस्याओं का समाधान संभव है। तुलसीदास एक नाम है। वे एक समर्पित संत थे। हिन्दी में ऐसे अनेक पुरोधा है। वे संस्कृतिक के संवाहक हैं। भाषा के साथ संस्कार भी गति करते हैं। अंग्रेजी सत्ता आई। भारत में अंग्रेजी आई। अंग्रेज आए। अंग्रेजी के साथ यूरोपीय संस्कार आये। संस्कारो के साथ हमारे रहन-सहन में, जीवन पद्धति में, हमारे हालचाल में, प्रीति-प्यार की अभिव्यक्ति में अंतर आया। उच्च वर्ग में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग बढ़ा। अंग्रेजी सत्ता की भाषा थी। अंग्रेजी हनक ठसक की भाषा बनी।


अंग्रेजी में विद्वानों के नाम लेकर हम उदाहरण दें सकते हैं। हमने शेक्सपीयर व कीट्स को पढ़ा है। हमने शेली को पढ़ा है। अंग्रेजी विद्वानों के नाम सुनकर लोगों को लगता है कि बोलने वाला विद्वान है। हम कहें कि हमने वृहदारण्यक उपनिषद् पढ़ा है। हमने तुलसीदास को पढ़ा है। लोगों को लगता है कि कोई नयी बात नहीं है। यह साधारण सी बात है। हमने रामचन्द्र शुक्ल को पढ़ा है। हमने हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़ा है। हमने विद्यानिवास मिश्रा को पढ़ा है। लोगों को लगता है कि यह कोई बड़ी बात नहीं हैं। अंग्रेजी में कुछ पढ़े होते, अंग्रेजी के किसी बड़े व्यक्ति का नाम लेते। बड़ी बात होती। इस तरह हमारी सोच और मानसिकता में अंग्रेजी घर कर गयी है। अंग्रेजी का हमारे भीतर घर कर जाना, सांस्कृतिक दृष्टि से उचित नहीं है। भाषा की दृष्टि से ठीक है। मैंने स्वयं अंग्रेजी पढ़ी है। भाषा के रूप में अंग्रेजी पढ़ना बुरा नहीं है। मैंने स्वयं हिन्दी को ठीक से पढ़ा है। लेकिन हिन्दी का उदाहरण कमतर और अंग्रेजी का उदाहरण महान मानने की वृत्ति उचित नहीं है। इससे संस्कृति बदल जाती है। हमारे आपके घरों में बच्चे, शिक्षित माताएं, बहनें किसी न किसी रूप में अधकचरी अंग्रेजी बोलती हैं। हिन्दी बोलना संस्कृति का धारक है।


हिन्दी हमारे प्राणों में है। भारत हिन्दी में हँसता है। हिन्दी में दुखी होता है। हिन्दी में व्यक्त होता है। हिन्दी में शोक करता है। हिन्दी में उल्लास व्यक्त करता है। हिन्दी में हर्ष और विषाद व्यक्त करता है। हिन्दी हमारे मन, प्राण, विवेक और प्रज्ञा की भाषा है। हिन्दी हमारे अर्पण की तर्पण की, प्रीति की, प्यार की भाषा है। हमारी रहन-सहन शैली की भाषा है। हिन्दी हमारा स्वाभिमान है। लेकिन हिन्दी से कटे लोग भारतीय समाज के संस्कारों से दूर हो रहे हैं और भारत की मूलभूत प्रज्ञा से भी। हिन्दी के पास संस्कृत का उत्तराधिकार है। लेकिन हिन्दी के प्रति उपेक्षा भाव है। यह चिन्ता का विषय है।एक व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में अपनी बोली में चाहे जितना परिवर्तन कर ले, वह जिस समाज में रहता है उसमें उसकी बोली अवश्य समझी जायेगी और इसी ढंग से वह दूसरों की बोली को भी समझेगा। भाषा भी संस्कृति का अंग होती है। इसलिए भाषा के विकास का अध्ययन संस्कृति के विकास के आलोक में होना चाहिए।


हिन्दी से जुड़े कार्यक्रमों में कई आश्चर्यजनक बातें जानकारी में आती हैं। हाईस्कूल इण्टर के छात्र हिन्दी में असफल हो रहे हैं। मातृभाषा में ही असफल होना दुखद है। हिन्दी में बाल साहित्य का सृजन हो रहा है। बच्चों को संस्कार देना अपरिहार्य है। लेकिन बच्चों के लिए लिखना बहुत कठिन है। बच्चों से बात करना भी कठिन है। बच्चों से बातचीत कैसे हो? यह दुनिया के मनोविज्ञान की बहुत बड़ी चुनौती है। यह कठिन बात है कि बच्चों से कैसे बात हो? इसके लिए किसी डिग्री या किसी विश्वविद्यालय की आवश्यकता नहीं है। बच्चों से बात करना आसान नहीं। आखिरकार बच्चों से कैसे संवाद किया जाए? हमारे बाल साहित्य के सर्जकों ने कविता लिखते समय या बाल साहित्य पर कुछ लिखते समय अपने मन में जरूर बच्चों से संवाद किया होगा। ऐसा संवाद कठिन है।


मैं अखबारों में लिखता हूँ। मेरे सामने पाठक ध्यान में रहते हैं। ध्यान में आता है कि पाठक हाईस्कूल या इण्टर तक पढ़ा होगा। हमारा लेख पी0एच0डी0 धारक भी पढ़ेंगे। हिन्दी का विशेष वर्ग भी पढ़़ेगा। हमारे सामने एक पाठक वर्ग दिखाई पड़ता है। प्रत्येक लेखक या रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति शैली होती है। अभिव्यक्ति शैली से नया पाठक वर्ग बनता है। बच्चों के लिए लिखना कठिन है। उनके लिए लिखते समय संस्कारों पर ध्यान देना जरूरी है। बाल साहित्य के सृजन में लेखक के सामने कोई स्पष्ट पाठक वर्ग नहीं दिखाई पड़ता है। मुस्कुराता बच्चा, रोता बच्चा, हंसता बच्चा, गाता बच्चा, गुदगुदाता बच्चा, नाराज बच्चा, ऐसे बच्चों की तमाम तरह की भावनाएं या इमोशन है। अंग्रेजी में फीलिंग एक शब्द है। इमोशन के साथ फीलिंग से जुड़कर कुछ लिखना-पढ़ना निश्चित रूप से बड़ा काम है। लेकिन लोग लिख रहे हैं। वे बधाई के पात्र हैं।


बच्चो की भावना फीलिंग, उनके इमनोशन्स उसकी गहराई में जाना और मां जैसा हो जाना बड़ा काम है। बच्चों के लिए कुछ लिखना, गीत लिखना, लोरी लिखना, गाना, मां हो जाना है। मुझे लगता है कि सभी बाल साहित्यकार पहले मां बने हैं। तब साहित्यकार बने हैं। उनके भीतर का मातृत्व, उनके भीतर का वात्सल्य, उनके भीतर का रस, उनके भीतर खिलता बसंत अथवा अषाढ़ ये सब उनको रससिक्त करते हैं। लेखन सृजनधर्म है। इसे लोक मंगल का साधक होना चाहिए। लेखन का ध्येय मनोरंजन ही नहीं होता। इसे राष्ट्रजीवन का धारक व साधक होना चाहिए। [/Responsivevoice]