लखनऊी शान-पद्मश्री डा0 योगेश प्रवीन-कैलाश चन्द्र पांडेय

पद्मश्री डा0योगेश प्रवीन की 83वीं जयन्ती पर विशेष लेख

लखनऊी शान-पद्मश्री डा0 योगेश प्रवीन,लखनऊ मेरे शहर ! मेरे शहर!मेरे शहर!
अदब की बन की अंजुमन है जहाँ आठों पहर,हर एक रंग में तू मीर है ऐ जाने जिगर
तेरे बगैर जिन्दगी मे कुछ नहीं बेहतर।

सुनाने वाले डा0योगेशप्रवीन ने लखनऊ का नाम दुनियां में  रोशन किया है।यूं तो आम लोगों की नजरों में लखनऊ एक नगर मात्र था जिसकी नवाबी काल की टूटी चिटकी धरोहरों और विरासतों तथा उनके इतिहास से कम ही लोग परिचित थे।योगेशप्रवीन ने लखनऊ की गलियों में बसने वाले अवध और लखनऊ के गौरवशाली इतिहास के जानकारों की तलाश की।टाट के पर्दों वाले घरों में रह रहे उन बुजुर्गों से मिले जिन्हे लखनऊ के,अतीत की जानकारी थी और,नवाबी जमाने से रूबरू हुए।


उन्होंने इन बुजुर्गों को गलियों के फरिश्ते  नाम देते हुए लिखा-


लखनऊ है महज गुम्बजो-मीनार नहीं,यह सिर्फ शहर नहीं कूंचा औ बाजार नहीं।
इसके दामन मे मुहब्बत के फूल खिलते है,इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं।

मुगल काल से अंग्रेजी जमाने तक लखनऊ की गलियों में बसने वाली तहजीब की तलाश और उस पर शोध करके संकलित करने में योगेशप्रवीन ने अपनी उम्र का अच्छा खासा हिस्सा खर्च कर दिया ।यहां की हर गली कूंचे से जुड़ी हस्तियों के बारे में तहकीकात, लखनवी रवायतों, मेल मिलाप के तौर तरीके, बात चीत में शीरीं जुबान के इस्तेमाल और अंदाजे बयां के साथ पहले आप की नज़ाकत और नफ़ासत भरी तहजीब औ तमद्दुन  को अपनी कालजयी कलम से कागज के पन्नों पर  समेटा और अपने संकलित अनुभवों से सजाकर इस अवध और लखनऊ की गंगा-जमनी तहजीब को किताबों की शक्ल देकर सुरक्षित कर दिया ताकि उनके बाद आने वाली पीढियाँ लखनऊ और अवध के इतिहास को जान सकें ।


आने वाली पीढियों के लिए अवध और लखनऊ संबंधी जानकारी योगेशप्रवीन जी ने जिन पुस्तकों में संचित की उनकी संखया दर्जनों में है।दास्ताँने अवध,साहबे आलम, कंगन से कटारा,दास्ताँने लखनऊ, बहारें अवध,डूबता-अवध,ताजदारे अवध,गुलिस्ताने अवध, अवध के भित्ति चित्रांकन, अवध के धरा अलंकरण, लक्षमणपुर की आत्मकथा, आपका लखनऊ, मुहब्बत नामा, हिस्ट्री ऑफ लखनऊ कैंट, लखनऊ की शायरी जहान की जुबान पर,लखनऊ का इतिहास, लखनऊ के मुहल्ले और उनकी शान आदि ।वह ताजिन्दगी लिखते रहे और अपना सारा,ज्ञान किताबों के रूप में लोगों से साझा करते रहे।


गद्य और पद्य दोनो पर उनकी समान पकड़ और समान गति थी।जहां,गद्य में कंचनमृग (कहानी संग्रह),पत्थर के स्वप्न, अंक विलास, अग्नि वीणा के तार लिखी और पीली कोठी जैसा उपन्यास लिखा वहीं पद्य  में मयूरपंख, शबनम,बिरह-बांसुरी, सुमनहार जैसे काव्य संग्रह लिखे।श्री राम चरित मानस  पर आधारित  अपराजिता उनका रचित महाकाव्य है  
उनके मन का दर्द और भावुकता उनके काव्य में झलकती है ।उन्हें शेरों शायरी का भी बड़ा शौक था।उन्होने  शायरों का इतिहास लिखा तो शायरी की परिभाषा भी बयाँ की।
वह पेशे से शिक्षक थे और विद्यांत कालेज में लेक्चरर थे। लखनऊ से अपनी आशिकी  और उसके लिए लिखने को उन्होने अपने शिक्षक के  पेशे के आड़े नहीं आने दिया।  पेशे के प्रति ईमानदारी के कारण वे राष्ट्रीय स्तर के शिक्षक के रूप में अपनी पहचान बनाने मे सफल हुए ।उन्हे 1999में राष्ट्रीय शिक्षकपुरस्कारभी मिला। शिक्षक के दायित्व का निष्ठा से निर्वहन करते हुए वह लखनऊ पर लिखते रहे।उन्हे पढने व सुनने वाले उन्हे लखनऊ का इनसाइक्लोपीडियाा ,अवध इतिहास विद् कहते थे पर उनके व्यक्तित्व में कवि,गीतकार,कहानीकार,उपन्यास कार,नाटककार, निबन्ध लेखक, पटकथालेखक ,अनुवादक, सम्पादक, समीक्षक  और वक्ता सभी समाए थे।

एक ओजस्वी और कुशल वक्ता  के रूप में अपनी अलग  पहचान बनाने वाले योगेशप्रवीन जब अवध,लखनऊ  पर या किसी अन्य साहित्यिक विषय बोलने लगते तो धारा प्रवाह बोलते थे और लोग सांस रोक कर मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे।आकाशवाणी ,दूरदर्शन पर अवध या लखनऊ पर कार्यक्रम हो और वह उसमें  विशेषज्ञ के रूप में न बैठें ये हो नहीं सकता था ।बड़ी बड़ी आई0ए0 एस0 की कोचिंग वाले उन्हे विभिन्न विषयों पर क्लास लेने के लिए बुलाते थे तो अच्छे से अच्छा विद्यार्थी भी उनका समक्ष नौ मस्तक हो जाता था।उनका नाम योगेश श्रीवास्तव से योगेशप्रवीन कैसे हुआ?इसके बारे में पूंछने पर उन्होंने बताया कि जब वह प्रवक्ता बने तो योगेश श्रीवास्तव थे फिर जब लिखना शुरू किया तो अपनी माँ का रखा घर का नाम प्रवीन भी जोड कर अपना नाम योगेश श्रीवास्तव प्रवीन लिखना शुरू कर दिया ।इसी नाम से धर्मयुग  जैसी राष्ट्रीय पत्रिकाओं में उनके लेख छपने लगे तो रायपुर विश्वविद्यालय की एक साहित्यिक संस्था के कुछ छात्र छात्राओं  ने उन्हें पत्र लिखकर उनकी रचनाओं और लेखों की सराहना के साथ,यह सुझाव भी दिया कि आप अपने नाम के साथ कब तक अपने नस्लो-नसब(योगेश जी के शब्दों में)का ऐलान  करते रहेंगे?ये जातिगत खत्ती आपको कहीं कैद करती हुई मालूम देती है अब इसे हटा ही दीजिए।योगेश जी के मन को यह सलाह भा गई और वे योगेश श्रीवास्तव से योगेशप्रवीन हो गए ।


एक बार उनसे किसी ने सवाल किया इतनी वरिष्ठ आयु मे भी आप इतने सक्षम और कार्यकुशल  कैसे हैं और इथनी मेहनत कैसे कर लेते हैं?इसका राज क्या है?उनका जवाब था मेरी माँ के दिए संस्कार ।मैं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सारे काम निपटा लेता हूँ और साले दिन तरो ताजा रहता हूँ ।भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं?इसके जवाब में उनका कहना था सामान सौ बरस के हैं कल की खबर नहीं ।पद्मश्री अलंकरण मिलने के पूर्व किसी ने उन्हें उकेरने की कोशिश यह कह कर  की कि पद्मश्री आपको कभी मिल जाना चाहिए था पर अभी तक आपके नाम पर विचार नहीं हुआ फिर भी आपको संतुष्टि है   तो उन्होंने बहुत संजीदगी से जवाब दिया मुझे अपनी कलम और काम पर पूरा भरोसा है।अच्छे शब्दों सुन्दर विचारों की खुशबू हमेशा बनी रहेगी।मैं ऐसी कोई अभिलाषा नही पालता जिसको लेकर जीना मरना मोहाल हो जाए क्योंकि मुझे पता है सपनों की गोद मे सच्चाईयां कभी नहीं पलती।मै किसी से कोई तमन्ना नहीं रखता।


साहित्यक ज्ञान के  साथ साथ उनके ऐतिहासिक ज्ञान की चर्चा चारो ओर होती रहती थी।लखनऊ ही नहीं मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री तक के लोग उन्हें लखनऊ के इनसाइक्लोपीडिया के नाम से जानते थे।जब भी कोई फिल्म  डायरेक्टर अपनी फिल्म की शूटिंग करने लखनऊ आता था  तो सबसे पहले लखनऊ आकर योगेश जी से सम्पर्क करता था। यूं तो वह लखनऊ में शूट होने वाली बहुत सी फिल्मों से जुडे थे पर यहां सिर्फ़ श्याम बेनेगल और शशी कपूर की फिल्म “जुनून” और मुजफ्फर अली, रेखा की सबसे यादगार फिल्म “उमरावजान ” का ही जिक्र कर रहा हूँ ।


लखनऊ में फिल्म जुनून की शूटिंग के पहले शशी कपूर और उनकी पत्नी नीलोफर, योगेश जी से मिलने गौसनगर स्थित उनके घर पंचवटी आए थे।योगेश जी ने उनको नवाबी जमाने की बनी लखनऊ की कई कोठियां और आउटडोर लोकेशन दिखाईं उनकी ऐतिहासिकता से अवगत कराया।शशी कपूर और श्याम बेनेगल की कल्पना में उभरे लोकेशन के अनुरूप जगह तक उन्हे पहुंचाने वाले योगेश जी ही थे। श्याम बेनेगल ने  योगेश जी द्वारा बताई और दिखाई गई कुछ लोकेशन्स पर योगेश प्रवीन जी द्वारा सुझाए गए  दृश्य भी फिल्माए और फिल्म मे जोड़े। माल के पास नाले के किनारे एक बाग में  झूला झूलते हुए नायिका पर  एक सावन गीत  फिल्माने का सुझाव दिया।शशी कपूर को सुझाव जम गया और तय हो गया कि एक गाना यहां फ़िल्माया जायेगा। यह भी कहा कि गीत भी योगेश जी ही लिखें ।शशी कपूर योगेश जी के साथ पंचवटी मे आकर बैठ गए उसी समय योगेश जी ने  गीत लिखकर दे दिया और गाकर धुन भी बता दी। यह गाना शूट हुआ जिसे मशहूर  पार्श्वगायिका आशा भोंसले ने अपनी आवाज दी।यह गीत हिट हुआ और पर्दे पर गीतकार के रूप में योगेशप्रवीन जी का नाम भी आया।गीत के बोल थे”घिर आई घटा मतवारी  सावन की आई बहार रे।”


उमराव जान के बारे में पूछने पर वे बताया करते थे कि इस फिल्म के बहुत से दृश्यों की शूटिंग लोकेशन उन्होने ही निर्धारित करवाई और बहुत से दृश्य संयोजन भी करवाए।बैकग्राउंड टेक्नोलॉजी में इस्तेमाल होने वाला पर्दा और रेखा के पैरों में पहनी पायल तक बदलवाई।पूरा किस्सा  सुनाते हुए बोले-उमराव जान जब बच्ची होती है और घर से ले जाई जाती है उस समय उसके घर और उसमे रखा सामान  दिखाने के लिए जिस पर्दे का इस्तेमाल हुआ था वही पर्दा  तुरंत वही फिल्माये जा रहे दूसरे दृश्य जिसमे उमरावजान जवान और बडी तवायफ बनने के बाद घर आती है,के लिए भी इस्तेमाल हो रहा था।योगेशप्रवीन जी ने मुजफ्फर अली को ठोकते हुए कहा क्या उमराव के बचपने वाले घर के हालात और सामान 15-20 साल बाद भी वही रहेंगे जरा भी इधर-उधर नहीं होंगे तो मुजफ्फर अली ने तुरंत शूटिंग रोक दी और बाद मे जब दूसरा पर्दा बना तो शूटिंग हुई।


इसी तरह “आंखों में मस्ती के पैमाने हजारों हैं”वाले गीत की शूटिंग चिड़िया घर वाली सफेद बिरादरी में रात मे होनी थी।उस दृश्य मे मुजरा सुनने वालो के हाथ में बंधा गजरा दिखाना था पर गजरे का आर्डर फुलवारी गली में योगेश जी ने दिया था और वह गजरा लेकर पहुंचा नहीं था लिहाजा अपनी जिम्मेदारी समझते हुए योगेश जी फौरन गजरा लेने चले गए और जब लौटे तो सीन के मुताबिक सब कुछ तैयार था ।रेखा भी पूरे साज श्रृंगार के साथ तैयार थीं तभी योगेश जी की नजर रेखा के पैरो पर गई उन्होने चांदी की जगह सोने की पायल (चांदी पर सोने की पॉलिश की हुई)पहन रखी थी।योगेश जी ने मुजफ्फर अली से कहा कि  पैर में सोने की पायल नहीं पहनी जाती इस बात को जब मुजफ्फर अली ने रेखा को बताया तो वह भड़क गईं और बोलीं-उमराव जान लखनऊ की सबसे बड़ी तवायफ है उसके पास बेशुमार सोना है वह हाथ में पहने चाहे पैर में  क्या फर्क पड़ता है?तब योगेश जी ने समझाया अवध मे सोने को लक्ष्मी का रूप मानते हैं इसलिए पैर में पहनना बुरा माना जाता है और यह भी कहा कि इससे अवध के दर्शकों को फिल्म के बारे में गलत संदेश जा सकता है और यहां इसकी सफलता भी प्रभावित हो सकती है।तब रेखा को बात समझ आई और उन्होने वह पायल उतार कर चांदी की पायल पहनी।हालांकि उमराव जान बहुत सफल रही पर इतने सहयोग के बाद भी उनका नाम फिल्म में बतौर सहायक निदेशक नहीं दिया गया जबकि योगेश जी के अनुसार उनसे यह वायदा किया गया था ।इसके बावजूद भी फिल्म की आशातीत सफलता पर उनके अनुसार वह बहुत खुश हुए थे और बधाई भी दी थी पर अपनी अनदेखी की कोई शिकायत किसी से नहीं की।


अभी चन्द दिनों पहले हिन्दी दिवस पर 14 सितम्बर को हमारे ग्रुप पद्मश्री डा0योगेश प्रवीन परिवार के आग्रह पर  हिन्दी संस्थान मे हिन्दी के प्रकांड विद्वानों के मध्य उनका चित्र दिवार पर  टांगा जा रहा  था और हमलोग मौजूद थे।जो व्यक्ति दिवार पर कील लगा रहा था उसने कहा कील पर नही टिकेगी हुक वाला बड़ा किला लाकर लगाना पड़ेगा ।मैंने उसे सौ रूपये का नोट देते हुए कहा ठीक है भैया आप कील लाकर शांम तक लगा दीजियेगा तो उसने रूपये लौटाते हुए कहा-क्यो शर्मिंदा करते हैं साहब?वे जब संस्थान आते थे तो जैसे अध्यक्ष जी से मिलते थे वैसे ही हम लोगो से मिलते थे।उनके जैसे नेक और सज्जन इन्सान बहुत कम होते हैं।उनके प्यार को कौन भूल सकता है।इसके साथ उसकी आंखों में आंसू आ गए।वाकई योगेशप्रवीन जी जैसे नेक सज्जन विद्वान और इन्सान कम ही पैदा होते हैं जिन्हे अपनी काबिलियत का गुमान नहीं होता और वे छोटे बड़े सभी को प्यार और स्नेह से अपना लेते हों।ऐसे ही अनोखे व्यक्तित्व के धनी  के रूप में  लखनऊ और दुनियां में जाने पहचाने जाने वाले योगेश जी लखनऊ के वह फरिश्ते हैं जो लखनऊ की एक गली  से निकले हैं।