यादें गालीना वासीलिएव्ना ज़िंकोवा की

पाँच सितंबर को शिक्षक दिवस के अवसर पर:—-

सीताराम गुप्ता

र्ष 1979-80 की बात है। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में रूसी भाषा और साहित्य का अध्ययन कर रहा था। गालीना वासीलिएव्ना ज़िंकोवा हमें रूसी भाषा और साहित्य पढ़ाती थीं। वो ग्वायर हॉल के पास वाले विदेशी भाषा के प्राध्यापकों के गेस्ट हाउस के एक रूम में रहती थीं। मैं अक्सर उनसे मिलने के लिए उनके गेस्ट हाउस स्थित रूम पर जाता रहता था। वहाँ कई देशों के विभिन्न भाषाओं के प्राध्यापक अपने परिवारों के साथ रहते थे जिनमें सबसे ज़्यादा संख्या रूसियों की थी। गालीना अकेली रहती थीं। एक दिन जब मैं गालीना से मिलने के लिए गया तो पाया कि उनके रूम पर ताला लगा हुआ है। वहाँ बरामदे में कई रूसी बच्चे थे जो खेल में मस्त थे। मैं उन बच्चों के निकट गया और उनसे कहा ज़द्राव्स्त्वुयचे अर्थात् नमस्कार। कुछ बच्चों ने भी ज़द्राव्स्त्वुयचे कहा और बिना मेरी ओर ध्यान दिए अपने खेल में लगे रहे। मैंने उनसे रूसी भाषा में पूछा, ‘‘ क्या तुम बता सकते हो कि गालीना कहाँ गई हैं?’’ एक छह-सात साल की लड़की ने रूसी भाषा में ही जवाब दिया, ‘‘ हम आपकी भाषा नहीं समझते।’’ ‘‘ पर मैं तो तुम्हारी रूसी भाषा में ही बात कर रहा हूँ ,’’ मैंने सभी बच्चों को ध्यानपूर्वक देखते हुए कहा।


मेरे यह कहने पर उन बच्चों को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने खेल को छोड़कर अपनी हथेलियों से अपनी-अपनी आँखे ढाँप लीं और हो ओ, हो ओ की आवाज़ निकालते हुए कुछ दूरी पर जाकर खड़े हो गए और वहाँ से अपनी आँखों पर रखीं कोमल-कोमल सी उँगलियों के बीच से ऐसे देख रहे थे मानो कह रहे हों कि भई हमने तो कभी सोचा भी नहीं था कि हमारे सिवाय यहाँ अन्य कोई रूसी में बात करने वाला हो सकता है इसलिए हमने आपकी बात सुनी ही नहीं पर अब क्या किया जा सकता है? जो हो गया सो हो गया। आगे ध्यान रखेंगे। जब भी छोटे बच्चों से बात कर रहा होता हूँ और वो कोई ऐसी ही बालसुलभ भूल कर बैठते हैं तो प्रायः ये घटना याद आ जाती है और साथ ही अपनी प्रिय रूसी प्राध्यापिका गालीना वासीलिएव्ना ज़िंकोवा की भी जिनके सान्निध्य में दो सालों तक मैंने बहुत कुछ सीखा। वास्तव में इस दौरान गालीना से मुझे बहुत लगाव हो गया था। अन्यथा मत लीजिएगा। गालीना मेरी माँ की उम्र की थीं और वो भी मुझे पुत्रवत स्नेह करती थीं।

मैं जब भी गालीना से मिलने जाता था तो वो हमेशा कॉफी पिलाती थीं। वो ब्लैक कॉफी पीती थीं लकिन मुझे ब्लैक कॉफी पसंद नहीं थी। जब उन्हें इस बात का पता चला तो मैं जब भी उनसे मिलने जाता था वो दूध मँगवाकर रखती थीं और दूध से कॉफी तैयार करती थीं। हमारी चर्चा प्रायः रूसी साहित्य, संस्कृति, कला, लोक-जीवन, फिल्मों आदि पर केंद्रित रहती थी। हम घंटों विभिन्न विषयों पर चर्चा करते रहते। कई दौर कॉफी और खानपान के हो जाते। हमारी चर्चा में कभी तल्ख़ी या वैमनस्य उत्पन्न नहीं हुआ। मैं स्वभाव से थोड़ा ज़िद्दी रहा हूँ और ग़लत बात का विरोध करने में देर नहीं करता लेकिन गालीना ने भारत अथवा भारतीय संस्कृति के बारे में कभी कोई ऐसी बात कही ही नहीं जिसका मुझे दुख होता और विरोध करना पड़ता। भारतीय संस्कृति को जानने-समझने में उनकी दिलचस्पी थी। यहाँ आने के कुछ दिन बाद ही वो योग विषयक एक सचित्र पुस्तक ख़रीद कर ले आईं और रोज़ योगासन करती थीं। आम व तरबूज़ उन्हें ख़ूब पसंद थे।

यद्यपि वो अकेली रहती थीं लेकिन गर्मियों के दिनों में उनका फ्रिज आम और तरबूज़ों से हमेशा भरा रहता था। तरबूज़ भी बड़े-बड़े। दस-दस बारह-बारह किलो के। उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में जितने भी सोवियत संघ से आए हुए रूसी प्राध्यापक या प्रोफेसर थे उनमें से किसी को भी अंग्रेज़ी नहीं आती थी लेकिन गालीना इसका अपवाद थीं। उन्हें अंग्रेज़ी भी बहुत अच्छी तरह से आती थी लेकिन हम प्रायः रूसी भाषा में ही बातचीत करते थे। गालीना को हिन्दी फिल्में देखना भी बहुत पसंद था विशेष रूप से राजकपूर की फिल्में। इसी दौरान मेरा विवाह भी हुआ था। विवाह से पूर्व मैंने भावी पत्नी आशा को गालीना से मिलवाया था। वो अत्यंत प्रसन्न हुई थीं आशा से मिलकर। वो आशा को आशा नहीं अपितु नाज्या या नाज्येज़दा कहकर पुकारती थीं जो आशा शब्द का रूसी अनुवाद है। हम तीनों प्रायः मिलते थे और हमने एक साथ कई हिन्दी फ़िल्में भी देखीं। आशा के प्रति मेरे व्यवहार में उन्हें अपने मानकों के अनुसार जहाँ कहीं भी असामान्य लगता था वो मुझे फ़ौरन टोक देती थीं।


राजकपूर की फिल्म आवारा के गीत ‘आवारा हूँ ….’ का रूसी अनुवाद ‘ब्राज्यागा या …’’ मुझे कई बार गाकर सुनाया। एक बार उन्होंने मुझे राजकपूर की फिल्म के एक गीत की दो धुनें सुनाईं और कहा कि उन्हें इसका रिकार्ड चाहिए। गालीना को फिल्म का नाम नहीं याद आ रहा था। जब मैंने उनसे पूछा कि इस गाने में क्या विशेषता है तो उन्होंने बतलाया कि इस गाने में एक भारतीय धुन है और एक रूसी धुन है। इस आधार पर मैंने रिकार्ड खोजने की कोशिश की पर संभव न हुआ। काफी दिनों के बाद न जाने कैसे (अब याद नहीं) एक दिन मैं वो रिकार्ड लाने में सफल हो गया। वो रिकार्ड था फिल्म मेरा नाम जोकर का। मैंने उनकी पसंद के और अपनी पसंद के कई रिकार्ड और पुस्तकें उन्हें भेंट में दीं। उन्होंने भी मुझे कई दर्जन पुस्तकें और रूसी संगीत के रिकार्ड दिए। लगभग एक दशक तक मैं प्रायः उन्हें सुनता था। बाद में मेरा रिकार्ड प्लेयर ख़राब होने और इसका प्रचलन समाप्त होने से ये सिलसिला भी टूट गया। आज भी उनके दिए कुछ रिकार्ड मेरे पास सुरक्षित हैं।


एक और घटना याद आ रही है। गालीना को फूल बहुत पसंद थे। मैं जब भी उनसे मिलने जाता तो कोई न कोई मिष्टान्न अवश्य ले जाता था। वो उन्हें पसंद करती थीं लेकिन साथ ही कहती थीं कि कमरे में सजाने के लिए उन्हें फूल चाहिएँ। उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास कमला नगर अथवा बैंग्लो रोड पर कहीं भी फूल नहीं बिकते थे। एक दिन मैंने देखा कि उनके कमरे में एक फूलदान में कुछ फूल सजे हुए थे। मैंने जब ये पूछा कि फूल कहाँ से मँगवाए तो पहले तो वो काफी देर तक हँसती रहीं और फिर कहा कि गाना गाकर पाए हैं। कैसे?

उन्होंने बतलाया कि सामने के कई पार्कों में बहुत सुंदर-सुंदर फूल हैं लेकिन माली तोड़ने नहीं देते। शाम के समय हम सभी गेस्ट हाउस वाले इन पार्कों में चले जाते हैं ओर वहाँ जाकर नाचने-गाने लगते हैं। हमारा नाच- गाना देखने के लिए आसपास के सभी लोग और माली वगैरा हमारे चारों ओर इकट्ठे हो जाते हैं। गलीना ने आगे बतलाया कि जब सब लोग नाच-गाना देखने में मस्त हो जाते हैं तो हममें से कुछ लोग चुपचाप जाकर कुछ फूल तोड़कर अपने पास रखे लंबे से थैले में रख लेते हैं और घर आकर उन्हें फूलदान में सजा देते हैं। वो फूलों को हाथों से नहीं तोड़ती थीं अपितु कैंची की मदद से सावधानी से उन्हें काटती थीं। आज दिल्ली में हर जगह खूब फूल मिलते हैं। काश! आज वो यहाँ होतीं। उनके लिए फूलों की कमी नहीं रहने देता। वो प्रायः मुझसे पूछती थीं कि मेरी माँ मुझे क्या कह कर पुकारती हैं?

मैं भी तुम्हें उसी नाम से पुकारूँगी। उनकी उम्र ठीक उतनी ही थी जितनी मेरी माँ की। मेरी माँ छियानवे-सत्तानवे वर्ष पूरे करके जनवरी 2022 में हमसे विदा ले चुकी हैं। गालीना से उन दो वर्षों के बाद कभी नही मिला। कुछ समय के उपरांत पत्र-व्यवहार भी समाप्त हो गया पर उनकी याद न आई हो ऐसा कभी नहीं हुआ। कल्पना कर लेता हूँ कि गालीना अब कैसी दिखलाई देती होंगी, कैसे चलती होंगी, कैसे बोलती होंगी।