“माननीयों” को पेंशन तो फिर कर्मचारियों को क्यों नहीं..!

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"माननीयों" को पेंशन तो फिर कर्मचारियों को क्यों नहीं

लाखों कर्मचारियो की पुरानी पेंशन की मांग को अनदेखा करने से पहले जरा “माननीयो” की पेंशन पर तो नजर डाल लीजिए.माननीयों को एक दिन शपथ लेने के बाद आजीवन पेंशन, लोक सेवकों को 30 साल में भी पेंशन नहीं. “माननीयों” को पेंशन तो फिर कर्मचारियों को क्यों नहीं..!

राजू यादव
राजू यादव

दिल्ली के रामलीला मैदान में पुरानी पेंशन की मांग को लेकर लाखों सरकारी कर्मचारियो ने प्रदर्शन किया. ये कर्मचारी देश भर से जुटे थे. दरअसल भारत में सरकारी कर्मचारियों की पेंशन 2004 से ही बंद कर दी गई थी. मोदी सरकार ने सेना के लिए ‘अग्निपथ’ योजना लाकर सैनिकों की भी पेंशन एक तरह से बंद कर दी है. इस योजना के माध्यम से भर्ती ‘अग्निवीरों’ को 4 साल बाद ही सेवामुक्त कर दिया जाएगा. अब ये पेंशन के हकदार नहीं है. ऐसे मे सांसद और विधायकों की पेंशन पर भी सवाल उठने लगे हैं.जिस देश के लोग आजीवन अपनी सेवाएं देने के बाद भी अपना बुढ़ापा सुरक्षित करने के लिए सरकारी पेंशन के हकदार नहीं हैं. वहां के सांसद-विधायक एक बार चुनने के बाद आजीवन पेंशन का सुख भोगते हैं. जब माननीयों के खुद के हित की बात आती है तो वह एड़ी-चोटी का जोर लगाकर अपने अधिकार ले लेते हैं.


सबसे बड़ी बात तो यह है कि अग्निवीर यदि चार साल तक नौकरी करे तो भी उसे पेंशन नही दी जाएगी. लेकिन यदि सांसद एक दिन भी सांसद बन जाए तो आजीवन उसे पेंशन भत्ता मिलता रहेगा. अगर कोई भी एक दिन के लिए भी सांसद या विधायक बन जाता है तो उसे आजीवन 25 हजार रु प्रतिमाह पेंशन मिलती है. सिर्फ पेंशन ही नहीं, बल्कि और भी कई सारी सुविधाएं मिलतीं हैं. इतना ही नहीं, अगर कोई सांसद के बाद विधायक बन जाता है तो उसे सांसद की पेंशन के साथ-साथ विधायक की सैलरी भी मिलेगी और विधायक पद से हटने के बाद सांसद और विधायक, दोनों की पेंशन मिलती है. इसके अलावा, पूर्व सांसद अपने किसी साथी के साथ किसी भी ट्रेन में सेकंड एसी में फ्री यात्रा कर सकते हैं. अगर वो अकेले यात्रा करते हैं तो फर्स्ट एसी में भी यात्रा कर सकते हैं.

लोकसभा का एक कार्यकाल यानी 5 साल पूरा करने पर 25 हजार रुपये पेंशन के हकदार हो जाते हैं. इसी तरह अगर राज्यसभा का एक कार्यकाल यानी 6 साल पूरा कर लिया तो हर महीने 27 हजार रुपये की पेंशन मिलती है. जैसे, राज्यसभा सांसद का कार्यकाल 6 साल रहता है तो उन्हें हर महीने 27 हजार रुपये पेंशन मिलती है. अभी विधायकों की दी जाने वाली पेंशन उनके कार्यकाल के आधार पर दी जाती है. जैसे मान लीजिए किसी एक विधायक ने पांच बार चुनाव जीता है तो उस व्यक्ति को पांच बार के हिसाब से पेंशन मिलेगी. जैसे एक बार के लिए 50 हजार पेंशन दी जाती है तो पांच बार जीतने वाले विधायक को करीब ढाई लाख रुपये पेंशन दी जाती है. लेकिन, अब उसे एक पेंशन के आधार पर करने का फैसला किया गया है.


अगर कोई नेता पूर्व सासंद की पेंशन ले रहा है और फिर से मंत्री बन जाता है तो उसे मंत्री पद के वेतन के साथ ही पेंशन मिलती है. इसके अलावा जैसे मान लीजिए कोई नेताजी पांच बार सासंद बनते हैं तो उनकी पेंशन में भी उसी हिसाब से बढ़ोतरी हो जाएगी. यानी जितने ज्यादा दिन सासंद रहेगा उतनी ही ज्यादा पेंशन मिलेगी. अगर कोई व्यक्ति राज्यसभा और लोकसभा दोनों सदनों का सदस्य रह चुका है तो उसे दोनों सदनों के पूर्व सांसद की पेंशन मिलती है. लोकसभा और राज्यसभा सांसदों की सैलरी और पेंशन के लिए 1954 से कानून है समय-समय में इसमें संशोधन होते रहते हैं. लोकसभा का एक कार्यकाल यानी 5 साल पूरा करने पर 25 हजार रुपये पेंशन के हकदार हो जाते हैं .इसी तरह अगर राज्यसभा का एक कार्यकाल यानी 6 साल पूरा कर लिया तो हर महीने 27 हजार रुपये की पेंशन मिलती है. राज्यसभा सांसद का कार्यकाल 6 साल रहता है तो उन्हें हर महीने 27 हजार रुपये पेंशन मिलती है.अगर कोई दो बार यानी 12 साल तक राज्यसभा सांसद रहता है तो उसे 39 हजार रुपये पेंशन हर महीने मिलती है. संसद सदस्य वेतन तथा भत्ता कानून के तहत किसी पूर्व दिवंगत सदस्य के पति/पत्नी और आश्रित भी दिवंगत सदस्य की मृत्यु के समय उसे मिलने वाली पेंशन का 50 प्रतिशत पाने के हकदार है और यह पेंशन पति/पत्नी को शेष जीवन तक मिलती है. एक आरटीआई के अनुसार कुल मिलाकर लोकसभा और राज्यसभा के 4,796 पूर्व सांसद पेंशन ले रहे हैं. इनकी पेंशन पर हर साल 70 करोड़ रुपये खर्च होते हैं. इनके अलावा 300 पूर्व सांसद ऐसे हैं, जिनका निधन हो चुका है और उनके परिवार वालों को पेंशन मिल रही है.आर्थिक रूप से मजबूत कई सारे पूर्व सांसद ऐसे हैं, जो पेंशन का लाभ ले रहे हैं. सांसद-विधायकों की पेंशन का विरोध इसलिए भी किया जाना चाहिए क्योंकि इनके पास पहले से ही काफी संपत्ति होती है. हालांकि इनमें भी कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन ये लोग अपनी पेंशन छोड़ने की बात नहीं करते.ऐसे सांसद जो इनकम टैक्स के 30% स्लैब में आते हैं, उन्हें भी पेंशन का लाभ दिया जा रहा है .इनमें राहुल बजाज, संजय डालमिया, सुभाष चंद्रा और साउथ फिल्मों के सुपरस्टार चिरंजीवी जैसे अमीर शामिल हैं…..

सरकारी कर्मचारी अपनी पूरी जवानी खपाता है.गिनी-चुनी छुट्टियां छोड़ रोजाना 8 घण्टे तो कई बार 2-4 घंटे ज्यादा काम करता है. हर महीने नपी-तुली पगार से घर चलाता है. जवानी में बीवी की ख्वाहिशें तो बाद में बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए कड़ी मेहनत करता है. तनख्वाह से पेट काट कर वह घर, परिवार की जरूरतों को पूरी करता है. अपनी वफादारी और मेहनत के दम पर 5-10 साल में कभी तरक्की पाता है तो ओहदा थोड़ा बढ़ जाता है, कुछ पगार बढ़ जाती है. बस यही सब उसकी खुशी है. अधेड़ होते-होते बच्चों की पढ़ाई,नौकरी,शादी और सबसे आखिर परिवार खातिर आशियाने का सपना बुनता है जो कभी पूरा होता है तो कभी नहीं. तमाम जरूरतें, जिम्मेदारियों से लड़ते, जूझते एक दिन रिटायर होता है. एक छोटी सी उम्मीद बचती है जो उसके पगार से उसी के भविष्य के लिए काटी गई रकम में कुछ सरकार इमदाद मिलाकर उसे एक मुश्त मिलती है. इसी फंड से अपनी बुढ़ापे की जरूरतों का बड़ा ख्वाब पाल लेता है. इस तरह 30-35 बरस लगातार काम करते-करते कब जवान से बूढ़ा हो जाता है, पता ही नहीं चलता. रिटायर होने के बाद जिस पेंशन का हकदार होता है उससे हर महीने मिलने वाली थोड़ी सी रकम से अपनी बची जिंदगी गुजारना शुरू कर देता है. यही एक सरकारी नौकरीपेशा का सच है जिसे जीते-जीते देखते ही देखते वह जवान से बूढ़ा फिर लाचार हो जाता है.

“माननीयों” को पेंशन तो फिर कर्मचारियों को क्यों नहीं

कर्मचारियों की पुरानी पेंशन खजाने पर बोझ तो विधायक-सांसदों को पुरानी पेंशन क्यों…..?

एक जनवरी 2004 के बाद भर्ती हुए केंद्रीय कर्मियों के लिए पुरानी पेंशन योजना की जगह नई पेंशन योजना (NPS) लागू हुई और उसके बाद राज्य सरकारों ने अलग-अलग तारीखों पर इसे लागू किया. कर्मचारियों के लिए तो 19 साल पहले ही पुरानी पेंशन व्यवस्था को खत्म कर दिया गया, लेकिन देश में अभी भी पूर्व सांसदों और पूर्व विधायकों को पुराने तर्ज पर ही पेंशन और दूसरी सुविधाएं भी मिलती हैं. जब केंद्र सरकार ने ओपीएस की जगह एनपीएस लाने का फैसला किया था तो इसके पीछे बड़ी वजह सरकारी खजाने पर पड़ रहे बोझ को बताया गया था. सरकारी खजाने की स्थिति को बेहतर करने का हवाला देकर पुरानी पेंशन व्यवस्था की जगह नई पेंशन व्यवस्था लागू की गई थी, जिसमें सरकार की देनदारी कम हो गई थी और कर्मचारियों का अंशदान बढ़ गया था.

जब देश में एक संविधान एक राष्ट्र की परिकल्पना को सरकार द्वारा साकार किया जा रहा है. तो फिर कर्मचारियों के साथ क्यों भेदभाव हो रहा है. एक ओर हमारे विधायकों, सांसदों को एक बार निर्वाचित होने पर पेंशन की पात्रता है, और जीवन भर पेंशन सहित अन्य योजनाओं का लाभ लेते हैं और परिवार पेंशन का भी प्रावधान है. दूसरी तरफ कर्मचारी 30 से 35 साल सरकारी सेवा करने के बाद भी पेंशन का हकदार नहीं यह न्याय संगत नहीं है.जब कर्मचारियों अधिकारियों को पेंशन की पात्रता नहीं है. फिर हमारे विधायक सांसदों को पेंशन का लाभ क्यों दिया जा रहा है. यह देश की जनता के लिए सोचनीय प्रश्न है. हमारे विधायक,सांसद जो पेंशन प्राप्त करते हैं वह देश के टैक्स पेयर और जनता की मेहनत के द्वारा सरकार को दी गई टैक्स की राशि से सुख सुविधा भोग रहे हैं. विधायक,सांसदों की पेंशन भी बंद करना चाहिए.

अब जरा विधायको को भी देख लेते है आपको जानकर भारी आश्चर्य होगा कि भारत के कई राज्य तो ऐसे हैं, जहां के पूर्व विधायकों की पेंशन सांसदों से ज्यादा है.पंजाब के विधायकों को प्रतिमाह 75000 रुपए पेंशन मिलती है.जबकि जो विधायक कई बार जीते हैं उनकी पेंशन 3 लाख प्रतिमाह से भी ज्यादा पहुंच रही थी.आम आदमी पार्टी सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान ऐलान किया कि अब से विधायकों को एक ही कार्यकाल की पेंशन दी जाएगी. विधायकों की पेंशन को लेकर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रावधान हैं. कुछ राज्यों में कार्यकाल की समयसीमा भी तय की गई है भारत के 4 राज्य ऐसे भी हैं, जहां ये सीमा तय की गई है उदाहरण के लिए ओडिशा में एक साल, सिक्किम और त्रिपुरा में 5 साल और असम में यह सीमा 4 साल है. ऐसा एक फार्मूला सांसदों के लिए भी लाया गया था, लेकिन 2004 में इसे हटा लिया गया था. विधायकों को रिटायरमेंट के बाद पहले 5 सालों में 25 हजार और उसके बाद प्रतिवर्ष 2 हजार रुपए अलग से मिलते हैं. कई राज्यों में विधायक 8-8 बार की पेंशन ले रहे हैं. राजस्थान की ही बात करें तो एक बार के पूर्व विधायक को 35 हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन मिलती है. अगर वह दूसरी बार विधायक बनता है तो पेंशन राशि में 8000 रुपए की वृद्धि हो जाती है. इसके बाद नेता जितनी बार भी विधायक बनेगा, उतनी ही बार 8-8 हजार रुपए की पेंशन राशि बढ़ जाएगी. आरटीआई में मिली सूचना के मुताबिक हरियाणा के कुल 275 पूर्व विधायकों की पेंशन व 128 पूर्व विधायकों की फैमिली पेंशन पर पेंशन पर कुल 29.51 करोड़ रुपए सालाना खर्च किए जा रहे हैं. महाराष्ट्र में विधायकों की पेंशन पर सालाना 72 करोड़ खर्च होते हैं. केरल में तो कमाल की व्यवस्था है. वहा यदि कोई मंत्री अपने कार्यालय में दो साल के लिए स्टाफ की नियुक्ति करता है और इसके बाद उसकी सेवा समाप्त होने पर उस स्टाफ को आजीवन पेंशन मिलती है.

पेंशन में ऐसी विसंगतियाँ क्यों…? एक व्यक्ति, एक पगार, एक पेंशन माननीयों पर क्यों नहीं लागू होना चाहिए? हालांकि यह नीतिगत मामला है और जगजाहिर है नीति बनाने वाले कौन होते हैं? उससे भी बड़ा सवाल और पूर्ण सत्य यह कि इन्हें इस मुकाम तक पहुंचा कर पगार और पेंशन के काबिल बनाने वाला मतदाता ही इनकी बनाई ऊल-जलूल नीतियों का शिकार होता है! सवाल यही कि सुनेगा कौन? विडंबना देखिए करीब 82 प्रतिशत सांसद करोड़पति हैं, प्रति व्यक्ति आय 10534 रुपये से भी कम है, बड़ी तादाद में लोगों को दो जून की रोटी नसीब न हो उसी देश के जनता के लिए, जनता द्वारा चुने जनप्रतिनिधि जनता की गाढ़ी कमाई से जुटाई रकम को किस तरह पेंशन, पगार के रूप में पाते हैं. यहां तक कि कोई दुबारा सांसद बनता है तो पेंशन में दो हजार रुपए महीने का इजाफा हो जाता है.1954 में लागू हुए सांसदों के वेतन, भत्ता एवं पेंशन अधिनियम में 29 बार माननीयों ने मनमाने और सुविधाजनक संशोधन किए हैं. हालाकि संविधान सभा ने सांसदों की पेंशन का प्रावधान नहीं किया था. बाद में संशोधन के जरिये पेंशन को जोड़ा गया. धीरे-धीरे सभी राज्यों ने यही किया. पूर्व सांसदों व पूर्व विधायकों के लिए सौगातों की झड़ी लग गई.देखिए कैसी विसंगति है. 2018 के आंकड़े बताते हैं कि देश में विधायकों पर हर साल लगभग 1100 करोड़ तथा सांसदों पर लगभग 30 अरब रुपये खर्च होते हैं. यह उस देश के माननीयों के जलवे हैं जहां महज 600 रुपयों की सामाजिक सुरक्षा पेंशन से गुजारे करने के लिए लाखों लोग रोज दफ्तरों का चक्कर काटते, गिड़गिड़ाते देखे जाते हैं. वहीं अभी सरकारी कर्मचारी अपनी एक पेंशन के फेर में ओपीएस यानी पुरानी पेंशन और एनपीएस यानी नई पेंशन योजना के गुणाभाग में ही उलझा हुआ किसी निष्कर्ष नहीं पहुंच पा रहा है.वहीं सांसदों को 1976 में 300 रुपये मिलने वाली पेंशन 1985 में 500 रुपये, 1993 में 1400 रुपये, 1998 में 2500 रुपये, 2001 में 3000 रुपये, 2006 में 8000 रुपये, 2010 में 20,000 रुपये और 2018 में 25,000 रुपये कर दी गई है.


देश में जहां वृद्धावस्था पेंशन सिर्फ दो हजार रुपए है लेकिन पूर्व सांसदों और विधायकों को तमाम सुविधाओं के साथ हर महीने लाखों रुपए पेंशन के रूप में मिलते हैं. पूर्व सांसद या विधायक का निधन होने की स्थिति में यह लाभ उनके जीवन साथी/ आश्रित को जीवन भर मिलता है. एक अनुमान के मुताबिक देश के सभी पूर्व सांसदों और विधायकों को पेंशन देने में प्रतिवर्ष 500 करोड़ से ज्यादा धन खर्च करना पड़ता है. जनप्रतिनिधियों की पेंशन पर रोक लगाने को लेकर याचिकाएं मध्य प्रदेश और इलाहबाद हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में दायर की जा चुकी हैं, लेकिन सभी को खारिज कर दिया गया ऐसे हैं….. “माननीयों” को पेंशन तो फिर कर्मचारियों को क्यों नहीं..!