“सबमें राम सबके राम” के बिना अयोध्या अयोध्या नहीं-राष्ट्रपति

  • राम एवं राम कथा के मूल आदर्शो पर चलकर एक आदर्श समाज की स्थापना की जा सकती है।
  • राष्ट्रपति ने अपने नाम के नामकरण में भी अपने परिवार की श्रद्वा एवं उनके आदर्शो को प्रेरक बताया।
  • कोविंद देश के पहले राष्ट्रपति बन गए हैं जिन्होंने रामजन्म भूमि पहुचकर रामलला के दर्शन भी किये। 

अयोध्या। राष्ट्रपति ने कहा है कि राम के बिना अयोध्या, अयोध्या नहीं है। अयोध्या तो वही है, जहां राम हैं। इस नगरी में प्रभु राम सदा के लिए विराजमान हैं। इसलिए यह स्थान सही अर्थों में अयोध्या है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अयोध्या के रामकथा पार्क में रामायण कान्क्लेव के उद्घाटन के बाद लोगों को सम्बोधित कर रहे थे। राष्ट्रपति ने कहा कि अयोध्या का शाब्दिक अर्थ है, जिसके साथ युद्ध करना असंभव हो। रघु, दिलीप,अज,दशरथ और राम जैसे रघुवंशी राजाओं के पराक्रम एवं शक्ति के कारण उनकी राजधानी को अपराजेय माना जाता था। इसलिए इस नगरी का अयोध्या नाम सर्वदा सार्थक रहेगा। उन्होंने कहा कि रामायण में दर्शन के साथ-साथ आदर्श आचार संहिता भी उपलब्ध है, जो जीवन के प्रत्येक पक्ष में हमारा मार्गदर्शन करती है। संतान का माता-पिता के साथ, भाई का भाई के साथ, पति का पत्नी के साथ, गुरु का शिष्य के साथ, मित्र का मित्र के साथ, शासक का जनता के साथ और मानव का प्रकृति एवं पशु-पक्षियों के साथ कैसा आचरण होना चाहिए, इन सभी आयामों पर, रामायण में उपलब्ध आचार संहिता, हमें सही मार्ग पर ले जाती है। राष्ट्रपति ने कहा कि रामचरितमानस में एक आदर्श व्यक्ति और एक आदर्श समाज दोनों का वर्णन मिलता है। रामराज्य में आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ आचरण की श्रेष्ठता का बहुत ही सहज और हृदयग्राही विवरण मिलता है -नहिं दरिद्र कोउ, दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध, न लच्छन हीना।।

ऐसे अभाव-मुक्त आदर्श समाज में अपराध की मानसिकता तक विलुप्त हो चुकी थी। दंड विधान की आवश्यकता ही नहीं थी। किसी भी प्रकार का भेद-भाव था ही नहीं। राष्ट्रपति ने रामचरित मानस की चैपाई का उदाहरण दिया कि दंड जतिन्ह कर भेद जहँ, नर्तक नृत्य समाज। जीतहु मनहि सुनिअ अस, रामचन्द्र के राज॥ उन्होंने कहा कि यह दैव तो कायर के मन का एक आधार है यानी तसल्ली देने का तरीका है। आलसी लोग ही भाग्य की दुहाई दिया करते हैं। ऐसी सूक्तियों के सहारे लोग जीवन में अपना रास्ता बनाते चलते हैं। रामनाथ कोविंद ने कहाकि रामचरित-मानस की पंक्तियां लोगों में आशा जगाती हैं, प्रेरणा का संचार करती हैं और ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं। आलस्य एवं भाग्यवाद का त्याग करके कर्मठ होने की प्रेरणा अनेक चैपाइयों से मिलती है कादर मन कहुं एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।। राष्ट्रपति ने रामकथा के महत्व के विषय में गोस्वामी तुलसीदास के कथन का हवाला दिया, रामकथा सुंदर करतारी, संसय बिहग उड़ावनि-हारी। अर्थात राम की कथा हाथ की वह मधुर ताली है, जो संदेहरूपी पक्षियों को उड़ा देती है। उन्होंने कहाकि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि रामायण और महाभारत, इन दोनों ग्रन्थों में, भारत की आत्मा के दर्शन होते हैं। यह कहा जा सकता है कि भारतीय जीवन मूल्यों के आदर्श, उनकी कहानियां और उपदेश, रामायण में समाहित हैं। रामायण ऐसा विलक्षण ग्रंथ है जो रामकथा के माध्यम से विश्व समुदाय के समक्ष मानव जीवन के उच्च आदर्शों और मर्यादाओं को प्रस्तुत करता है।

राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि रामायण के प्रचार-प्रसार हेतु उत्तर प्रदेश सरकार का यह प्रयास भारतीय संस्कृति तथा पूरी मानवता के हित में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि रामायण में राम निवास करते हैं। इस अमर आदिकाव्य रामायण के विषय में स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने कहा है-यावत् स्था-स्यन्ति गिरयरू सरित-श्च महीतले तावद् रामायण-कथा लोकेषु प्र-चरिष्यति। अर्थात जब तक पृथ्वी पर पर्वत और नदियां विद्यमान रहेंगे, तब तक रामकथा लोकप्रिय बनी रहेगी। रामकथा की लोकप्रियता भारत में ही नहीं बल्कि विश्वव्यापी है। उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित-मानस, भारत के पूर्वी हिस्से में कृत्तिवास रामायण, दक्षिण में कंबन रामायण जैसे रामकथा के अनेक पठनीय रूप प्रचलित हैं। राष्ट्रपति ने विश्व के अनेक देशों में रामकथा की प्रस्तुति का उल्लेख किया और कहा कि इन्डोनेशिया के बाली द्वीप की रामलीला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मालदीव, मारिशस, त्रिनिदाद व टोबेगो, नेपाल, कंबोडिया और सूरीनाम सहित अनेक देशों में प्रवासी भारतीयों ने रामकथा एवं रामलीला को जीवंत बनाए रखा है। रामकथा का साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव मानवता के बहुत बड़े भाग में देखा जाता है। भारत ही नहीं विश्व की अनेक लोक-भाषाओं और लोक-संस्कृतियों में रामायण और राम के प्रति सम्मान और प्रेम झलकता है।

रामचरितमानस की पंक्तियां लोगों में आशा जगाती हैं, प्रेरणा का संचार करती हैं और ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं। आलस्य एवं भाग्यवाद का त्याग करके कर्मठ होने की प्रेरणा अनेक चौपाइयों से मिलती है-‘कादर मन कहुं एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।’ उन्होंने कहा कि यह दैव तो कायर के मन का एक आधार है यानी तसल्ली देने का तरीका है। आलसी लोग ही भाग्य की दुहाई दिया करते हैं। ऐसी सूक्तियों के सहारे लोग जीवन में अपना रास्ता बनाते चलते हैं।रामकथा के महत्व के विषय में गोस्वामी तुलसीदास के कथन का हवाला दिया-‘रामकथा सुंदर करतारी, संसय बिहग उड़ावनि-हारी।’ अर्थात राम की कथा हाथ की वह मधुर ताली है, जो संदेहरूपी पक्षियों को उड़ा देती है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि रामायण और महाभारत, इन दोनों ग्रन्थों में, भारत की आत्मा के दर्शन होते हैं। यह कहा जा सकता है कि भारतीय जीवन मूल्यों के आदर्श, उनकी कहानियां और उपदेश, रामायण में समाहित हैं।राष्ट्रपति ने कहा कि रामायण ऐसा विलक्षण ग्रंथ है जो रामकथा के माध्यम से विश्व समुदाय के समक्ष मानव जीवन के उच्च आदर्शों और मर्यादाओं को प्रस्तुत करता है। उन्होंने विश्वास जताया कि रामायण के प्रचार-प्रसार हेतु उत्तर प्रदेश सरकार का यह प्रयास भारतीय संस्कृति तथा पूरी मानवता के हित में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।रामायण में राम निवास करते हैं। उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस, भारत के पूर्वी हिस्से में कृत्तिवास रामायण, दक्षिण में कंबन रामायण जैसे रामकथा के अनेक पठनीय रूप प्रचलित हैं। राष्ट्रपति जी ने विश्व के अनेक देशों में रामकथा की प्रस्तुति का उल्लेख किया और कहा कि इन्डोनेशिया के बाली द्वीप की रामलीला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मालदीव, मॉरिशस, त्रिनिदाद व टोबेगो, नेपाल, कंबोडिया और सूरीनाम सहित अनेक देशों में प्रवासी भारतीयों ने रामकथा एवं रामलीला को जीवंत बनाए रखा है। रामकथा का साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव मानवता के बहुत बड़े भाग में देखा जाता है। भारत ही नहीं विश्व की अनेक लोक-भाषाओं और लोक-संस्कृतियों में रामायण और राम के प्रति सम्मान और प्रेम झलकता है।


राष्ट्रपति ने कहा कि उनके माता-पिता और बुजुर्गों ने जब उनका नामकरण किया होगा, तब उन सब में भी संभवतः रामकथा और प्रभु राम के प्रति वही श्रद्धा और अनुराग का भाव रहा होगा जो सामान्य लोकमानस में देखा जाता है। उन्होंने कहा कि रामायण में राम-भक्त शबरी का प्रसंग सामाजिक समरसता का अनुपम संदेश देता है। महान तपस्वी मतंग मुनि की शिष्या शबरी और प्रभु राम का मिलन, एक भेद-भाव-मुक्त समाज एवं प्रेम की दिव्यता का अद्भुत उदाहरण है।अपने वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम ने युद्ध करने के लिए अयोध्या और मिथिला से सेना नहीं मंगवाई। उन्होंने कोल, भील, वानर आदि को एकत्रित कर अपनी सेना का निर्माण किया। अपने अभियान में जटायु से लेकर गिलहरी तक को शामिल किया। आदिवासियों के साथ प्रेम और मैत्री को प्रगाढ़ बनाया। रामायण कॉन्क्लेव की सार्थकता सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि राम-कथा के मूल आदर्शों का सर्वत्र प्रचार-प्रसार हो तथा सभी लोग उन आदर्शों को अपने आचरण में ढालें। उन्होंने कहा कि समस्त मानवता एक ही ईश्वर की संतान है, यह भावना जन-जन में व्याप्त हो, यही इस आयोजन की सफलता की कसौटी है।रामचरित मानस की एक अत्यंत लोकप्रिय चौपाई ‘सीय राममय सब जग जानी, करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस पंक्ति का भाव यह है कि हम पूरे संसार को ईश्वरमय जानकर सभी को सादर स्वीकार करें। हम सब, प्रत्येक व्यक्ति में सीता और राम को ही देखें। राम सबके हैं, और राम सब में हैं। उन्होंने सबसे इस स्नेहपूर्ण विचार के साथ अपने दायित्वों का पालन करने का आह्वान किया।सार्वजनिक जीवन में प्रभु राम के आदर्शो को महात्मा गांधी ने आत्मसात किया था। वस्तुतः रामायण में वर्णित प्रभु राम का मर्यादा पुरुषोत्तम रूप प्रत्येक व्यक्ति के लिए आदर्श का स्रोत है। गांधी जी ने आदर्श भारत की अपनी परिकल्पना को रामराज्य का नाम दिया है। बापू की जीवनचर्या में राम-नाम का बहुत महत्व रहा है।


राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि मैं तो समझता हूं कि मेरे परिवार में जब मेरे माता-पिता और बुजुर्गों ने मेरा नामकरण किया होगा, तब उन सब में भी संभवतः रामकथा और प्रभु राम के प्रति वही श्रद्धा और अनुराग का भाव रहा होगा जो सामान्य लोकमानस में देखा जाता है। राष्ट्रपति ने अपने भाषण में जोड़ा कि रामायण में राम-भक्त शबरी का प्रसंग सामाजिक समरसता का अनुपम संदेश देता है। महान तपस्वी मतंग मुनि की शिष्या शबरी और प्रभु राम का मिलन, एक भेद-भाव-मुक्त समाज एवं प्रेम की दिव्यता का अद्भुत उदाहरण है। अपने वनवास के दौरान प्रभु राम ने युद्ध करने के लिए अयोध्या और मिथिला से सेना नहीं मंगवाई। उन्होंने कोल-भील-वानर आदि को एकत्रित कर अपनी सेना का निर्माण किया। अपने अभियान में जटायु से लेकर गिलहरी तक को शामिल किया। आदिवासियों के साथ प्रेम और मैत्री को प्रगाढ़ बनाया। राष्ट्रपति ने कहा कि इस रामायण कॉन्क्लेव की सार्थकता सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि राम-कथा के मूल आदर्शों का सर्वत्र प्रचार-प्रसार हो तथा सभी लोग उन आदर्शों को अपने आचरण में ढालें। उन्होंने कहा कि समस्त मानवता एक ही ईश्वर की संतान है, यह भावना जन-जन में व्याप्त हो, यही इस आयोजन की सफलता की कसौटी है। इस सन्दर्भ में, रामचरित मानस की एक अत्यंत लोकप्रिय चैपाई का, मैं उल्लेख करना चाहूंगा सीय राममय सब जग जानी, करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी। इस पंक्ति का भाव यह है कि हम पूरे संसार को ईश्वरमय जानकर सभी को सादर स्वीकार करें। हम सब, प्रत्येक व्यक्ति में सीता और राम को ही देखें। राम सबके हैं, और राम सब में हैं। आइए, हम सब इस स्नेहपूर्ण विचार के साथ अपने दायित्वों का पालन करें। राष्ट्रपति ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में प्रभु राम के आदर्शो को महात्मा गांधी ने आत्मसात किया था। वस्तुत: रामायण में वर्णित प्रभु राम का मार्यादा पुरुषोत्तम रूप प्रत्येक व्यक्ति के लिए आदर्श का स्रोत है। गांधी जी ने आदर्श भारत की अपनी परिकल्पना को रामराज्य का नाम दिया है। बापू की जीवनचर्या में राम-नाम का बहुत महत्व रहा है।उल्लेखनीय है कि रामायण कॉन्क्लेव आज से प्रारम्भ होकर आगामी 1 नवम्बर 2021 को अयोध्या में ही सम्पन्न होगा। कॉन्क्लेव में प्रातःकालीन सत्र में विशिष्ट कथावाचकों तथा रामायण के विद्वानों द्वारा रामायण के विभिन्न प्रसंगों पर व्याख्यान एवं विचार-विमर्श होंगे। वहीं सायंकालीन सत्र में रामायण एवं रामकथा से सम्बन्धित उच्चस्तरीय सांस्कृतिक प्रस्तुतियां सम्पन्न होंगी। रामलीला एवं लोक बोलियों के कवि सम्मेलनों के माध्यम से रामकथा के विभिन्न सन्दर्भों को प्रस्तुत किया जाएगा।

रामजन्मभूमि व हनुमानगढ़ी में किया दर्शन-पूजन

रामायण कान्क्लेव में शिरकत करने के बाद राष्ट्रपति कोविन्द ने हनुमानगढ़ी में जाकर देश की प्रथम महिला सविता कोविन्द के साथ हनुमंत लला का दर्शन किया। यहां से वह रामजन्मभूमि पहुंचे। जन्मभूमि में विराजमान रामलला का दर्शन किया। मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास ने पूजन-अर्चन कराया। दर्शन के बाद राष्ट्रपति ने रामजन्मभूमि परिसर में रुद्राक्ष के पौधे को रोपित किया। उन्होंने परिसर में चल रहे राम मंदिर के नींव के निर्माण कार्य का जायजा भी लिया। रामजन्मभूमि में ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने उनका स्वागत किया। यहां से वह अयोध्या रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुए और फिर प्रेसीडेंसियल ट्रेन से लखनऊ चले गए।


राज्यपाल आनन्दीबेन पटेल ने कहा कि मैं अयोध्या की धरती पर महामहिम राष्ट्रपति का उ0प्र0 की तरफ से स्वागत करती हूं तथा यह पवित्र धरती आम जनमानस के रोम-रोम में बसी हुई है तथा राम के आदर्श चरित्र की स्थापना करने में योगी सरकार अपनी एक अहम् भूमिका निभा रहे है उसकी जितनी भी सराहना की जाय कम है। यहां का दीपोत्सव जब शुरूआत हुई थी तो देश ही नही विदेशों में भी उसकी गूंज उठी थी। आज अयोध्या पर्यटन मानचित्र पर पूरे विश्व में जब से राम मंदिर का शिलान्यास हुआ है तब से छा रही है इसमें देश के यशस्वी प्रधानमंत्री भाई नरेन्द्र मोदी जी का विशेष योगदान एवं लगाव है।


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पांच शताब्दी के लंबे इंतजार के बाद प्रधानमंत्री मोदी की अनुकंपा से अयोध्या में श्रीराम के भव्य एवं दिव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। मुख्यमंत्री रविवार को अयोध्या में रामायण कॉन्क्लेव के उद्धाटन कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने आयोजन में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का स्वागत किया और भगवान राम के दर्शन, विकास कार्यों के अवलोकन एवं रामायण कॉन्क्लेव के उद्घाटन के साथ ही अन्य परियोजनाओं में तुलसी स्मारक भवन (संस्कृति विभाग) की आधुनिकीकरण परियोजना का शिलान्यास तथा सरयू नदी घाट पर नवनिर्मित लक्ष्मण किला घाट एवं नवनिर्मित बस स्टैण्ड का लोकार्पण बटन दबाकर किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि जन-जन की आस्था, पूज्य संतों एवं हमारे विचार परिवार के आन्दोलनों के परिणाम और संकल्पों के फलस्वरूप पिछले साल पांच अगस्त को प्रधानमंत्री जी के कर-कमलों से अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण कार्य का शुभारंभ हुआ है। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें इन पवित्र स्थलों का दर्शन प्राप्त हो रहा है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि अयोध्या को वैश्विक मानचित्र पर प्रस्तुत करने में भारतीय रेल की बहुत बड़ी भूमिका है। योगी ने अयोध्या में सम्पन्न हो रहे दिव्य-भव्य कार्यक्रम में रेल राज्यमंत्री श्रीमती दर्शना जारदोश का भी अभिनंदन किया। अपने भाषण में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि व्यापक आस्था के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जन-जन के हैं। प्रभु श्री राम हम सब की आस्था, श्वांस-श्वांस, रोम-रोम में बसे हैं तथा पद्मश्री गायिका श्रीमती मालिनी अवस्थी जी के शबरी चरित्र प्रसंग के गायन की प्रशंसा की। मुख्यमंत्री द्वारा महामहिम को भगवान राम दरबार की मूर्ति देकर तथा रामनामी अंगवस्त्रम् प्रस्तुत कर सम्मानित किया गया।

अयोध्या के साथ युद्ध करना असंभव

रामनाथ कोविंद ने कहा कि राम के बिना अयोध्या है ही नहीं, अयोध्या वहीं है जहां राम हैं। अयोध्या के साथ युद्ध करना असंभव है। रघु, दिलीप, अज, दशरथ व राम जैसे रघुवंशी राजाओं के पराक्रम व सख्ती के कारण उनकी राजधानी को अपराजेय माना जाता था। इसीलिए इस नगरी का अयोध्या नाम सर्वदा सार्थक रहेगा। राष्ट्रपति ने कहा कि प्रदेश सरकार ने कान्क्लेव का आयोजन कर रामायण को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है।


राष्ट्रपति अपने 26 अगस्त से उ0प्र0 के अन्तिम चरण में भगवान की जन्मस्थली, बाल लीला स्थली एवं कर्मस्थली अयोध्या में प्रेसीडेन्सियल टेªन से लगभग 11ः30 बजे अयोध्या रेलवे स्टेशन पर आये वहां पर अगवानी करने वालों में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय रेल राज्यमंत्री दर्शना जारदोश, रेलवे बोर्ड के चेयरमैन सुमित शर्मा, अपर गृह सचिव अवनीश अवस्थी, अपर पुलिस महानिरीक्षक सुरक्षा बीके सिंह, अपर पुलिस महानिदेशक जोन एस0एन0 सावंत, पुलिस महानिरीक्षक अयोध्या डा0 संजीव गुप्ता, बिग्रेडियर डोगरा रेजीमेंटल जे0के0 एसवीर कौर, आयुक्त एमपी अग्रवाल, जिलाधिकारी अनुज कुमार झा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शैलेश कुमार पांडेय, सांसद लल्लू सिंह, मेयर ऋषिकेश उपाध्याय, विधायक अयोध्या वेदप्रकाश गुप्ता, जीएम रेलवे आशुतोष गंगल, नगर आयुक्त विशाल सिंह, अपर पुलिस महानिदेशक पीयूष आनन्द, डीआरएम पूर्वी रेलवे सुरेश कुमार सपरा आदि ने किया।


महामहिम राष्ट्रपति का रामकथा पार्क में आयोजित रामायण काॅन्क्लेव कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया यह प्रदेश के 16 जनपदों में शुरू हो चुका है तथा इसका समापन 1 नवम्बर 2021 को अयोध्या में होगा। उक्त अवसर पर प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री के अलावा प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व डा0 दिनेश शर्मा, उ0प्र0 सरकार के पर्यटन, संस्कृति मंत्री डा0 नीलकंठ तिवारी, पर्यटन प्रमुख सचिव मुकेश मेश्राम सहित मण्डलायुक्त एवं जिलाधिकारी तथा अन्य अधिकारियों द्वारा स्वागत किया गया। उक्त अवसर पर रामकथा पार्क में रामजन्म मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्र द्वारा तीर्थ क्षेत्र के अन्य मा0 सदस्यों तथा एल0एन0टी0 के इंजीनियरों की उपस्थिति में मंदिर निर्माण सम्बंधित प्रस्तुतिकरण किया गया। तत्पश्चात राष्ट्रपति द्वारा हनुमानगढ़ी का दर्शन किया गया, जहां हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन महाराजा प्रेमदास द्वारा राष्ट्रपति का स्वागत चांदी का मुकुट पहनाकर स्वागत किया तथा अजय दास, दिगपाल दास/श्रवण दास ने पूजा अर्चना करायी।
अगले चरण में महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा रामलला मंदिर का दर्शन किया गया, जहां मंदिर के पास तीर्थ क्षेत्र के सदस्य स्वामी परमानन्द गिरी, डा0 विमलेन्द्र प्रताप मोहन मिश्र, स्वामी गोविन्द देव गिरी, महंत दिनेन्द्र दास, कामेश्वर तथा तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चम्पत राय एवं मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व आई0ए0एस0 अधिकारी श्री नृपेन्द्र मिश्र, आयुक्त एमपी अग्रवाल, जिलाधिकारी अनुज कुमार झा द्वारा स्वागत किया गया तथा मंदिर के मुख्य पुजारी सत्येन्द्र दास जी एवं सहायक, पुजारी अशोक तिवारी जी ने पूजा अर्चना कराया। महामहिम जी के साथ उनकी धर्मपत्नी राष्ट्र की प्रथम महिला नागरिक सविता कोविंद सहित उनकी सुपुत्री भी साथ थी। अगले चरण में महामहिम श्री राष्ट्रपति जी द्वारा रूद्राक्ष का पौधा परिसर में लगाया गया। उक्त अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के दिनेश जी, तीर्थ क्षेत्र के सदस्य डा0 अनिल मिश्रा, मुख्य वन संरक्षक रेनू सिंह तथा वन विभाग एवं शासन के अन्य वरिष्ठ अधिकारी महामहिम राष्ट्रपति जी का अन्त में राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं शासन, मण्डल एवं जिला, रेल के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा भावभीनी विदाई दी गयी। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति के भ्रमण में उनका एवं उनके परिवार की भगवान राम में एवं अयोध्या में आगाज प्रेम एवं श्रद्वा दिखी। राष्ट्रपति जी द्वारा सभी कार्यक्रमों की हृदय से सराहना की गयी।

पौराणिक कथाओं के अनुसार सीता के पृथ्वी में समा जाने के बाद विष्णु का सातवां अवतार यानी श्री राम का पृथ्वी पर काम पूरा हो गया था। श्री राम पहले ही हनुमान को पाताल भेज चुके थे एक अंगूठी ढूंढने क्योंकि उन्हें पता था कि हनुमान रहेंगे तो वो अपना मानव रूप त्याग नहीं पाएंगे। श्री राम से मिलने के लिए एक साधु का भेष बनाकर यम उनसे मिलने आए थे।वो ये बताने आए थे कि राम को अब बैकुंठ लौटना होगा।उनसे मिलते समय राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वो किसी को भी अंदर आने न दें नहीं तो उस इंसान को मृत्यु दंड दिया जाएगा। जब राम और यम अंदर थे तो ऋषि दुर्वासा आए, दुर्वासा ऋषि अपने क्रोध के कारण बहुत प्रसिद्ध थे।लक्ष्मण ने उन्हें रोका तो दुर्वासा ऋषि ने राम को श्राप देने की बात कही। ऐसे में भाई को श्राप न मिले इसके लिए लक्ष्मण ने खुद का बलिदान देने की सोची, लक्ष्मण खुद ही राम के पास चले गए. ऐसे में राम को समझ नहीं आया कि वो लक्ष्मण को कैसे मारें।राम ने लक्ष्मण को देश निकाला दे दिया। अपने भाई को निराश कर लक्ष्मण खुद सरयु नदी में जाकर विलीन हो गए और शेषनाग का रूप ले लिए, कहा जाता है कि लक्ष्मण शेषनाग का ही मानव रूप थे। इसके बाद राम ने भी इसी तरह अपनी देह त्याग दी।