भगवा कुनबा फिर से हिन्दुत्व की चाशनी में डूबा,सत्ता से सपा उतनी ही दूर जितना बी0डी0 से के0डी0 मार्ग

डॉ0 अम्बरीष राय

ये बारिशों के दिन थे. समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह दिल्ली से भेजे गए भगवा बादलों की बारिश में भीगकर 5 कालिदास मार्ग पहुंच गए थे. सन् 2003 के अगस्त महीने की 29 तारीख़ को समाजवादी मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश के 15 वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उसके सारा क्रेडिट कथित भगवा भाजपा को जाता है. 19 साल पहले भाजपा ने समाजवादी पार्टी की सरकार बनवाई थी, इसका ज़िक्र इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि एक बार फिर उत्तर प्रदेश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है. भगवाधारी महंत योगी आदित्यनाथ फ़िलवक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. भगवा कुनबा फिर से हिन्दुत्व की चाशनी में अन्य मुद्दों को चाट जाना चाहता है. समाजवादी पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश की सत्ता उतनी ही दूर लग रही है, जितनी विक्रमादित्य मार्ग से कालीदास मार्ग की दूरी है. और यही दूरी भगवा खेमा को हलकान किए बैठी है. लिहाज़ा एक बार फिर पूरी भगवा ब्रिगेड मुलायम सिंह को कारसेवकों का हत्यारा और अखिलेश यादव को जातीय नेता साबित करने में तुल गई है. हिन्दू हितों की सुपारी लिए लोग हिन्दुओं को आख़िरी ख़तरे में दिखा रहे हैं, जिसको बस योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्रित्व ही बचा सकता है. सत्ता की मलाई काट रहे सुपारी व्यापारी ऐसा नैरेटिव गढ़ रहे हैं. इन्हीं सुपारी सम्राटों की आंखों पर लगे कथित हिन्दूजीवी चश्मे का नंबर सही करने के लिए 2003 के सत्ता ट्रैक को रिवाइंड कर रहा हूं.

2002 में हुए विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ा दल बनकर उभरी. सपा को 143 सीटें मिलीं. सिकुड़ती भाजपा 88 पर रुक गई तो बसपा को 98 सीटें मिलीं. पुराने गिले-शिकवे भुलाकर बीजेपी और बीएसपी ने तीसरी बार फिर दोस्ती की. मायावती तीसरी बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन एक बार फिर माया मेम साब और भाजपा में तल्खियां बढ़ने लगीं. उनके राखी भाई कलराज मिश्रा और लालजी टंडन अपनी बहन को मना ना सके. रिश्ते इस क़दर बिगड़े कि 26 अगस्त 2003 को मायावती ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश करते हुए राज्यपाल को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया. माया मेम साब अपना ट्रम्प कार्ड चल चुकी थीं. भौंचक्की भाजपा के हाथ पांव फूल गए. उन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी रायसीना हिल्स पर बैठे “इंडिया शाइनिंग” कर रहे थे. “भारत उदय” के बीच भाजपा के राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने भाजपा की मदद की. आपने “बैक डेट” का नाम सुना ही होगा. कभी कभार लाभ भी लिया होगा शायद. तो माया मेम साब के इस सियासी दांव से हैरान भाजपा विधायकों ने लालजी टंडन के नेतृत्व में राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री से मुलाकात कर उन्हें सरकार से समर्थन वापस लेने की जानकारी दी. राज्यपाल ने राज्यपाल पद की व्यवहारिक पक्षधरता के साथ ये ऐलान करते हुए विधानसभा भंग नहीं की कि उनको मायावती सरकार से समर्थन वापसी का भाजपा विधायकों का पत्र, कैबिनेट के विधानसभा भंग करने के प्रस्ताव से पहले ही मिल चुका है. लिहाज़ा अल्पमत मुख्यमंत्री का विधानसभा भंग करने का दावा माना नहीं जा सकता. अंदरखाने मुलायम सिंह से हाथ मिला चुकी भाजपा ने मुलायम सिंह की ताजपोशी के रास्ते मे आने वाले हर कील कांटे को बुहारने का काम शुरू कर दिया. सपा से बुरी तरह जलने वाले और भाजपा के कट्टर समर्थक ध्यान देते रहें. 26 अगस्त को ही मुलायम सिंह ने सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया. तब तक उनके पास बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त विधायक नहीं थे. लखनऊ में हॉर्स ट्रेडिंग शुरू हो गई. बसपा के विधायक तोड़े जाने लगे. 13 बसपा विधायक टूट गए. 27 अगस्त को बसपा के 13 विधायकों ने राज्यपाल से मुलाकात कर मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन किया.

हत्थे से उखड़ी बसपा ने इस घटनाक्रम पर आपत्ति जताई. बसपा ने कहाकि उसके विधायकों का मुलायम सिंह को समर्थन देना, पार्टी छोड़ने जैसा है. लिहाज़ा दलबदल निरोधक क़ानून और संविधान की 10वीं अनुसूची का उल्लंघन मानते हुए उनकी (बिके बसपा विधायक) सदस्यता रद्द की जाए. इस सम्बन्ध में बसपा विधायक दल के तत्कालीन नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपाई विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी के सामने लिखित फरियाद की. त्रिपाठी सन्नाटा खींच गए. बसपा की याचिका ठंडे बस्ते में डाल केसरीनाथ अपने नाथ का हुकुम बजाने लगे. भाजपाई राज्यपाल शास्त्री ने इन्हीं 13 बसपा विधायकों के समर्थन पत्र के आधार पर मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. तीन दिनों में ही मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह को बहुमत साबित करने के लिए दो हफ़्ते का वक़्त दिया गया. उस दौर में मायावती से राखी बंधवाने वाले कलराज मिश्रा और लालजी टंडन राज्यपाल के फैसले का शर्मनाक बचाव करते हुए लोकतंत्र के मज़बूत होने की सियासी स्क्रिप्ट लिख रहे थे. भाजपाई राज्यपाल, भाजपाई विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के सहयोग से मुलायम सिंह यादव ने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया. हिन्दू हृदय सम्राट कल्याण सिंह ने भगवा टोपी उतार कर समाजवादी लाल टोपी पहन ली. कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह मुलायम सिंह की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बन हिन्दुत्व मज़बूत करते रहे.

बिकती, टूटती बसपा चीखती चिल्लाती रही. उसके 37 विधायकों नें दारुलसफा में मीटिंग की .और 6 सितंबर 2003 को विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी से मुलाकात कर उन्हें अलग दल के रूप में मान्यता देने की मांग की. सन्नाटे में पड़े त्रिपाठी चैतन्य हो गए. केसरीनाथ त्रिपाठी ने ”काल्ह करे सो आज कर” के दोहे को स्मरण किया और उसी दिन बसपा के विभाजन को मान्यता मिल गई. वही विधानसभा अध्यक्ष 13 विधायकों के दलबदल मामले में अब तक कोई फ़ैसला नहीं कर पाए थे. दरअसल ये सब एक लिखी गई स्क्रिप्ट में अपनी भूमिका निभा रहे थे. जिसमें बसपा से टूटने वाले विधायकों की संख्या एक तिहाई से ज़्यादा हो जाए, जिससे न्यायालय मुलायम सरकार को जल्दी अवैध ना घोषित कर पाए, और टूटने वाले विधायक दल बदल कानून के दायरे में ना आ जाएं.

बसपा मामले को लेकर कोर्ट गई. राज्य सरकार तारीख़ तारीख़ तारीख़ खेलती रही. मुलायम सिंह सरकार को कानूनी तौर पर सुरक्षित करने के बाद भाजपाई केसरीनाथ विधानसभा अध्यक्ष का पद भोगते रहे. ना सपाईयों को उनको हटाने की ज़रूरत थी और ना ही भाजपा के लिए कोई नैतिकता के बिखरने का दबाव. लेकिन एक दिन इस निर्लज्जता का अंत हुआ. ये 19 मई 2004 की तारीख़ थी जब भाजपाई विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी ने समाजवादी सरकार के विधानसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया. बसपा हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट के चक्कर लगाती रही. अंतिम फैसला जब तक आता बहुत देर हो चुकी थी. सुप्रीम कोर्ट ने 14 फरवरी, 2007 को अपने फ़ैसले में बसपा में हुई टूट को अवैध बताते हुए 13 बागी विधायकों की सदस्यता खारिज कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के फ़ैसले को पलट दिया, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो चला था. लाज़िम था हम देख रहे थे. लाज़िम है हम देखेंगे. [/responsivevoice]