मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद क्या हुआ…?

चौ.लौटनराम निषाद


मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद देश भर के सवर्ण छात्रों का ही नहीं, बल्कि सरकार के भीतर भी विरोध देखने को मिला।वीपी सिंह सरकार के भीतर मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने को लेकर नेता अलग-अलग मत पहले ही जाहिर कर चुके थे।जब वीपी सिंह ने कैबिनेट की मीटिंग में खड़े होकर अपने मैनिफेस्टो में कहे मुताबिक मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की बात कही। तब इसे सुन कई मंत्री चुप्पी साध गए थे।लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और रामविलास पासवान ने इसका खुलकर समर्थन किया।आगरा के जाट नेता और तत्कालीन रेल राज्यमंत्री अजय सिंह ने एक अलहदा सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इसी में थोड़ा-बहुत इधर उधर करके जनरल कैटगिरी (जिनमें जाट भी शामिल थे) के गरीब लोगों के लिए भी कुछ स्पेस बना दिया जाए, तो कोई बवाल नहीं होगा अन्यथा इसका विरोध हो सकता है। किसी ने अजय सिंह की नहीं सुनीं और फैसले पर मुहर लगा दी गई।

इसके दो दिन बाद यानी 9 अगस्त 1990 को मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने को लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह और उप प्रधानमंत्री देवीलाल में मतभेद पैदा हो गए। मतभेद इतने बढ़े कि उप-प्रधानमंत्री देवीलाल ने इस्तीफ़ा दे दिया।सरकार मण्डल कमीशन की सिफारिश लागू कर ओबीसी को आरक्षण देने के लिए अड़ी रही। 10 अगस्त 1990 को आयोग की सिफारिशों के तहत सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था करने के खि़लाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। सरकार पर कोई असर नहीं हुआ, 13 अगस्त 1990 को सरकार ने आनन-फानन में मंडल आयोग की सिफारिश लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी।

मंडल आयोग के रिपोर्ट में पिछडे़ वर्गों के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की बात की गई। भारत में अनुसूचित जाति-जनजाति को पहले से 22.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा था। इसी कारण इंदिरा गांधी की सरकार इस सिफारिश को लागू करने से बचती रही।


मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने पर लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह तो वीपी सिंह के साथ खड़े दिखे लेकिन चंद्रशेखर ने इसे लागू करने के तरीके पर सवाल खड़े कर दिए।वीपी सरकार के विरोध में जब ओडिशा में प्रदर्शनकारी पुलिस फायरिंग की जद में आए, तो उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के विरोधी स्वर सबसे पहले बाहर आए। बीजू पटनायक जनता दल की ही सरकार चला रहे थे और उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के फैसले का विरोध करते हुए उन पर जातीय हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप मढ़ दिया।बीजू पटनायक के अलावा वीपी सिंह के करीबियों में यशवंत सिन्हा और हरमोहन धवन ने भी उनके फैसले की सार्वजनिक तौर पर आलोचना की। वीपी सिंह से खार खाए बैठे चंद्रशेखर ने कहा था कि सरकार का इसे लागू करने का तरीका गलत है।वीपी सिंह सरकार के मंत्री अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खां भी असंतुष्ट नेताओं की कतार में खड़े नजर आए।


देश भर में आरक्षण के विरोध में आंदोलन तेज हो गया था।इस बीच आरक्षण विरोधी आंदोलन की एक तस्वीर ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था।दिल्ली यूनिवर्सिटी के देशबंधु कॉलेज के थर्ड ईयर के छात्र राजीव गोस्वामी ने खुद को आग लगा ली। उसे गंभीर हालात में एम्स में भर्ती कराया गया।वीपी सिंह की सरकार को बाहर से सशर्त समर्थन देने वाली बीजेपी के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी राजीव गोस्वामी से मिलने एम्स अस्पताल पहुंचे। इस दौरान उन्हें अगड़ी जाति के नौजवानों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा।आडवाणी ने वक्त की नजाकत को भांपा और उसके बाद मंडल के जवाब में कमंडल की राजनीति तेज कर दी।उस वक्त छपी इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ने वीपी सिंह सरकार को फैसले पर पुनर्विचार नहीं करने पर समर्थन वापसी का भी दबाव बनाया।

हालांकि बीजेपी इस मसले पर कोई स्पष्ट स्टैंड नहीं ले पाई। लेफ्ट पार्टियों की स्थिति भी बीजेपी जैसी ही रही।सीपीआई ने आरक्षण का समर्थन किया, लेकिन सीपीएम को इस मसले पर स्टैंड लेते-लेते काफी वक्त लग गया। सरकार पर लगातार दबाव बढ़ने लगा।नवंबर आते-आते बीजेपी ने वीपी सिंह की नेशनल फ्रंट की सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। वीपी सिंह ने 7 नवंबर 1990 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।