क्या अनुसूचित जाति में शामिल करने का मानक छुआछूत है….?

ओबीसी की जातियाँ सिर्फ 6,खड़ा किया गया 18 का बवंडर। क्या अनुसूचित जाति में शामिल करने का मानक छुआछूत है…?

लौटनराम निषाद

लखनऊ। राष्ट्रीय निषाद संघ के राष्ट्रीय सचिव चौ.लौटनराम निषाद ने बताया है कि उत्तर प्रदेश की अन्य पिछड़े वर्ग की सूची की सिर्फ 6 जातियों को अनुसूचित जाति का आरक्षण दिए जाने का मामला है,लेकिन बेवजह 18 ओबीसी की जातियों का बवंडर खड़ा किया गया है।उ होने बताया कि यूपी की ओबीसी की लिस्ट के क्रमांक-4 पर कहार, कश्यप,5 पर केवट या मल्लाह,निषाद,8 पर कुम्हार,प्रजापति,26 पर धीवर,35 पर बिन्द व 37 पर भर,राजभर जाति अंकित है।मछुआ, माँझी,धीमर, गोड़िया, तुरहा, बाथम,रायकवार आदि निषाद,धीवर, कहार, मल्लाह की पर्यायवाची, उपजाति व अपभ्रंश हैं,जो उत्तर प्रदेश की जातियों की किसी भी सूची में सूचीबद्ध नहीं हैं। तथाकथित 18 ओबीसी जातियों के एससी आरक्षण कोटे के मुद्दे पर कहा कि इन जातियों को नए सिरे से एससी में शामिल करने की जरूरत नहीं है।बल्कि राष्ट्रपति द्वारा जारी कराई गई 10 अगस्त,1950 की अधिसूचना में उत्तर प्रदेश की एससी की अनुसूची के क्रमांक-18 पर अंकित बेलदार,36 पर अंकित गोंड,53 पर अंकित मझवार,57 पर अंकित पासी,तड़माली,क्रमांक-65 पर अंकित-शिल्पकार व 66 पर अंकित-तुरैहा को परिभाषित भर करना है।इन जातियों को अनुसूचित जाति में परिभाषित करने से पूर्व उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ावर्ग आयोग व राष्ट्रीय पिछड़ावर्ग आयोग की सहमति से इन जातियों को राज्य ओबीसी व ओबीसी की केन्द्रीय सूची से विलोपित कराना होगा।


उन्होंने कहा कि 1931 की उत्तर प्रदेश की अनटचेबल व डिप्रेस्ड जातियों की सूची के क्रमांक-8 पर मझवार(माँझी) का उल्लेख है।माँझी को जनसामान्य नाव चलाने व मछली मारने,बेचने वाला यानी मल्लाह,केवट,माझी समझता है।उन्होंने कहा कि भारत के रजिस्ट्रार जनरल व सेन्सस कमिश्नर ने 1961 की जनगणना में माँझी, मल्लाह,केवट,राजगौड़, मुजाबिर, गोंड़ मझवार को मझवार की पर्यायवाची व वंशानुगत जाति नाम मान चुके हैं,तो आज इन जातियों को मझवार का प्रमाण पत्र देने में आनाकानी व रुकावट क्यों?उन्होंने बताया कि 1950 की अधिसूचना में निषाद मछुआ समुदाय की मझवार,गोंड़,तुरैहा,खैरहा,खोरोट,पनिका,बेलदार आदि जातियाँ एससी में सूचीबद्ध हैं।1901 व आज़ादी से पूर्व के तमाम दस्तावेजों में मल्लाह,माँझी,केवट,धीवर आदि को मझवार में समाविष्ट माना गया है और मल्लाह,केवट,बिन्द, धीमर,धीवर, माँझी, तुरहा, चाई, तियर,गोड़िया,रायकवार,बाथम आदि को एक माना गया है,तो आज अलग अलग क्यों मानी जा रही हैं?


निषाद ने बताया कि 1961 के सेन्सस में अनुसूचित जाति की सूची के क्रमांक-24 पर अंकित चमार,जाटव,झुसिया,धुसिया की पर्यायवाची जाटवी,अहिरवार,जैसवार,भगत,चमकाता,निम, पिपैल,कर्दम, कबीरपंथी, उत्तरहा,दखिनहा, रैदासी,शिवदसिया,दोहरा,दोहरे,दौबरे,दबकर,कुरील,रैया, रमदसिया,शिवदसिया आदि को माना गया है।कहा कि इन सभी को निर्बाध रूप से चमार या जाटव का जाति प्रमाण पत्र दिया जाता है।जिन 18 ओबीसी जातियों को एससी आरक्षण का मामला है,वह सभी अनुसूचित जाति में शामिल मझवार,तुरैहा,गोंड़, बेलदार,शिल्पकार, पासी की ही पर्यायवाची उपजातियाँ हैं।


अस्पृश्यता के सवाल पर निषाद ने कहा है कि घृणित पेशे को अपनाने वाली जातियों के साथ छुआछूत का भेदभाव माना जाता रहा है।अगर अनुसूचित जाति में शामिल करने का मानक अस्पृश्यता/छुआछूत का भेदभाव रहा है तो 1950 की उत्तर प्रदेश की एससी की अनुसूची में शामिल मझवार,तुरैहा,ग्वाल,खैरहा,खोरोट,बेलदार,पनिका,भुइयां,भुइयार,बनवासी,खसिया,बैसवार,बहेलिया,बधिक,अगरिया,अहेरिया,चेरो,कोरवा,कलाबाज, बजनिया,करवल, पंखा,कापड़िया,बंगाली,धनगर,कोरी,बाँसफोर, धरकार,कोल आदि अस्पृश्य/अछूत कैसे?उन्होंने कहा कि जो परम्परागत पेशा मझवार,तुरैहा,बहेलिया,बधिक,बंगाली,पंखा,पनिका,कोरवा,करवल, चेरो,खरवार,बेलदार,पहाड़िया,अहेरिया,अगरिया,भुइयां,भुइयार आदि का है,वही शिकारी का पेशा मल्लाह,केवट,बिन्द, धीवर, कहार,माँझी, गोड़िया आदि का भी है।


निषाद ने कहा कि जूता बनाना,पालिश करना(मोची),कपड़ा बुनना(कोरी),कपड़ा धोना,प्रेस करना(धोबी),भेड़,बकरी पालना(धनगर),चिड़ियों का शिकार व पकड़कर बेचना(बहेलिया,बधिक),पत्तल बनाना,चूहा पकड़ना(मुसहर),तेंदू पत्ता व जंगली लकड़ी इकट्ठा करना(कोल),पत्थर तोड़ना,सिलबट्टा आदि बनाना(पत्थरकट),मीट बेचना(खटिक),ताड़ी उतारना,सुअर पालना(पासी),चौकीदारी व सुअर पालना(दुसाध),जंगली पक्षियों का शिकार,जड़ी बूटी इकट्ठा करना,मछली पकड़ना(भुइयां,भुइयार,पनिका) आदि का अपवित्र,घृणित व नापाक पेशा है,तो मल्लाह,केवट,धीवर, धीमर,रैकवार,बाथम,माँझी,गोड़िया, बिन्द,तुरहा आदि का पुश्तैनी पेशा-मछली मारना,मछली काटकर बेचना,जलजीवों का शिकार करना,नौकाओं द्वारा अंत्येष्टि व शव प्रवाह कराना,डूबे व्यक्ति के शव को गोताखोरी कर निकालना पवित्र,सछूत व सम्मानजनक पेशा कैसे?उन्होंने कहा कि अस्पृश्यता(अपराध) उन्मूलन अधिनियम-1955 बनने व अनुच्छेद-17 द्वारा अस्पृश्यता/छुआछूत को संज्ञेय अपराध घोषित करने के बाद निषाद, मामलाः,केवट,बिन्द, धीवर,कहार,माँझी, रैकवार,कुम्हार,राजभर,भर में छुआछूत का लक्षण ढूढ़ना कितना उचित,यह तो अपने आप मे अपराध है।


निषाद ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार अपने वादे के अनुसार अतिपिछड़ी जातियों को एससी का दर्जा दिलाना चाहती है तो इन जातियों को ओबीसी की राज्य व केन्द्रीय सूची से विलोपित कराकर विधानसभा के दोनों सदनों व कैबिनेट से प्रस्ताव पासकर विधिसम्मत प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजे।उन्होंने कहा कि तथाकथित 18 ओबीसी की जातियों को मझवार (मल्लाह,केवट,माँझी,मछुआ),तुरैहा(तुरहा, धीमर, धीवर,रैकवार),बेलदार(),पासी,तड़माली(भर,राजभर) व शिल्पकार(कुम्हार,प्रजापति) के साथ परिभाषित करने के लिए केन्द्र से सिफारिश किया जाय।कहा कि साथ उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान लखनऊ से सन् 2004-05 एवं 2010 में कराएं गए इथनोग्राफिकल/एंथ्रोपोलीजिकल सर्वे रिपोर्ट या मानवशास्त्रीय/नृजातीय अध्ययन रिपोर्ट को भी भेजा जाए।निषाद ने निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद पर समाज को गुमराह करने का आरोप लगाया है।

उन्होंने कहा कि संजय निषाद इस तरह गलत बयानबाजी कर रहे हैं,जैसे वे भाजपा के व सरकार के प्रवक्ता हों।उन्होंने संजय निषाद के उस बयान को बेतुका बताया है कि न्यायालय ने अधिसूचना को रद्द कर सपा व अखिलेश यादव के मुंह पर करारा तमाचा मारा है।उन्होंने कहा कि सपा सरकार ने 17 अतिपिछड़ी जातियों को परिभाषित करने की अधिसूचना जारी किया था,जिसे उच्च न्यायालय ने 29 मार्च,2017 को सही ठहराते हुए 24 जनवरी,2017 के स्टे को वैकेट कर दिया था।तमाचा तो योगी सरकार को लगा है,जिसने 24 जून,2019 को नए सिरे से अधिसूचना जारी कर दिया और 5 वर्षों तक काउन्टर एफिडेविट दाखिल न कर 31 अगस्त,2022 को एडवोकेट जनरल द्वारा हलफनामा दिलवाकर अधिसूचना को वापस करवा लिया।