जातिगत जनगणना से घबराहट क्यों..?

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भारतीय समाज में जातियों का जमावड़ा
भारतीय समाज में जातियों का जमावड़ा

बिहार में जातीय जनगणना पर उच्च न्यायालय की रोक उचित नहीं,सवर्ण जातियाँ जातिगत जनगणना क्यों घबराती हैं…? जाति जनगणना एक राजनीतिक गर्म आलू है जो सामाजिक और राजनीतिक अंकगणित को परेशान करने की संभावना है। और यह एक ऐसी चीज है जिसका खुलकर विरोध कोई भी पार्टी नहीं कर सकती।

लौटनराम निषाद
लौटनराम निषाद

पटना न्यायालय द्वारा बिहार में जारी जातीय जनगणना पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दिया है।पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश वी. चन्द्रन की बेंच ने ये फैसला सुनाया है।इस मामले में अगली सुनवाई 3 जुलाई को होगी। भाजपा के सदस्यों द्वारा दाखिल 5 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश द्वारा जातीय जनगणना पर रोक को अनुचित करार देते हुए भारतीय ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ. लौटनराम निषाद ने कहा कि जनकल्याणकारी योजनाओं व नीतियों को सही तरीके से लागू करने के लिए जातिगत आंकड़ा जरूरी है। उन्होंने जातिगत जनगणना पर न्यायिक रोक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आखिर भाजपा व सवर्ण जातियाँ जातिगत जनगणना से इतनी घबराती क्यों हैँ, आखिर इससे कौन सी राष्ट्रीय आफत आ जाएगी? एससी, एसटी, धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग की जनगणना पर कोई आपत्ति नहीं होती, आखिर ओबीसी की ही जनगणना से कौन सा पहाड़ टूट जाता है। उन्होंने कहा की संघी मानसिकता के फ़िरक़ापरस्त सामाजिक सच्चाई को छुपाना चाहते हैं।

यूपीए -2 की सरकार ने सेंसस -2011 में सामाजिक -आर्थिक -जातिगत जनगणना (एस ई सी सी ) कराया था लेकिन अपने को पिछड़ी जाति का बताने वाले पीएम नरेन्द्र मोदी ने ज़ब 30अगस्त 2016 को जनगणना के आंकड़ों की घोषणा कराये तो एससी, एसटी, धार्मिक अल्पसंख्यक (मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी, रेसलर आदि ), ट्रान्सजेंडर, दिव्यांग आदि की जनसंख्या की घोषणा कर दिए, लेकिन ओबीसी के आंकड़ों की घोषणा नहीं कराये।उन्होंने कहा कि यह कैसी विडंबना है कि सरकार कछुआ, घडियाल, मगरमच्छ, डॉल्फिन, भालू, बंदर, चिता, हाथी आदि की गिनती कराती है लेकिन जब पिछड़ों की जनगणना की बात आती है तो पीछे हट जाती है। कहा की संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुच्छेद -246 के अनुसार हर दशक में जातिगत जनगणना कराना संघ सरकार के लिए जरूरी है, लेकिन भाजपा सरकार ने वादा कर पीछे हट गयी। 5 जून 2018 को तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जनगणना विभाग के अधिकारीयों की बैठक में घोषणा किये थे कि सेंसस -2021 में ओबीसी की गिनती कराई जाएगी, लेकिन सितंबर 2021 में भाजपा सरकार ने गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय से उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दाखिल कराकर ओबीसी की जनगणना कराने में असमर्थता जता दिया जो भाजपा की पिछड़ा विरोधी चाल चरित्र की असलियत है।


जातिगत जनगणना से घबराहट क्यों..?
जातिगत जनगणना से घबराहट क्यों..?

पटना हाईकोर्ट ने जातीय जनगणना पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाकर नीतीश कुमार सरकार को झटका दिया है। नीतीश सरकार लंबे समय से जातिगत जनगणना कराने के पक्ष में रही है। नीतीश सरकार ने 18 फरवरी 2019 और फिर 27 फरवरी 2020 को जातीय जनगणना का प्रस्ताव बिहार विधानसभा और विधान परिषद में पास करा चुकी है।हालांकि, केंद्र इसके खिलाफ रही है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर साफ कर दिया था कि जातिगत जनगणना नहीं कराई जाएगी।केंद्र का कहना था कि ओबीसी जातियों की गिनती करना लंबा और कठिन काम है।


बिहार सरकार ने पिछले साल जातिगत जनगणना कराने का फैसला किया था। इसका काम जनवरी 2023 से शुरू हुआ था। इसे मई तक पूरा किया जाना था। लेकिन अब हाईकोर्ट ने इस पर 3 जुलाई तक रोक लगा दी है।निषाद ने न्यायिक रोक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि भाजपा व सवर्ण जातियाँ ओबीसी की जनगणना से घबराती है क्योंकि उनके झूठ से पर्दा उठ जायेगा, उनकी 14-15 प्रतिशत जनसंख्या का खुलासा हो जायेगा।भाजपा के कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट में 6 याचिकाएं दाखिल कर जातिगत जनगणना पर रोक की मांग किया था। इन याचिकाओं में जातिगत जनगणना पर रोक लगाने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस मधुरेश प्रसाद की बेंच ने 3 मई को इनपर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था।


निषाद ने उच्च न्यायालय के जातिगत जनगणना पर रोक संबंधित निर्णय पर अफ़सोस जाहिर करते हुए कहा कि जब ओबीसी आरक्षण कोटा संबंधित कोई मामला न्यायालय में आता है तो यही न्यायालय टिप्पणी करता है कि ओबीसी का पुष्ट आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है, दूसरी तरफ सरकार जब जनगणना शुरू किया तो रोक लगा दिया।मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने ओबीसी कोटा को 14 प्रतिशत से विस्तारित करते हुए 27 प्रतिशत किया तो भाजपा के सवर्ण कार्यकर्ताओं ने याचिका योजित कर रोक लगवा दिया। छत्तीसगढ सरकार ने ओबीसी कोटा 14 से 27 व झारखण्ड सरकार ने 13 से 27 प्रतिशत करने का आरक्षण संशोधन विधेयक पारित कर राज्यपाल के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा तो भाजपा राज्यपालों ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि मंडल विरोधी भाजपा कभी पिछड़ों की हित चिंतक नहीं हो सकती। भाजपा का सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास सबका प्रयास का नारा बिल्कुल ढकोसला है और प्रधानमंत्री नीलवर्ण श्रृंगाल सरीखे स्वघोषित ओबीसी हैं। जातिगत जनगणना से घबराहट क्यों..?