क्या आजमगढ़ उपचुनाव से रस्सी जलेगी या ऐंठन जायेगी

रस्सी जल गई पर ऐंठन नहीं गई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसा क्यों कहा और किस पर कहा… उनका निशाना उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल के सुप्रीमो पर था या फिर कभी सपा में नंबर दो की हैसियत हासिल करने वाले रामपुर के सुप्रीमो कहे जाने वाले पर था. लेकिन जो भी था वक्त की नजाकत को देखते हुए सच लग रहा है. लोकसभा उपचुनाव में सत्ता दल के मंत्री मंत्री हों कार्यकर्ता हों या मुख्यमंत्री सभी गली कूचे छान रहे हैं वहीं विपक्ष में बैठी पार्टी अपने कुछ कार्यकर्ताओं के भरोसे एसी में मौज फरमा रहे हैं. रही बात आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव की तो यह चुनाव सपा के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना धर्मेंद्र यादव के लिए है. बदायूं के सांसद रहे धर्मेंद्र यादव के लिए आजमगढ़ का चुनाव करो या मरो की स्थिति में है. वह अकेले ही आजमगढ़ के साथियों के साथ तन्मयता से दिन-रात एक कर मेहनत की. लेकिन सपा संरक्षक या सपा सुप्रीमो ने उनकी व्यथा को ना समझते हुए एक बार वहां जाकर आजमगढ़ की जनता से अपील भी करने से बचते रहे.

आजमगढ़ के क्षेत्र की जनता में लगातार यह चर्चा का विषय बना रहा है कि विधानसभा चुनाव में हमने आजमगढ़ की समस्त सीटों से समाजवादी पार्टी को विजय दिलाई और लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव को भारी बहुमत के साथ जिताया क्या उसका परिणाम यह है कि अखिलेश यादव ने आजमगढ़ की सीट छोड़ दी और वहां से अपने भाई धर्मेंद्र यादव को प्रत्याशी बनाया. बावजूद इसके आजमगढ़ की जनता से एक बार यह अपील करने नहीं आए कि हम उत्तर प्रदेश विधानसभा में आप लोगों का पक्ष रखने के लिए गए हैं और यहां से मेरा भाई धर्मेंद्र यादव आप लोगों की सेवा के लिए निरंतर आपके साथ रहेगा. शायद सपा सुप्रीमो या सपा संरक्षक आजमगढ़ जाकर एक बार जनता से अपील कर लेते तो धर्मेंद्र यादव का रण बहुत आसान हो जाता. हां हम एक बात यह जरूर कह सकते हैं कि धर्मेंद्र यादव जिस तरह से लोकसभा में अपनी बात को बड़ी बेबाकी के साथ और आधार के साथ रखते थे उसी विश्वास के साथ उन्होंने अपनी मंशा को आजमगढ़ जनता के बीच रखा अब देखना यह है कि जनता धर्मेंद्र यादव पर कितना विश्वास जताती है. अब यह तो भविष्य के गर्भ में है कि परिणाम क्या होता है उसके लिए आपको प्रतीक्षा करनी होगी…

राजनीतिक धुरन्धरों का मानना है कि अखिलेश का आजमगढ़ के चुनाव में प्रचार के लिए ना आना एक रणनीति का हिस्सा हो सकता है. सपा सुप्रीमों को अपने मजबूत जनाधार और जातिगत आधार पर पूरा भरोसा हो सकता है. साथ ही स्थानीय नेताओं की नाराजगी दूर करने के लिए चुनाव की सारी कमान उन्हें ही सौंपी गई है ताकि उन्हें ये ना लगे कि जीत का श्रेय बड़े नेता ले गए. हालांकि राजधानी से आजमगढ़ की सारी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है मगर सत्ताधारी दल सपा की इस रणनीति को अखिलेश के ‘रणछोड़दास’ के रूप में प्रचारित प्रसारित कर लाभ लेने की जुगत बैठा रही है.

आजमगढ़ लोकसभा सीट पर किस पार्टी की दावेदारी मजबूत है. 2022 के विधानसभा चुनावों में आजमगढ़ की सभी सीटों पर सपा का कब्जा रहा है. आजमगढ़ लोकसभा सीट में पांच विधानसभा सीटें आती हैं, गोपालपुर, सगड़ी, मुबारकपुर, आजमगढ़ और मेहनगर. पांचों विधानसभा सीटों पर सपा को करीब 4 लाख 36 हजार वोट मिले थे, जबकि भाजपा के उम्मीदवारों को 3 लाख 30 हजार के करीब वोट मिल पाए थे. हालांकि वोटों की तुलना की जाए तो 2019 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले सपा और भाजपा दोनों को ही विधानसभा में कम वोट मिले थे. सपा को करीब 2 लाख वोट कम मिले तो वहीं भाजपा को 30 हजार वोटों का नुकसान हुआ.इस प्रकार देखा जाय तो सपा का वोट बैंक काफी कम हुआ था.सपा सुप्रीमों व सपा संरक्षक का आजमगढ़ न जाने क्या संदेश दे रहा है. इसे हम भविष्य के गर्त में छोड़ते हैं.

आजमगढ़ और रामपुर में चुनाव प्रचार थमा,लोकसभा की दोनों सीटों पर चुनाव प्रचार थमा,23 जून को आजमगढ़ और रामपुर में मतदान,आज सुबह से पोलिंग पार्टियां रवाना की होंगी,लोकसभा उपचुनाव के लिए प्रचार का शोर थमा.प्रचार के अंतिम दिन दिग्गजों ने झोंकी पूरी ताकत,दोनों सीटों पर 26 जून को मतगणना होगी,आजमगढ़ से भाजपा प्रत्याशी हैं दिनेश लाल यादव, सपा प्रत्याशी हैं धर्मेंद्र यादव,बसपा प्रत्याशी शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली हैं.