जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति बनने से राजनीति में राजस्थान का महत्व और बढ़ेगा

जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति बनने से देश की राजनीति में राजस्थान का महत्व और बढ़ेगा।यह धनखड़ का ही करिश्मा है कि ममता बनर्जी के सांसदों ने मतदान में भाग नहीं लिया।विपक्ष में राष्ट्रपति चुनाव जैसी एकता भी देखने को नहीं मिली।

6 अगस्त को मतदान के बाद उपराष्ट्रपति चुनाव का परिणाम भी घोषित हो रहा है। भाजपा के गठबंधन वाले एनडीए के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ का उप-राष्ट्रपति बनना तय है। लोकसभा और राज्यसभा के 780 सांसदों में से 400 से भी ज्यादा सांसद धनखड़ के समर्थन में हैं। विपक्षी दलों ने विगत दिनों राष्ट्रपति चुनाव के समय जो एकजुटता दिखाई थी, वह उपराष्ट्रपति चुनाव में देखने को नहीं मिली। कांग्रेस के गठबंधन वाले यूपीए ने पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था। सिन्हा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पसंद के उम्मीदवार थे, लेकिन फिर भी नामांकन के समय कांग्रेस के नेता राहुल गांधी भी उपस्थित रहे। कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति चुनाव में एजुटता दिखाई। लेकिन वैसी एकजुटता अब उपराष्ट्रपति चुनाव में देखने को नहीं मिली है।

विपक्ष की एकता को सबसे बड़ा झटका तो खुद ममता बनर्जी ने दिया है। ममता के नेतृत्व वाली टीएमसी के सभी सांसदों ने उप-राष्ट्रपति चुनाव में भाग नहीं लिया। ममता का कहना है कि कांग्रेस ने मार्गेट अल्वा को एकतरफा निर्णय लेकर उम्मीदवार घोषित कर दिया। चूंकि उपराष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार को लेकर विपक्ष में आप सहमति नहीं बनाई, इसलिए ममता के सांसदों ने वोट नहीं डाला। आम सहमति न बनाने का तो बहाना है, असल में ममता के सांसदों के बहिष्कार के पीछे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और उपराष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ का करिश्मा है।

राज्यपाल के पद पर रहते हुए धनखड़ की भले ही ममता बनर्जी से तनातनी रही हो, लेकिन धनखड़ ने कभी भी ममता से व्यक्तिगत संबंध खराब नहीं किए। धनखड़ ने व्यक्तिगत स्तर पर ममता के साथ जो सद्व्यवहार किया, उसी का परिणाम है कि ममता के सांसदों ने उप-राष्ट्रपति चुनाव का बहिष्कार किया। हालांकि धनखड़ की जीत तो पहले से ही तय थी, लेकिन ममता के बहिष्कार ने धनखड़ की जीत के महत्व को और बढ़ा दिया। चुनाव का बहिष्कार कर ममता ने एक तरह से धनखड़ का समर्थन ही किया है। अब जब धनखड़ उपराष्ट्रपति बन रहे हैं, तब केंद्र सरकार में भी धनखड़ का महत्व बढ़ जाएगा।

माना जा रहा है कि धनखंड की भूमिका से केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल की सरकार में भी कटुता कम होगी। कहा जा सकता है कि देश की राजनीति में आने वाले दिनों में धनखड़ की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। पश्चिम बंगाल का राज्यपाल रहते हुए धनखड़ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का भरोसा भी इसलिए किया है। धनखड़ के उपराष्ट्रपति बनने के साथ ही देश की राजनीति में राजस्थान का महत्व और बढ़ जाएगा। धनखड़ राजस्थान के झुंझुनू से सांसद व अजमेर के किशनगढ़ से विधायक भी रह चुके हैं। एडवोकेट होने के कारण धनखड़ ने राजस्थान हाईकोर्ट में वकालत भी की। धनखड़ से पहले राजस्थान के सांसद ओम बिरला लोकसभा के अध्यक्ष पद पर आसीन हैं, उप-राष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति भी होते हैं।

यानी अब संसद के दोनों सदनों की कमान राजस्थानियों के हाथों में है। राजस्थान से जुड़े भूपेंद्र यादव, गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुनराम मेघवाल, कैलाश चौधरी आदि पहले से केंद्रीय मंत्री हैं। इतने मंत्रियों और संसद के दोनों सदनों की जिम्मेदारी से राजस्थान के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। मौजूदा समय में जगदीप धनखड़ की स्थिति सबसे मजबूत और प्रभावी हो गई है। देखना है कि इस मजबूत स्थिति का कितना फायदा राजस्थान को मिलता है।