निर्विभागीय उपमुख्यमंत्री की जरूरत..?

86

– श्याम कुमार

जिस प्रकार यह देश का सौभाग्य है कि उसे प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी मिले, उसी प्रकार यह उत्तर प्रदेश का सौभाग्य है कि उसे मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ मिले। लेकिन प्रायः जिसे मामूली चूक समझकर ध्यान नहीं दिया जाता है, वह चूक आगे चलकर बहुत घातक सिद्ध होती है। उत्तर प्रदेश के मामले में ऐसा ही हुआ। योगी आदित्यनाथ जितना परिश्रम कर रहे हैं, आज तक किसी भी मुख्यमंत्री ने उतना परिश्रम नहीं किया। वह प्रदेश का व्यापक दौरा कर रहे हैं तथा कोरोना के संक्रमण से ठीक होने के तुरंत बाद आराम किए बिना उनकी युद्ध-स्तर पर पुनः सक्रियता षुरू हो गई। जब वह संक्रमित थे, उस समय भी आॅनलाइन पूरा काम करते रहे। उनकी ईमानदार छवि सर्वत्र प्रषंसित है। फिर भी षासन की कुछ कमियों ने उनकी उपलब्धियों की ज्योति को मंद कर दिया तथा जैसे चलनी से पानी रिस जाता है, उसी प्रकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अनगिनत उपलब्धियां उन कमियों के कारण फीकी पड़ने लगीं।

योगी आदित्यनाथ से जो सबसे बड़ी चूक हुई, वह यह कि प्रशसन में जनता की कहीं भी सुनवाई नहीं होती है। मुख्यमंत्री जनता की सुनवाई के लिए बार-बार कड़े निर्देश करते रहे हैं, लेकिन अफसरषाही ने उन निर्देषों पर कभी अमल नहीं किया। मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि सभी अफसर सरकार द्वारा दिए गए सीयूजी मोबाइल फोन स्वयं उठाया करें और जनता की समस्याएं सुनकर उनका निवारण करें, लेकिन कोई भी अफसर ऐसा नहीं करता। फील्ड में अफसर जनता की सेवा के लिए नहीं, ऐश करने व कमाने के लिए जाते हैं। चूंकि मुख्यमंत्री उन्हीं अफसरों पर निर्भर रहते हैं, इसलिए उन अफसरों की लापरवाही की जांच नहीं होती है। यदि होती भी है तो सिर्फ कागजों पर किसी को दंड का कोई भय नहीं है, इसलिए सब स्वछंद हो रहे हैं।


सरकारी स्तर पर ‘मुख्यमंत्री पोर्टल’ आदि की व्यवस्था की गई है, लेकिन वे व्यवस्थाएं निरर्थक सिद्ध हुईं। मुख्यमंत्री तक लोगों की चिट्ठियां पहुंच पाना दुर्लभ है। पहले मुख्यमंत्री-आवास की एक खिड़की पर लोगों की चिट्ठियां, ज्ञापन आदि ले लिए जाते थे, लेकिन बाद में वह व्यवस्था बंद कर दी गई। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री-आवास के सामने वाली सड़क दोनों ओर उसी प्रकार बंद कर दी गई, जिस प्रकार मायावती के समय में बंद रहती थी और जिसे अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद पब्लिक के गमानागमन के लिए खोल दिया था। शास्त्री भवन(एनेक्सी) में एक काउंटर पर चिट्ठियां ले जाती थीं, लेकिन जब से मुख्यमंत्री-कार्यालय वहां से लोकभवन शिफ्ट हुआ, उस काउंटर पर लोगों के पत्र लिए जाने बंद कर दिए गए। जब महेश कुमार गुप्त सचिवालय प्रशासन के अपर मुख्य सचिव थे तो मैंने कई बार यह जनसमस्या उन्हें बताई थी, जिस पर उन्होंने विधानभवन के प्रवेशद्वार-संख्या 9 पर जनता के पत्र आदि स्वीकार किए जाने के निर्देष दिए थे, लेकिन वह निर्देश हवाहवाई होकर रह गया।

‘मुख्यमंत्री पोर्टल’ का यह हाल है कि वहां जैसे आंख बंद करके काम किया जाता है और वहां से षिकायतों का निस्तारण नहीं होता है। कई बार मैंने किसी विभाग के बारे में षिकायत या सुझाव लिखे अथवा जनहित का कोई कार्य कराने का अनुरोध किया तो आष्चर्यजनक रूप से मेरा वह पत्र सम्बंधित विभाग के बजाय प्रदेष के किसी सुदूरवर्ती नगर के पुलिस थाने में भेज दिया गया, जबकि उस थाने का मेरे उस पत्र से कोई मतलब नहीं था। कल्याण सिंह एवं राजनाथ सिंह के समय में ‘जनता दर्षन’ कुछ सीमा तक कारगर हो जाता था तथा मुख्यमंत्री तक पहुंचने का जनता को अवसर मिलता था, लेकिन वह व्यवस्था बंद हो गई। जिलों व तहसीलों में जनता की फरियाद अभी भी बिलकुल अनसुनी रहती है।

मुख्यमंत्री का बार-बार आदेश है कि जिलों एवं तहसीलों में जनता की समस्याओं की भलीभांति सुनवाई हो और उनका तत्काल निस्तारण किया जाय। मगर स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री आदेश देते रहते हैं, पर उन आदेषों पर अमल नहीं होता। नौकरशाही अपनी पुरानी चाल चलती रहती है। चूंकि दंड का भय नहीं है, इसलिए नौकरषाही सरकार को फेल करने पर तुली हुई है। पुलिस विभाग का भी बिलकुल पहले-जैसा हाल है। उसके आचरण में लेशमात्र अंतर नहीं आया है। जनता को वहां पहले की तरह दुत्कारा जाता है तथा आसानी से रिपोर्ट नहीं दर्ज होती है।यही हाल भ्रश्टाचार का है। मुख्यमंत्री की ईमानदार छवि है, लेकिन उनके अलावा ऊपर से नीचे तक लगभग सर्वत्र भ्रश्टाचार का बोलबाला है तथा जनता का षोशण होता है।

उत्तर प्रदेश को यदि भाजपा के हाथ से खिसकने से बचाना है तो प्रधानमंत्री मोदी को तत्काल ठोस एवं कारगर कदम उठाने होंगे। उत्तर प्रदेशा के दोनों उपमुख्यमंत्री एवं अधिकतर मंत्री किसी मतलब के नहीं हैं। अतः या तो सरकार में भारी परिवर्तन किया जाय अथवा मोदी के विष्वस्त अरविंद कुमार शर्मा को तीसरा उपमुख्यमंत्री बना दिया जाय। उन्हें कोई विभाग सौंपने के बजाय निर्विभाग उपमुख्यमंत्री बनाया जाय। उनका एकमात्र दायित्व जनसमस्याओं की सुनवाई करना तथा उनका निस्तारण कराना हो। इस मामले में उन्हें पूरी तरह सर्वाधिकार सम्पन्न भी किया जाय। उन्हें किसी भी विभाग से पूछताछ करने का तथा जनसमस्याएं हल न होने पर सम्बंधित किसी भी अफसर के विरुद्ध कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार हों

http://demo.nishpakshdastak.com/पर देश-प्रदेश की ताजा और स्‍पेशल स्‍टोरी पढ़ते हुए अपने आप को अप-टू-डेट रखिए। हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर और इंस्टाग्राम पर फॉलो करें।

लखनऊ में मोहलनलालगंज के उपजिलाधिकारी पर लाखों रुपये घूस लेने का आरोप लगा, लेकिन उसे निलम्बित तक नहीं किया गया तथा दूसरी तहसील में उपजिलाधिकारी बना दिया गया। प्रदेश में अफसरषाही बुरी तरह हावी है तथा अहंकार में डूबे अफसर जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझते हैं। वैसे भी अफसर यह जानते हैं कि सरकारें बदलती रहती हैं, इसलिए वे सिर्फ अपना हित देखते हैं और सभी पार्टियों को साधे रहते हैं। बिलकुल यही हाल अधिकतर मंत्रियों का है। इक्का-दुक्का मंत्रियों को छोड़कर षेश मंत्री अहंकार में चूर हैं तथा जनता से उनका कोई वास्ता नहीं रहता है। उनके इर्दगिर्द चाटुकारों के गिरोह बने हुए हैं और जनता के बजाय केवल उनका ही भला होता है। भ्रश्टाचार का यह हाल है कि एक मंत्री के विभाग के लोगों ने बताया कि उनके विभाग से मंत्री के यहां हर महीने तीन लाख रुपये की तो सिर्फ मिठाई जाया करती है।


ऐसे तमाम कारणों से प्रदेष में जो व्यापक जनअसंतोश फैला हुआ है, उसकी झलक पिछले पंचायत-चुनावों में परिलक्षित हुई। जबकि वास्तविकता यह है कि उत्त्र प्रदेष में योगी आदित्यनाथ का न तो कोई विकल्प है और न इस समय उनसे अच्छा मुख्यमंत्री कोई हो सकता है। प्रदेष में उत्पन्न इस विशम स्थिति के कारण ही चर्चा होने लगी है कि अगले विधानसभा-चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत बहुत टेढ़ी खीर होगी। लम्बे अरसे से इस जनअसंतोश की चर्चा है। स्वयं मैं कई बार अपने आलेखों में इसका उल्लेख कर चुका हूं। आष्चर्य है कि प्रधानमंत्री मोदी का खुफियातंत्र इतना निरर्थक है कि उसने उत्तर प्रदेष में व्याप्त जनअसंतोश की सही जानकारी पहले मोदी को नहीं दी। अब जब पानी सिर से ऊपर चला गया है और विधानसभा के चुनाव को बहुत कम समय रह गया है, तब मोदी सरकार की नींद खुली है और उत्तर प्रदेष की तरफ उसका ध्यान केंद्रित हो रहा है।


यह निर्विभाग अथवा जनसमस्या-निस्तारण उपमुख्यमंत्री राजधानी से लेकर जनपदों तक अफसरों पर कड़ाई से चाबुक लगाएं तथा जहां भी जनता की समस्याएं हल होने में ढिलाई पाई जाय, कठोर दंडात्मक कार्रवाई करें। प्रदेश भर में जनता से प्राप्त होने वाली प्रत्येक षिकायत का ब्योरा उन उपमुख्यमंत्री के पास हो तथा निर्धारित अवधि में उस षिकायत का निस्तारण किया जाना अनिवार्य हो। भ्रश्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई का भी उन उपमुख्यमंत्री को पूरा अधिकार हो।