साइकिल का साथ छोडतीं सवारियां

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साइकिल का साथ छोडतीं सवारियां
साइकिल का साथ छोडतीं सवारियां

सपा अपने साथ जातीय आधार वाले छोटे दलों व नेताओं को साथ लेकर 2022 के विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत 47 से बढ़ाकर 111 विधायकों कर ली थी। विगत दो वर्षों में ही एक-एक कर सपा के सभी सहयोगी दल अब उसका साथ छोड़कर जा चुके हैं। सपा के राजनीतिक दलों के साथ रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे हैं।सपा लोगों को ज्यादा समय तक अपने साथ जोड़ कर रख नहीं पाती है। साइकिल का साथ छोडतीं सवारियां

समाजवादी पार्टी प्रदेश में राजनीति की प्रयोगशाला में लगातार प्रयोग कर रही है।समाजवादी पार्टी ने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जातीय आधार वाले छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन का प्रयोग किया। सपा अध्यक्ष अखिलेश ने जिन छोटे-छोटे दलों के सहारे 2022 के विधानसभा चुनाव में अब तक का सबसे अधिक 32.06 प्रतिशत वोट हासिल किया और 111 सीटों पर सफलता प्राप्त की। आज एक-एक कर सभी साथी उसका साथ छोड़कर चले गए हैं। विधानसभा चुनाव के बाद सबसे पहले राजभर मतदाताओं में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले ओम प्रकाश राजभर ने सपा को ‘तलाक’ दिया। वह फिर से एनडीए गठबंधन में शामिल होकर योगी सरकार में मंत्री भी बन गए हैं।

सपा का साथ छोड़ने वालों पर नजर डालते हैं। सबसे पहले पूर्वांचल से ओमप्रकाश राजभर ने साथ छोड़ा, फिर जयन्त चौधरी, जनवादी पार्टी के संजय सिंह चौहान,महान दल के केशव देव मौर्य,अपना दल कमेरावादी की कृष्णा पटेल को साइकिल की सवारी रास नहीं आई। वहीं, ओबीसी समाज के प्रमुख नेता स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान व धर्म सिंह सैनी भी अब सपा का साथ छोड़ चुके हैं। इस समय सपा के साथ केवल कांग्रेस पार्टी है।

करीब दो महीने पहले सपा गठबंधन के सबसे मजबूत साथी रालोद अध्यक्ष जयन्त चौधरी भी साइकिल से उतर गए। छह वर्ष पुरानी दोस्ती तोड़कर वह भी एनडीए का हिस्सा बन गए। वर्ष 2018 में कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में सपा व रालोद की नजदीकियां बढ़ी थीं, इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन में रालोद भी शामिल हो गया था। वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव भी सपा व रालोद ने मिलकर लड़ा था। जाट, यादव व मुस्लिम मतों की एकजुटता से रालोद को आठ सीटों पर सफलता मिली थी। सपा. भी वहां पर मजबूत हुई थी। रालोद ने खतौली विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में भी एक सीट जीती थी। रालोद के साथ रहने से पश्चिम यूपी को लेकर अखिलेश निश्चिंत दिखाई देते थे। अब रालोद का साथ भी सपा के साथ नहीं रहा।

अपना दल (कमेरावादी) से गठबंधन खत्म करने की घोषणा पिछले दिनों अखिलेश यादव ने खुद ही यह कहते हुए कर दी थी कि अपना दल (कमेरावादी) से 2022 में गठबंधन था, 2024 में नहीं है। अपना दल तीन लोकसभा सीटें मांग रही थी, जिसे अखिलेश यादव ने स्वीकार नहीं किया। पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने अपना दल की पल्लवी पटेल को अपने चुनाव चिह्न पर सिराथू से चुनाव लड़ाया था। उन्होंने उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को चुनाव हरा दिया था। पल्लवी ने भी साफ कर दिया है कि अखिलेश चाहें तो उनकी विधानसभा सदस्यता खत्म करने की सिफारिश विधानसभा अध्यक्ष से कर सकते हैं।

लोनिया चौहान वोटों के लिए सपा ने जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के डा. संजय सिंह चौहान की पार्टी से वर्ष 2019 में गठबंधन किया था। सपा ने 2019 में संजय सिंह चौहान को चंदौली सीट से अपने चुनाव चिह्न पर उतारा था, किंतु वह भाजपा से हार गए थे। इस बार संजय घोसी लोकसभा सीट से टिकट मांग रहे थे। सपा ने राजीव राय को टिकट दिया है। इसी से नाराज होकर उन्होंने भी सपा से गठबंधन तोड़ लिया है। योगी आदित्यनाथ की पहली सरकार में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान व धर्म सिंह सैनी भी वर्ष 2022 के विस चुनाव से पहले सपा में शामिल हो. गए थे। एक-एक कर ये तीनों भी सपा का साथ छोड़ चुके हैं। सपा छोटे दलों के साथ मिलकर भले ही विस चुनाव में सत्ता हासिल न कर पाई हो, किंतु उसने भाजपा को कई जिलों में कड़ी चुनौती दी थी। गाजीपुर, आजमगढ़ और अंबेडकरनगर जिले में भाजपा खाता भी नहीं खोल सकी थी। इसके बावजूद सपा इन छोटे दलों को साधकर नहीं रख सकी। एक-एक कर सभी उससे दूर होते गए। वर्तमान में सपा के साथ कांग्रेस ही बची है। ऐसे में वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन दोहरा पाना भी उसके लिए आसान नहीं दिख रहा है। सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है। भाजपा डरा-धमकाकर दलों को तोड़ रही है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। प्रदेश में सपा ही भाजपा को हराएगी। साइकिल का साथ छोडतीं सवारियां