भोजन क बर्बादी देखि कय जीव सिहर उठत हय

चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से

नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान


ककुवा ने मुंडन-शादी दावतों में भोजन बर्बाद होने की चर्चा करते हुए कहा- भइया, एकु हमार जमाना रहय। तब सगरे नेवताहरी पत्तल सफाचट कयके उठत रहयं। एकु तुमार जमाना आवा हय। अब प्लेटन म खाना छोड़ब बड़ मनई कय निशानी समझी जात हय। हे भगवान! केतना भोजन बर्बाद कीन जाय रहा हय। हमार जइस कुछु नेवताहरिन का छोड़ि क सगरे अपनी प्लेटन मा खाना छोड़ि देति हयँ। युह नाय सोचत कि हम जौनि बखत खाना फेंक रहे हन। वही बखत न जाने कतने गरीब मनई भूखे परे होइहैं। अब तौ नेवता-हकारि क बाति छोड़व, नइकी पीढ़ी घरहू म खाना छोड़ि देति हय। समाज का यहि पर विचार करय क चही। अन्न देवता केरे अपमान ते सब जने का बचय चही। अरे! जतनी भूख होय, वतना भोजन लेव। तुम पंच थरिया म खाना छोड़ब बन्द करव। बड़ मनई हौ तौ बड़ मनई तिनके कामव करव। सब जने पढ़े लिखे गंवार न बनव।


मैं आज चबूतरे पर सबसे पहले पहुंच गया था।चतुरी चाचा हुक्का गुड़गुड़ाने के बाद बड़े इत्मीनान से पलथी रमाये बैठे थे। गांव के बच्चे मैदान में ‘छुई-छुव्वर’ खेल रहे थे। पुरई बंगले की सफाई कर रहे थे। चटक धूप खिलने से मौसम गुलाबी था। चतुरी चाचा कुछ बतखाव शुरू करने वाले थे। तभी ककुवा व बड़के दद्दा चबूतरे पर पधार गए। पच्छे टोला से मुंशीजी व कासिम चचा की भी जोड़ी आ गई। प्रपंच शुरू होता कि बड़को व नदियारा भौजी निकल पड़ीं। दोनों के हाथ में बड़े बैग देखकर चतुरी चाचा ने पूछा- बड़को सबेरे-सबेरे बहुरिया संघे कहाँ जाय रही हौ। इतना सुनते ही बड़को लालपीली हो गईं। वह बोली- चतुरी भइया, तुमार टोकनी आदत बड़ी खराब हय। कौनव गलियारा स निकर नाय सकत। जब तलक तुमका बताय न दे कि उ कहाँ जाय रहा। अब टोकि दिहौ तौ सुनि लेव। हम अपनी पतोहू संघे बिट्टन क ससुरे जाय रहिन। हुवां काल्हि वहिकी ननद केरी बारात आई। इतना बताकर बड़को और नदियारा भौजी चली गईं। तब ककुवा ने अन्न की बर्बादी को लेकर प्रपंच शुरू किया। वह मुंडन, शादी व अन्य दावतों में भोजन फेंके जाने से बड़े व्यथित थे।


चतुरी चाचा ने ककुवा की बात का समर्थन करते हुए कहा- ककुवा भाई, तुम बड़ा नीक मुद्दा उठाय हौ। दावतन मा भोजन क बर्बादी देखि कय जीव सिहर उठत हय। हम इ महीना मा 10-12 तिलक अउ विहाव म गयेन। सब कहूँ भोजन क नास होत द्याखा। जतना मनई खात हय। वतने मनई क भोजन प्लेटन मा छोड़ि दीन जात हय। इज्जत बचाव ख़ातिन लोग नेवताहरिन ते दुगना भोजन बनवावत हयँ। जे लिमिट म खाना बनवावत हय। वहिके हुवां अंत मा खानय खतम होय जात हय। पारटिम नाना प्रकार क व्यंजन देखि कय लोगबाग आपम परि जात हयँ। यहौ लै लेइ, वहौ लै लेइ। उई अपन प्लेट भरत चले जात हयँ। आखिरी म आधा-अधूरा खाय क प्लेट खिसकाय देत हयँ। कुछु ज़ने बड़े-बड़उव्वा बनय चलतन प्लेटन म खाना छोड़त हयँ। साँच पूछौ तौ यह बड़ी गंदी आदत हय। यहि पय लगाम लागय क चही। कोंटलन पका-पकवा भोजन नाली म चला जात हय। हम पँचन का सोचय क चही कि अपने देस म आजव केतना मनई भूखे सोय जात हय।


इसी बीच चंदू बिटिया हम प्रपंचियों के लिए जलपान लेकर आ गई। आज जलपान में तुलसी-अदरक की कड़क चाय के साथ मक्के के उबले भुट्टे व हरी धनिया-मिर्च की चटपटी चटनी थी। सबने उबले भुट्टों का स्वाद लिया। फिर कुल्हड़ वाली चाय के साथ प्रपंच आगे बढ़ा।कासिम चचा ने कहा- शादी-ब्याह में सिर्फ भोजन की ही बर्बादी नहीं होती है। अब तो रुपयों की भी बड़ी बर्बादी होती है। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए शादी करना टेढ़ी खीर हो गया है। समाज में दिनोंदिन दिखावा बढ़ता ही जा रहा है। कई लाख रुपये तो केवल टेंट और लाइट में ही स्वाहा हो जाते हैं। दावत में तरह-तरह का नाश्ता और भोजन बनवाना अनिवार्य है। डीजे, बैंड व आर्केस्ट्रा आदि अलग से करना होता है। लड़की की शादी दहेज के कारण पहले से ही बड़ी महंगी पड़ती थी। लेकिन, अब तो झूठी शान के चक्कर लड़के की भी शादी बहुत महंगी पड़ने लगी है। पहले लड़की की शादी में कुछ नकदी, घड़ी, रेडियो और साइकिल देने से नाम हो जाता था। गांव-जवार में चर्चा होती थी कि फला ने अपनी लड़की की शादी बड़ी अच्छी की है। आज तिलक में लाखों रुपये नकद देने पड़ते हैं। महँगी मोटर साइकिल या लग्जरी कार अलग से मांगी जाती है। बारात का शाही स्वागत करना होता है। विदाई में महंगा सोफा, वाशिंग मशीन, एलसीडी, एसी, मिक्सी, डायनिंग टेबल सहित घर गृहस्थी का सारा सामान देना होता है।


मुंशीजी ने कासिम चचा की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा- आजकल गरीब आदमी लड़की की शादी के बारे में सौ बार सोचता है। मध्यम वर्ग की लड़की को भी दहेज के कारण उपयुक्त वर नहीं मिल पाता है। अगर आपके पास मोटी रकम है तो लड़की के लिए डॉक्टर, इंजीनियर, अच्छी जॉब, व्यवसाय वाला लड़का आराम से मिल जाएगा। वरना, आपको अपनी पढ़ीलिखी लड़की को किसी सामान्य लड़के संग ब्याहना होगा। इसी चक्कर में न जाने कितने लोगों की जमीन बिक जाती है। तमाम लोग कर्जे में डूब जाते हैं। बेटी हर किसी को प्यारी होती है। हर कोई घर में बेटी चाहता है। बस, लोगों को यही दहेज, दिखावा खलता है। समाज में दहेज जहां सुरसा की तरह मुंह फैलाए है। वहीं, दूसरी तरह छेड़खानी, बलात्कार, घरेलू हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में लोग चाहते हैं कि उनके घर लड़की न हो तो ही अच्छा रहेगा। इन्हीं सब कारणों से कन्या भूर्ण हत्या अथवा नवजात बेटी को फेंकने के मामले सामने आते हैं। इस समस्या पर विचार किया जाना जरूरी है।


बड़के दद्दा ने विषय परिवर्तन करते हुए कहा- आजकल यूपी, पँजाब, उत्तराखंड, गोवा व मणिपुर राज्यों में आसन्न विधानसभा चुनाव को लेकर बड़ी गहमागहमी है। राजनीतिक दलों का सबसे ज्यादा जोर उत्तर प्रदेश पर है। क्योंकि, यह देश का सबसे बड़ा राज्य है। दिल्ली दरबार का रास्ता यूपी से ही निकलता है। राजनीतिक दल गठबंधन कर रहे हैं। नेताओं में दलबदल की होड़ है। सत्ताधारी भाजपा ने यूपी को रिकॉर्ड सीटों से जीतने के लिए सारी ताकत झोंक रखी है। वहीं, सपा, बसपा व कांग्रेस अपनी खोई जमीन तलाश रही है। चुनाव एक बार फिर जाति/धर्म पर केंद्रित होता जा रहा है। विकास का मुद्दा बहुत पीछे छूटता जा रहा है। मंहगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी हवा में उड़ने लगे हैं। सारे दल जाति/धर्म के आधार पर मतदाताओं को लुभाने में जुटे हैं। हालांकि, यह प्रवृत्ति भारतीय लोकतंत्र को खोखला करती जा रही है।


अंत में मैंने कोरोना का अपडेट देते हुए बताया कि विश्व में अबतक 26 करोड़ आठ लाख से ज्यादा लोग कोरोना ग्रसित हो चुके हैं। इनमें 52 लाख छह हजार से ज्यादा लोग बेमौत मारे जा चुके हैं। इसी तरह भारत में अबतक तीन करोड़ 46 लाख से अधिक लोग कोरोना पीड़ित हो चुके हैं। इनमें चार लाख 67 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। भारत में युद्ध स्तर कोरोना टीका लगाया जा रहा है। बच्चों की कोरोना वैक्सीन अभी तक नहीं आ सकी है। विश्व में अभी कोरोना महामारी का प्रकोप थमा नहीं है। कई देश एक बार फिर लॉकडाउन की स्थिति में हैं। ऐसे में मॉस्क और दो गज की दूरी का पालन जरूरी है। हर व्यक्ति को कोरोना वैक्सीन की दोनों खुराक समय रहते ले लेनी चाहिए।इसी के साथ आज का प्रपंच समाप्त हो गया। मैं अगले रविवार को चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे पर होने वाली बेबाक बतकही लेकर फिर हाजिर रहूँगा। तबतक के लिए पँचव राम-राम!