क्या समाजवाद की आत्म-आलोचना और वास्तविक लोकतंत्र..?

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क्या है समाजवाद की आत्म-आलोचना और वास्तविक लोकतंत्र..?
क्या है समाजवाद की आत्म-आलोचना और वास्तविक लोकतंत्र..?

समाजवाद का लक्ष्य, समाज के आर्थिक और नैतिक आधार को बदलना था। समाजवाद में, जीवन में व्यक्तिगत नियंत्रण की जगह सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना चाहा जाता था। क्या समाजवाद की आत्म-आलोचना और वास्तविक लोकतंत्र..?

लोकतंत्र में वर्ग-विभाजित आर्थिक व्यवस्थाएं होती हैं इसलिए वह एक असंगत व्यवस्था है। गुलामी में स्वामी शासन करते हैं तथा सामंतवाद में प्रभु और पूंजीवाद में पूंजीपति/मालिक शासन करते हैं। सरकार के जो भी रूप (प्रतिनिधि-चुनावी व्यवस्था सहित) वर्ग-विभाजित आर्थिक व्यवस्थाओं के साथ सह-अस्तित्व में होते हैं उनकी कठोर वास्तविकता यह है कि इसमें एक वर्ग दूसरे पर शासन करता है। पूंजीवादी वयवस्था को लाने के लिए अन्य व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंकने वाले क्रांतिकारियों का इरादा, कभी-कभी लगता था कि वे वास्तविक लोकतंत्र लाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वास्तविक लोकतंत्र का मतलब – एक व्यक्ति, एक वोट, पूर्ण भागीदारी और बहुमत का शासन जो बड़े कर्मचारियों के वर्गों को छोटे संख्या वाले पूंजीवादी वर्गों पर शासन करने में सक्षम बनाता हो। इसके बजाय, पूंजीवादी मालिकों ने वास्तविक लोकतंत्र को बाधित कर दिया और व्यवस्था को अपनी आर्थिक स्थिति (कर्मचारियों को काम पर रखना/निकालना, उत्पादन बेचना, लाभ हासिल करना/वितरित करना) को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया है।

जो लोकतंत्र बचा वह महज औपचारिक था। वास्तविक लोकतंत्र की जगह, पूंजीपतियों ने खुद के वर्ग के निज़ाम को सुरक्षित बनाने के लिए धन और शक्ति का इस्तेमाल किया। उन्होंने सबसे पहले इसे महत्वपूर्ण पूंजीवादी उद्यमों के भीतर किया जहां मालिक लोग कर्मचारियों के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं और निरंकुश मालिक के रूप में काम करते हैं। इस तरह, एक वर्ग के रूप में पूंजीपति/मालिक लोग चुनावी या अन्य व्यवस्थाओं के माध्यम से राजनीति खरीद ली या उस पर हावी हो गए।

रूस में 1917 की क्रांति से पहले और बाद में समाजवाद ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण आंदोलन के रूप में पूंजीवाद में वास्तविक लोकतंत्र के न होने को निशाना बनाया था। पिछली तीन शताब्दियों में समाजवाद का उल्लेखनीय वैश्विक प्रसार उस लक्ष्य पर जोर देने की बुद्धिमत्ता की पुष्टि करता है। पूंजीवाद में मजदूर/कर्मचारी वर्गों का आक्रोश अपने मालिकों के खिलाफ बढ़ने लगा। बदलते हालात ने यह तय कर दिया कि गुस्सा/आक्रोश कितना सचेत है उसकी अभिव्यक्तियां कितनी साफ हैं और उसके रूप कितने विविध हो गए थे या हैं।

समाजवाद में सभी के पास समान संपत्ति होती है। इसलिए, काम करने के लिए कोई भौतिक प्रोत्साहन नहीं होता। समाजवाद में, प्रोत्साहन से उत्पादकता बढ़ती है। कई आलोचकों ने सोवियत संघ की विफलताओं के आधार पर समाजवाद की आलोचना की है।लोकतंत्र में वर्ग-विभाजित आर्थिक व्यवस्थाएं होती हैं। लोकतंत्र में, गुलामी में स्वामी, सामंतवाद में प्रभु और पूंजीवाद में पूंजीपति शासन करते हैं।समाजवाद का प्रयोग व्यक्तिवाद के विरोध में किया जाता था।समाजवाद का लक्ष्य, समाज के आर्थिक और नैतिक आधार को बदलना था। समाजवाद में, जीवन में व्यक्तिगत नियंत्रण की जगह सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना चाहा जाता था।देश की आजादी के बाद भारतीय समाजवादियों का राष्ट्रवाद मुख्य रूप से राष्ट्र-निर्माण, सांप्रदायिक सौहार्द्र और स्वतंत्र विदेश नीति के निर्माण पर केंद्रित रहा। लेकिन वे नेहरू की चीन-नीति की जो 1962 की हार का कारण बनी। आलोचना में पीछे नहीं रहे। आज जब भाजपा-आरएसएस देश के भीतर व बाहर के काल्पनिक दुश्मनों से रक्षा के नाम पर अपनी प्रभुत्ववादी राजनीति की पैरोकारी करते हुए राष्ट्रवाद की दुहाइयां दे रही हैं तो उदारवादी (लिबरल्स) और वामपंथियों को प्रतिकार का कोई कारगर रास्ता नहीं सूझ रहा। आप भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद का प्रतिकार किसी अमूर्त अंतर्राष्ट्रीयतावाद के सहारे नहीं कर सकते। आज जिस झूठे और धर्मान्ध राष्ट्रवाद का प्रचार किया जा रहा है उसकी कारगर काट भारतीय समाजवादियों के सकारात्मक राष्ट्रवाद से ही की जा सकती है।

इतिहास की एक विशेष विडंबना यह रही कि समाजवादी देशों में वास्तविक लोकतंत्र न होने को उन देशों में कई समाजवादियों ने निरंतर निशाना बनाया। समाजवादी देशों में पूंजीवादी और समाजवादी दोनों देशों के बीच अन्य मतभेदों के बावजूद लोकतंत्र का न होना एक साझा समस्या माना गया। इसलिए सवाल उठता है कि 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी की शुरुआत में अलग-अलग पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं में समान औपचारिक लोकतंत्र (मतदान के उपकरण) और वास्तविक लोकतंत्र की समान अनुपस्थिति क्यों प्रदर्शित करती हैं…? समाजवादियों ने ऐसे जवाब विकसित किए जिनमें समाजवादी व्यवस्था की महत्वपूर्ण आत्म-आलोचना शामिल थी।

वे जवाब और आत्म-आलोचना इस मान्यता से उत्पन्न हुए कि पूंजीवादी और समाजवादी दोनों प्रणालियों में, व्यावसायिक उद्यमों (कारखानों, कार्यालयों, दुकानों) को मालिक/नियोक्ता और कर्मचारी के द्वंद्व के आसपास बड़े पैमाने पर संगठित किया गया था। यह निजी उद्यमों का सच था और रहेगा चाहे वे कमोबेश राज्य-विनियमित हों और इसी तरह राज्य के स्वामित्व वाले हों या फिर व्यावसायिक संचालित उद्यमों क्यों न हों। साथ ही, दासता वाली आर्थिक प्रणालियों का भी यही सच था: उत्पादक गतिविधियों का स्वामी-दास रिश्ता निजी और राज्य संचालित दोनों उद्यमों में प्रचलित था। इसी प्रकार, उत्पादन का स्वामी- सामंत (राजशाही) और निजी (जागीरदार) सामंती उद्यमों दोनों में प्रचलित था।

वास्तविक लोकतंत्र हर व्यवस्था के भीतर चाहे वह गुलाम, सामंती, पूंजीवादी और समाजवादी हो, समान रूप से असंगत साबित हुआ है, यहां तक कि समाजवादी व्यवस्थाओं ने भी अपने उद्यमों की प्रचलित नियोक्ता-कर्मचारी संरचना को बरकरार रखा। वास्तव में, तीनों प्रकार की आधुनिक समाजवादी व्यवस्थाएं नियोक्ता-कर्मचारी संरचना को प्रदर्शित करती हैं। पश्चिमी यूरोपीय सामाजिक लोकतंत्र ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे अधिकांश उत्पादन निजी पूंजीवादी उद्यमों के हाथों में छोड़ देते हैं जो हमेशा नियोक्ता-कर्मचारी नींव पर बने होते थे। इसके अलावा, जब उन्होंने सार्वजनिक या राज्य के स्वामित्व वाले और संचालित उद्यमों की स्थापना और संचालन किया तो उन्होंने उन नियोक्ता-कर्मचारी संरचनाओं की नकल की।

सोवियत उद्योग-मुख्य रूप से सार्वजनिक रूप से स्वामित्व वाले थे जो मजदूरों/कर्मचारियों के संबंध में राज्य के अधिकारियों को नियोक्ता/मालिक मानते थे। अंत में, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में समाजवाद का एक मिश्रित रूप देखने को मिलता है जिसमें अन्य दोनों रूपों का मिश्रण यानि निजी और हुकूमत वाले उद्यमों का लगभग समान विभाजन शामिल है। चीन का मिश्रित समाजवाद हुकूमत और निजी उद्यमों दोनों में नियोक्ता/कर्मचारी संगठनात्मक संरचना को साझा करता है। तीनों प्रकार के समाजवाद-सामाजिक लोकतांत्रिक, सोवियत और चीनी-अपने पूर्ववर्ती पूंजीवाद से कई महत्वपूर्ण तरीकों से अलग हैं। लेकिन वे उद्यमों के मूल नियोक्ता-कर्मचारी संगठन से अलग नहीं हुए, वह रिश्ता जिसे मार्क्स पूंजी में शोषण के स्रोत के रूप में मानते हैं, जिसका मक़सद मजदूरों/कर्मचारियों द्वारा उत्पादित अतिरिक्त मुनाफे को मालिकों द्वारा हथियाना है।

मालिक/नियोक्ता और मजदूर/कर्मचारी, एक साथ, एक खास वर्ग संरचना द्वारा परिभाषित होते हैं। वे इसकी धुरी हैं, उत्पादन में व्यक्तियों के दो संभावित पद होते हैं। वे पिछली व्यवस्थाओं के विघटन से पूंजीवाद के साथ उभरे हैं। ऐसी पूर्व प्रणालियों में (1) सामंतवाद और इसकी आर्थिक संरचना में स्वामी और दास के दो पद, और (2) दासता और इसकी आर्थिक संरचना में स्वामी और दास के दो पद शामिल थे।स्वामी, स्वामी और नियोक्ता आम तौर पर दासों, भूदासों और मजदूर/कर्मचारियों की संख्या के मुक़ाबले में कम होते हैं इसलिए वे उन दासों, भूदासों और मजदूरों/कर्मचारियों से हासिल अतिरिक्त मुनाफे पर जीवन यापन करते हैं वे कभी भी वास्तविक लोकतंत्र को पनपने नहीं दे सकते हैं क्योंकि इससे सीधे तौर पर उन्हे खतरा होगा। उनके वर्ग और विशेषाधिकार को खतरा पैदा होगा। वास्तव में मौजूदा समाजवादी समाजों में वर्ग-विभाजित आर्थिक व्यवस्थाओं के कारण वास्तविक लोकतंत्र की असंगति एक बार फिर सामने आई है।

सपा संस्थापक नेता जी मुलायम सिंह यादव की प्रथम पुण्यतिथि
क्या समाजवाद की आत्म-आलोचना और वास्तविक लोकतंत्र..?

अपनी पीढ़ी के ज्यादातर समाजवादियों की तरह मुलायम सिंह यादव भी कांग्रेस के धुर विरोधी थे। कुछ पूर्व समाजवादियों ने गैर-कांग्रेसवाद का इस्तेमाल भाजपा से अपने जुड़ाव को जायज बताने में किया है। आज जब भाजपा सत्ता-तंत्र का रूप ले चुकी है और अपने इस रूप में भारत की एकता की बुनियाद व संवैधानिक लोकतंत्र को कुचल देने पर आमादा है। समाजवाद के आज के वारिसों को चाहिए कि वे गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति का इस्तेमाल भाजपा से जुड़ाव की हिमायत में करने के चलन पर पुनर्विचार करें। उसका संशोधन और परिमार्जन करें। भारतीय समाजवाद का इतिहास गौरवशाली रहा है और उसका भविष्य गौरवशाली तभी हो सकता है जब वह (भारतीय समाजवाद) पुनर्जन्म ले। मुलायम सिंह यादव का दिवंगत होना एक गहरे सवाल पर सोच-विचार करने का एक मौका है कि हमारे आज के समय में समाजवादी परंपरा की प्रासंगिकता क्या है..? संयोग देखिए कि उनका अंतिम संस्कार 11 अक्टबूर को हुआ जिस दिन समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की 120वीं जन्मतिथि मनायी गई। इसके ठीक एक दिन पहले मुलायम सिंह के राजनीतिक गुरु राममनोहर लोहिया की 55वीं पुण्यतिथि थी। समाजवादी परंपरा के वारिसों के लिए भी यह एक मौका है कि वे वर्तमान और भविष्य की अपनी भूमिकाओं पर विचार करें। मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक जीवन में अगर कोई एक चीज लगातार कायम रही तो वह थी समाजवादी परंपरा से उनका आत्मिक जुड़ाव। चाहे उनकी पार्टी के नाम में शामिल समाजवादी शब्द हो या फिर समाजवादी आंदोलन की लाल टोपी पहनने पर उनका जोर या अंग्रेजी के दबदबे के खिलाफ होने की बात हो या फिर राममनोहर लोहिया के नाम का आह्वान। वे आजीवनसमाजवादीरहे।

कई समाजवादी हैं जो इसका जवाब मांगते हैं और पूछते हैं कि आधुनिक समाजवाद, पूंजीवाद की वास्तविक लोकतंत्र की कमी की आलोचना करने वाला एक सामाजिक आंदोलन स्वयं एक समानांतर आलोचना का पात्र क्यों नहीं होगा। आज तक समाजवादी प्रयोगों ने प्रामाणिक लोकतांत्रिक प्रणालियों को बनाने और बनाए रखने में उनकी असमर्थता पर केंद्रित आत्म-आलोचना क्यों की है…? इसका उत्तर नियोक्ता-कर्मचारी संबंध में निहित है। यह हमेशा वास्तविक लोकतंत्र के लिए मुख्य बाधा, कारण और वस्तुतः उन वर्गों की परिभाषा होती है, जिनका आस्तित्व वास्तविक लोकतंत्र को रोकता है। जिन समाजवादियों ने वास्तविक लोकतंत्र की समस्या का सामना किया उन्होंने इसे “वर्गहीनता” की परिभाषा के रूप में व्यक्त किया। वर्गों के बिना कोई शासक वर्ग नहीं होता है। यदि मजदूर/कर्मचारी सामूहिक रूप से खुद नियोक्ता बन जाते हैं तो पूंजीपति वर्ग का विरोध गायब हो जाएगा। एक समूह या समुदाय दो का स्थान ले लेता है। वर्ग-विभाजित आर्थिक व्यवस्था के अभाव में किसी समाज की अर्थव्यवस्था और राजनीति में वास्तविक लोकतंत्र लाने के प्रयास के तहत सफलता की उम्मीद की जा सकती है।

समाजवादी आत्म-आलोचना एक नियोक्ता/कर्मचारी-आधारित आर्थिक प्रणाली से श्रमिकों के खुद के निर्देशित उद्यमों (या आम भाषा में “कर्मचारी सहकारी समिति”) पर आधारित आर्थिक प्रणाली में संक्रमण करके वास्तविक लोकतंत्र की अनुपस्थिति का समाधान किया जा सकता है। 20वीं शताब्दी में निर्मित अधूरे समाजवाद को उक्त बदलाव के ज़रिए उन्नत बनाने की जरूरत है। यह समाजवादों को मजबूत और पूर्ण बनाएगा, उन्हे वास्तविक लोकतंत्र के करीब लाएगा, और पूंजीवादी व्यवस्था को दूर कर देगा, जो व्यावस्था नियोक्ता-कर्मचारी/मजदूर संबंधों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता होने की वजह से वास्तविक लोकतंत्र के पैर जमाने से रोकती है। क्या समाजवाद की आत्म-आलोचना और वास्तविक लोकतंत्र..?

(रिचर्ड डी. वोल्फ एमहर्स्ट के मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के एमेरिटस प्रोफेसर हैं और न्यूयॉर्क में न्यू स्कूल यूनिवर्सिटी के अंतर्राष्ट्रीय मामलों के स्नातक कार्यक्रम में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। विचार निजी हैं।)