नई उम्मीदों का नव वर्ष

116
नई उम्मीदों का नव वर्ष
नई उम्मीदों का नव वर्ष
हृदयनारायण दीक्षित
हृदयनारायण दीक्षित


ईसा के नववर्ष 2024 की शुरुआत हो गई है। वैसे काल निरपेक्ष सत्ता नहीं है। 2024 में बीते वर्षों के कर्मफल भी सम्मिलित हैं। सबके भूत, भविष्य और वर्तमान अलग-अलग होते हैं। सभी देशों के समय भी भिन्न-भिन्न होते हैं। फिर भी नववर्ष के उत्सवों की परम्परा है। नए वर्ष में अनेक संभावनाएं हैं। अनेक चुनौतियाँ भी हैं। पीछे लगभग 10 वर्ष के कर्मफल उत्साहजनक रहे हैं। राष्ट्र का पौरुष भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में संकल्पबद्ध है। इसी साल के इसी महीने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का सैकड़ो वर्ष पुराना स्वप्न साकार हो रहा है। यह दिव्य है, भव्य है। सारी दुनिया में श्रीराम जन्मभूमि की चर्चा है। दिक् और काल अरुण तरुण हो रहे हैं। रामचरितमानस की चैपाई साकार हो रही है ‘बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू/अवसि देखिअहिं देखन जोगू।‘ सभी रास्ते अयोध्या की ओर मुड़ गए है। इसी उमंग में 2024 की संभावनाओं और चुनौतियों पर विचार विमर्श स्वाभाविक हैं। बेशक 2024 में 2023 के कर्मफल सम्मिलित हैं और हानि लाभ भी। लेकिन भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र के निर्माण में 100-200 वर्ष भी महत्वपूर्ण नहीं होते। संस्कृति व राष्ट्रीय क्षमता के विकास में हजारों वर्ष का समय लगता है। नई उम्मीदों का नव वर्ष


2023 की तमाम उपलब्धियां हैं। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। भारत ने जी20 का नेतृत्व किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जी20 का एजेंडा भी जारी हुआ है। रूस-यूक्रेन और इजराइल-फिलिस्तीन के युद्ध में भारतीय नीति की प्रशंसा हुई है। इसी बरस भारत के मन और प्रज्ञा अंतरिक्ष पहुंच गए हैं। चंद्रयान की सफलता अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रही है। भारत आत्मनिर्भर हो गया है। राष्ट्र का आत्मविश्वास बढ़ा है। इतिहास के विरूपण का विषय पूरे वर्ष चर्चा में रहा है। इतिहास लेखन का पक्षपात स्पष्ट हो गया है। इस विषय का राष्ट्रीय विमर्श 2024 में निर्णायक मोड़ ले सकता है। श्रीराम और श्रीकृष्ण को काव्यकल्पना बताने वाले कथित लिबरल सेकुलर इतिहासकार लज्जित हैं। भारत के प्राचीन निवासी मूल अभिजन आर्य हैं। इन्हे विदेशी हमलावर बताया जा रहा है। 2024 में इस झूठ के पर्दाफाश की संभावना है। नई शिक्षा नीति में प्राचीन ज्ञान परम्परा को विशेष महत्व मिला है। 2023 में भारत को नया भव्य संसद भवन प्राप्त हुआ है। यह उमंग का विषय है। लेकिन संसदीय कार्यवाही में गतिरोध राष्ट्रीय चिन्ता और चुनौती के विषय हैं। संसदीय बहसों में कटुता बढ़ी है। राजनीतिक विमर्श में अभद्र शब्द प्रयोग बढ़ा है। राष्ट्र आहत हुआ है। विधायी संस्थाओं में हुल्लड़ व अशालीन अभद्र भाषा चुनौती बनकर उभरी है। उम्मीद है कि 2024 में विधायी सदनों की भाषा प्रेम पूर्ण होगी। बहस की गुणवत्ता भी बढ़ेगी। नई उम्मीदों का नव वर्ष


भारत विश्व का प्राचीनतम जनतंत्र है। यहां वैदिक काल में भी सभा और समिति जैसी संस्थाएं रही हैं। इनकी कार्यवाही शालीन होती थी। भारतीय संसद के भी प्रारम्भिक काल में लगभग 1980-85 के वर्ष तक ऐसी अराजक स्थिति नहीं थी। संसदीय जनतंत्र संवैधानिक संस्थाओं से चलता है। संवैधानिक संस्थाओं का आदर प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है। लेकिन संसद और चुनाव आयुक्त सहित तमाम संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान घट रहा है। विश्वास है कि 2024 में इस चुनौती पर सकारात्मक विचार होगा। 2023 में उत्तर दक्षिण की विभाजक चर्चा भी हुई है। उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम भारत के ही अविभाज्य अंग हैं। राजनैतिक कारणों से देश के मानस को अलगाववादी बनाना घोर आपत्तिजनक है। जनसंख्या वृद्धि के कारण अनेक समस्याएं जन्म लेती हैं। संसाधन घटते जाते हैं। 2023 में जनसंख्या वृद्धि की राष्ट्रीय चुनौती पर विशेष चर्चा नहीं हुई। पर्यावरण प्रदूषण देश की बड़ी समस्या है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी सांस लेना कठिन है। इसने तमाम बीमारियों को जन्म दिया है। संयुक्त राष्ट्र की बैठक (2015) में टिकाऊ विकास के 17 विषय महत्वपूर्ण बताए गए। पर्यावरण मुख्य विषय था। भारत ने भी इन लक्ष्यों को स्वीकार किया था। सरकार ने अपने स्तर पर बहुत कुछ किया है। तो भी पर्यावरण को लेकर राष्ट्रीय जागरण की आवश्यकता है।

नई उम्मीदों का नव वर्ष


‘सनातन’ धर्म भी सेकुलर हमले का निशाना रहा है। सनातन का सीधा अर्थ है, जो सदा से है, जो सदा रहता है और जो भविष्य में भी रहेगा, वह सनातन है। सनातन अस्तित्व का नियम है और ब्रह्माण्डीय अनुशासन है। लेकिन तमिलनाडु के एक मंत्री ने सनातन को डेंगू, मलेरिया आदि बताया था। यह राजनीति घटिया है। विश्वास है कि 2024 में सांस्कृतिक अपमानकारी टिप्पणियों पर रोक लगेगी। संविधान में संस्कृति का संवर्धन राष्ट्रीय कर्तव्य है। अपनी संस्कृति को ही अपमानित करने वाले लोग 2024 में जन उपेक्षा का विषय बन सकते हैं। भारतीय संस्कृति को मैक्समुलर आदि यूरोपीय विद्वानों ने भी श्रेष्ठ बताया है। उम्मीद है कि 2024 में मथुरा काशी सहित सभी सांस्कृतिक प्रतीकों की प्रतिष्ठा बढ़ेगी। सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता संविधान निर्माताओं का स्वप्न रही है। संविधान निर्माताओं ने इस अपेक्षा को राज्य के नीति निदेशक तत्वों (अनुच्छेद 44) में संहिताबद्ध किया था। नागरिक संहिता 2023 में भी विमर्श का विषय रही है। इस विषय पर पहले से ही बहुत देर हो गई है। विश्वास है कि 2024 में इसे सामान्य लोक स्वीकृति मिलेगी और तद्नुसार विधायन होगा।


2024 की चुनौतियां बड़ी हैं। संसदीय जनतंत्र में चुनाव महत्वपूर्ण उत्सव होते हैं। जनता अपनी पसंद के दल-नेता को जनादेश देती है। बहुमत के जनादेश से सरकार बनती है और अल्पमत से प्रतिपक्ष। इसी साल आम चुनाव हैं। चुनावी विमर्श में शब्द अराजकता बढ़ती है। व्यक्तिगत आरोप व आक्षेप बढ़ते हैं। कटुता बढ़ती है। विमर्श के महत्वपूर्ण मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाते हैं। दलीय घोषणा पत्रों पर बहस नहीं होती। चुनावी आचार संहिता तारतार होती है। चुनाव आयोग से लेकर चुनाव कराने वाला प्रशासनिक तंत्र भी विषम चुनौतियों का सामना करता है। कभी-कभी चुनाव आयोग पर भी राजनीतिक दलों द्वारा आरोप लगाए जाते हैं। आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में ऐसे आरोप अंतर्राष्ट्रीय अपयश बनते हैं। विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) का भी बहुधा दुरुपयोग होता है। हिंसा भी होती है। कायदे से दलीय नीतियों पर बहस होनी चाहिए। प्रत्येक दल को अपनी नीति व कार्यक्रम के आधार पर लोकमत बनाना चाहिए। लेकिन प्रायः ऐसा नहीं होता। 2024 में आदर्श चुनाव राष्ट्रीय अभिलाषा हैं।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के लिए पांच प्रण की घोषणा की थी। 2023 में इसका 1 साल हो गया है। इस घोषणा में 2022 से 2047 तक के समय को अमृत काल कहा गया है। घोषणा के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। ‘विकसित भारत’, ‘गुलामी की सोच से मुक्ति’, ‘विरासत पर गर्व’, ‘एकता व एकजुटता’ व नागरिकों द्वारा कर्तव्य पालन पांच प्रण हैं। इनमें 2047 तक भारत को विकसित बनाने का ध्येय महत्वपूर्ण है। प्रण सांस्कृतिक हैं। उनके लक्ष्य आर्थिक हैं। राष्ट्रीय एकता महत्वपूर्ण लक्ष्य है। विश्वास है की पांचों प्रण/संकल्प भारत के राष्ट्रजीवन में गुणात्मक परिवर्तन लाएंगे। 2024 में ऐसे सभी राष्ट्रीय प्रश्नों व चुनौतियों पर गहन विमर्श की संभावनाएं हैं। उम्मीद है कि राष्ट्रजीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में सक्रिय महानुभाव गहन विमर्श के लिए आगे आएंगे। साझा विचार और समवेत संकल्प 2024 को मंगल भवन अमंगलकारी बनाएँगे। नई उम्मीदों का नव वर्ष