औरों के साथ-साथ अनिवार्य है स्वयं का भी विकास

सीताराम गुप्ता

विमान की हर उड़ान से पहले यात्रियों को सुरक्षा संबंधी कुछ निर्देश दिए जाते हैं जिससे आपात स्थिति में यात्री न केवल स्वयं सुरक्षित रह सकें अपितु आवश्यकता पड़ने पर दूसरों की सहायता भी कर सकें। ऐसा ही एक निर्देश है, “वायुयान में हवा का दबाव कम होने पर ऑक्सीजन मास्क नीचे आ जाएँगे लेकिन दूसरों को ऑक्सीजन मास्क पहनने में मदद करने से पहले स्वयं अपना मास्क पहन लें।” आपात स्थित में हम प्रायः अपने आश्रितों की मदद सबसे पहले करते हैं। ये अच्छी बात है लेकिन यदि हम स्वयं किसी संकट में पड़ जाते हैं तो हम न अपनी मदद ही कर पाएँगे और न अपने प्रियजनों अथवा अन्य किसी की ही। हमें हर हाल में अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि हम सुरक्षित होने पर ही दूसरों की मदद करने में सक्षम होते हैं। कई माँएँ अपने बच्चों की देखरेख में इतनी अधिक व्यस्त रहती हैं कि उनका स्वयं का स्वास्थ्य प्रभावित होने लगता है। ऐसे में क्या वे लंबे समय तक अपने बच्चे की सही देखभाल करने में सक्षम रह पाएँगी? शायद नहीं। स्वास्थ्य का प्रश्न हो या जीवन के अन्य किसी क्षेत्र में विकास का प्रश्न हो जीवन के हर क्षेत्र में ये सिद्धांत लागू होता है जिसकी हम प्रायः उपेक्षा कर जाते हैं।

जितना ध्यान दूसरों पर देना अनिवार्य है उससे अधिक ध्यान स्वयं पर देना अनिवार्य है। यह स्वार्थ नहीं अपितु व्यावहारिक दृष्टि से अनिवार्य है। कुछ लोग बहुत अच्छे होते हैं। सबके लिए चिंतित रहते हैं। सबको साथ लेकर चलते हैं। सबको आगे बढ़ने-बढ़ाने में में मदद करते हैं। अपने भाई-बहनों और बच्चों की ही नहीं मित्रों और रिश्तेदारों की भी मदद करते हैं। इससे अच्छी बात हो ही नहीं सकती लेकिन यदि हम केवल दूसरों की उन्नति के प्रयासें में ही लगे रहते हैं, अपना सारा समय और संसाधन उसी में लगा देते हैं तो प्रायः हमारा स्वयं का विकास अवरुद्ध हो जाता है। हमारी इच्छाएँ अपूर्ण रह जाती हैं। सब लोग आगे बढ़े अच्छी बात है। हमारे आत्मीय जन या परिवार के सदस्य आगे बढ़े ये और भी संतुष्टि की बात है लेकिन इस प्रक्रिया में यदि हम स्वयं पिछड़ने लगें अथवा अपने विकास के प्रति उदासीन या लापरवाह हो जाएँ तो ये भी अच्छी बात नहीं। बेशक ये कर्तव्य की भावना से किया जाना अनिवार्य है लेकिन हर चीज़ की एक सीमा होती है। नेपोलियन हिल ने कहा है, ‘‘कर्तव्य से ये तात्पर्य नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं को नष्ट कर ले और अपने जीवन को अपने हिसाब से व्यतीत न करे।”


परिवार के सदस्यों की सही परवरिश व उचित देखभाल अनिवार्य है। माता-ंपिता, बड़े भाई-बहनों व दूसरे रिश्तेदारों का कर्तव्य है कि इस उत्तरदायित्व को स्वीकार कर पूर्ण करें। इसीलिए माता-पिता अपनी संतान की शिक्षा-दीक्षा, प्रशिक्षण व अन्य क्षेत्रों में उनकी उन्नति के लिए कोई कसर नहीं रख छोड़ते। कई बड़े भाई-ंबहन भी अपने छोटे भाई-बहनों के लिए अपने बच्चों से बढ़कर उनकी आवश्यकताओं का घ्यान रखते हैं। कई लोग अपने बच्चों और भाई-बहनों की ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशियों का गला घोंटते रहते हैं। इसमें संदेह नहीं कि ऐसा करने से उन्हें बेहद ख़ुशी मिलती है लेकिन प्रायः ऐसा होता है कि जो लोग जीवन भर दूसरों को आगे बढ़ाने व उन्हें भरपूर ख़ुशियाँ देने में लगे रहते हैं उस दिन उनको बहुत दुख होता है जब बाद में उनकी ही उपेक्षा प्रारंभ हो जाती है। उनके लिए कुछ करना या उनके प्रति कृतज्ञ होना तो दूर कई बातों के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाने लगता है।

अपनी संतान भी इसका अपवाद नहीं। अधिकांश बच्चे अपने माता-पिता के त्याग को महत्त्व न देकर उनके द्वारा की गई परवरिश व शिक्षा-दीक्षा में कमियाँ ही निकालते देखे जाते हैं। ये स्वाभाविक है क्योंकि जो जि़म्मेदारी की भावना से कुछ करता है उसी में कमियाँ निकाली जा सकती हैं। जो ग़ैर-जि़म्मेदार है और जिसने कुछ किया ही नहीं उसके कामों में दोष कहाँ से होगा? ऐसे में यदि जि़म्मेदारी की भावना से कार्य करने वाला कोई व्यक्ति अपना विकास नहीं कर पाता अथवा अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ नहीं कर पाता तो भविष्य में उसे बड़ी परेशानी झेलनी पड़ सकती है। जिनके लिए सब कुछ किया उन्हीं के सामने हाथ फैलाने की नौबत आ सकती है। यदि उनका रवैया ठीक नहीं हुआ तो जीवन मुश्किल में पड़ सकता है। इस स्थिति पर विचार करना और उसके संभावित दुष्परिणामों से बचने के लिए उचित योजना बनाकर चलना अनिवार्य है।

कई बच्चों के माता-पिता असमय कालकवलित हो जाते हैं। ऐसे में बड़ी बहनें प्रायः परिवार को सँभालने के लिए अपने करियर को दाँव पर लगा देती हैं। परिवार के भरण-पोषण की जि़म्मेदारी उठाने के लिए कोई भी नौकरी कर लेती हैं। कई भाई भी ऐसा करते हैं। इससे छोटे भाई-बहन सँभल जाते हैं। सँभल ही नहीं जाते सब अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं। सब की शादियाँ हो जाती हैं। सब अपनी-अपनी गृहस्थियाँ बसा लेते हैं और अच्छे भविष्य की तलाश में एक-एक करके छोड़कर चले जाते हैं। बड़ी बहन अकेली रह गई। उसके जीवन का स्वर्णकाल ही नहीं जीवन के सभी महत्त्वपूर्ण पड़ाव निकल गए। उसके प्रति किसी ने भी अपने उत्तरदायित्व को नहीं समझा। अपनी जि़म्मेदारी को पूरा करने की कोशिश नहीं की। क्यों…? क्या उसके प्रति किसी का कोई कर्तव्य या जि़म्मेदारी नहीं…? क्या थोड़ा सँभलने के बाद उसका स्थान किसी अन्य को नहीं ले लेना चाहिए था….?


अब प्रश्न उठता है कि क्या हमें दूसरों की परवाह नहीं करनी चाहिए…? विशेष रूप से अपने बच्चों और भाई-बहनों की। क्या हमें सिर्फ़ अपने विकास पर ध्यान देना चाहिए…? क्या केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति की ओर ध्यान देना चाहिए…? नहीं ऐसा कदापि उचित नहीं माना जा सकता। हम अपने कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं कर सकते। हम अपने उत्तरदायित्वों से मुँह नहीं मोड़ सकते। अपने बच्चों व छोटे भाई-बहनों अथवा अन्य रिश्तेदारों की सही परवरिश, उचित देखभाल व उनके सर्वांगीण विकास के लिए भरपूर प्रयास करना हर प्रकार से हमारा कर्तव्य और दायित्व है। समाज में अनेक ऐसे लोग भी हैं जो निराश्रितों के लिए भी बहुत कुछ करते हैं। ऐसे में अपने निकटस्थ जनों की परवाह करना बहुत बड़ी बात भी नहीं। इसीलिए अधिकांश व्यक्ति अपनी क्षमता से बढ़कर अपने दायित्वों को पूरा करने का प्रयास करते हैं और इसके लिए कई बार स्वयं बड़ी परेशानियाँ भी झेलते हैं। सब कुछ कीजिए लेकिन स्वयं की उपेक्षा किसी भी तरह से उचित नहीं। इसका एक और पहलू भी है। यदि हम स्वयं पूर्ण रूप से स्वस्थ व व्यवस्थित नहीं होंगे अथवा हमारा व्यक्तित्व प्रभावशाली नहीं होगा तो हम दूसरों की भी बहुत अच्छी परवरिश व देखभाल नहीं कर पाएँगे।

अपनी स्वयं की आवश्यकताओं अथवा उन्नति के प्रति उदासीनता किसी भी तरह से उचित नहीं। यदि दूसरों को आगे बढ़ने का अधिकार है तो हमें स्वयं भी ऐसा करने का अधिकार है। जो भी करना है, जिस क्षमता में भी करना है उसमें स्वयं के लिए व्यवस्था न करना अथवा स्वयं को उपेक्षित करना ठीक नहीं। अपनी आवश्यकताओं के प्रति सचेत रहें। अपने अच्छे स्वास्थ्य व अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए प्रयासरत रहे। अपने लिए भी उचित योजना बनाएँ। थोड़ा स्वार्थी भी बनें। दूसरों को पूरी सुविधाएँ देते हुए स्वयं की उपेक्षा का कोई औचित्य नहीं। ख़ुद पेटभर खा लेना लेकिन दूसरों की परवाह न करना ग़लत है लेकिन दूसरों को ज़रूरत से ज़्यादा दे रहे हैं और अपनी स्वयं की ज़रूरतों का गला घोंट रहे हैं तो ये स्थिति भी आदर्श नहीं मानी जा सकती। जिनके लिए चिंतित हैं, जिनकी मदद कर रहे हैं उनकी मदद करने के साथ-ंसाथ उन्हें उनकी जि़म्मेदारी का अहसास भी करवाएँ।

जि़म्मेदार लोगों को अपने स्वयं के वर्तमान और भविष्य की चिंता भी अवश्य करनी चाहिए। जीवन के किसी भी क्षेत्र में स्वयं की उपेक्षा ठीक नहीं। कई लोगों को बहुत कम आयु में ही दूसरों की जि़म्मेदारियाँ वहन करनी पड़ती हैं। ऐसे में दूसरों की ही नहीं, अपनी स्वयं की पढ़ाई-लिखाई व जीवनवृत्ति के बारे में सोचना और उचित दिशा में कदम उठाना भी अनिवार्य है। अपनी आर्थिक स्थिति को ठीक रखना तो और भी ज़रूरी है। ये भी संभावना है कि आप जिन्हें दुनिया के सर्वोच्च शिखर पर देखने के लिए त्याग-तपस्या कर रहे हैं वे कुछ सामान्य भी न कर पाएँ। ऐसी स्थिति में यदि आपकी अपनी स्थिति अच्छी व सुदृढ है तो स्थितियों को सँभालना संभव होगा अन्यथा न तो दूसरों को ही सँभालना ही संभव होगा और न स्वयं को सँभालना ही।

कई बार ऐसा भी होता है कि हम जिनके विकास के लिए अपनी खुशियाँ व अपना पूरा जीवन दाँव पर लगा देते हैं वे एक दिन हमें हमेशा के लिए छोड़कर दूर चले जाते हैं। कई बार छोड़कर जाने वाले का स्वार्थ होता है तो कई बार विवशता भी होती है। ऐसे में बहुत अधिक मायूसी होना स्वाभाविक है लेकिन इसके लिए हम अपना जीवन क्यों तबाह करें….? जो हुआ उसे स्वीकार कर लीजिए और अपने स्वयं के विकास के लिए उपलब्ध बेहतर विकल्पों पर ध्यान दीजिए। ‘‘तुम्हें आगे बढ़ाने के चक्कर में मैंने स्वयं को तबाह कर लिया, ’’ ये बात न तो कोई सुनना चाहेगा और न ही ये कहने का कोई औचित्य ही होगा इसलिए प्रारंभ से ही एक संतुलित दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ने में ही समझदारी है।

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