पदक में हुए पक्षपात से नाराज दो बड़े बाबुओं ने मांगा वीआरएस

पदक में हुए पक्षपात से नाराज दो बड़े बाबुओं ने मांगा वीआरएस। नामों के चयन पर उठाए सवाल, घूम फिरकर चहेतों को दिए जा रहे पदक। विवादों से घिरे कई बाबुओं व अफसरों के नाम सूची में,उत्कृष्ट व सराहनीय कार्य बताने को कोई नहीं तैयार।

राकेश कुमार

लखनऊ। कारागार मुख्यालय के आला अफसरों के पक्षपातपूर्ण निर्णय से आजिज दो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने वीआरएस (स्वच्छिक सेवानिवृत्त) के लिए आवेदन कर डाला। अपर मुख्य सचिव गृह ने आवेदन करने वाले दोनों अधिकारियों के वीआरएस को स्वीकृत प्रदान कर दी है। यह मामला विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। इसको लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

मिली जानकारी के मुताबिक बीती स्वतंत्रता दिवस के दो दिन पहले 13 अगस्त को महानिरीक्षक कारागार की ओर से अधिकारियों व कर्मचारियों को उत्कृष्ट व सराहनीय सेवा के लिए गोल्ड, सिल्वर के साथ प्रशंसा पत्र दिए जाने की सूची जारी की। आईजी जेल ने 54 अधिकारियों एवं कर्मचारियों को गोल्ड पदक, 46 को सिल्वर एवम बाबू संवर्ग के 23 कर्मियों को प्रशंसा प्रमाण पत्र दिया गया। मुँह देखकर चयनित किये गए नामों को लेकर मुख्यालय कर्मियों में खासा आक्रोश है। इससे आक्रोशित वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी आरएन त्रिपाठी व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी गणेश पांडेय ने वीआरएस के लिए आईजी जेल को आवेदन दे दिया। सूत्रों की मानें तो आईजी जेल की वीआरएस पर संस्तुति के बाद एसीएस होम ने इसे स्वीकार कर लिया। आईजी की पदक सूची में कई ऐसे अधिकारियों व कर्मियों को शामिल किया गया जो विवादों से घिरे हुए है।

सूत्रों का कहना है बाबू संवर्ग की सूची में कई नाम ऐसे है जिन्हें पहले भी यह सम्मान दिया जा चुका है। सूची में एक ऐसा नाम है जो बाबू पिछले करीब 30 साल से लगातार लखनऊ परिक्षेत्र के कार्यालय से जुड़ा हुआ है। इसका न तो कभी तबादला किया जाता है और न ही इसका पटल परिवर्तन किया गया। लखनऊ जेल में 35 लाख नगद बरामदगी की जांच में यह बाबू सुर्खियों में रहा था। यह तो एक बानगी है। इसी प्रकार लंबे समय से घूम फिरकर एक ही कमाऊ पटल पर बने रहने वाले कई बाबुओं को प्रशंसा प्रमाण पत्र दिया गया है। इसमें कई को तो यह सम्मान दोबारा दिया गया है।

सूत्रों के मुताबिक जेल मुखिया की इस कार्यवाही से बाबू संवर्ग में खासा आक्रोश व्याप्त है। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी आरएन त्रिपाठी का आरोप है कि मैं कार्यालय में सबसे वरिष्ठ हूँ। मुझे यह सम्मान क्यों नहीं दिया गया कोई बता पायेगा। चार महीने शेष बचे है। 40 साल बेदाग सेवा रही है मेरी। मैं स्पष्टवादी हूँ। यही मेरा दोष है। एक प्रशासनिक अधिकारी ने तो यहां तक कह दिया कि बहुत नाइंसाफी है, आप तो जवाहर लाल नेहरू बन गए, चीन से युद्ध हारने के बाद, स्वयं को भारत रत्न से सम्मानित कर सकते है। उधर इस संबंध में जब आईजी जेल आनंद कुमार से बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कमेटी ने चयन किया है। सम्मानित कर्मी का एक उत्कृष्ट कार्य बताने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह तो कमेटी ही बता सकती है। कमेटी के एक सदस्य ने तो पूरे मामले पर ही चुप्पी साध ली।