गुणों की खान है अगस्ति, जानें फायदे…

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अगस्ति एक औषधीय वृक्ष है। औषधीय प्रयोजन हेतु इसके पत्ते, जड़, फल, बीज, छाल सभी कुछ प्रयोग किया जाता है। इसकी छाल में टैनिन और लाल रंग का राल निकलता है। इसके पत्तियों में प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन, विटामिन A, B और C होता है। पुष्पों में भी विटामिन B और C पाया जाता है। बीजों में 70% प्रोटीन और एक तेल पाया जाता है।आयुर्वेद में अगस्त्य पेड़ के फल, छाल, जड़, फूल और पत्तों का इस्तेमाल कई औषधीय गुणों के लिए किया जाता है। इसके सेवन से त्वचा रोग, सिरदर्द और खांसी-जुखाम में फायदा मिलता है। आयुर्वेद में कई रोगों के इलाज में इसका इस्तेमाल किया जाता है।

अगस्ति एक ऐसा जड़ी बूटी है जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है। वैसे तो ये मूल रुप से सर्दी के दिनों में ही उगते हैं। इसके फूलों से कई तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं, जैसे सब्जी, पकौड़े, अचार, गुलकंद आदि। लेकिन सबसे अचरज की बात ये है कि अगस्ति के बीज, फूल, पत्तों, रस, जड़ हर अंश का प्रयोग किया जाता है। शायद आपको पता नहीं कि आयुर्वेद में इसके गुणों और पौष्टिकता के आधार पर ही कई बीमारियों के लिए औषधि के रुप में इस्तेमाल किया जाता है। इस जड़ी बूटी का नाम अगस्ति क्यों पड़ा अगर आप ये जानना चाहते हैं तो ये जानकारी आपके लिए जरूरी है कि मुनिराज अगस्ति के नाम से इसकी प्रसिद्धि इसलिए हुई कि जब अगस्त तारे का उदय होता है तब इसके वृक्षों पर फूल लगते हैं। राजनिघंटुकार ने सफेद, पीला, नीला और लाल फूलों के आधार पर इसकी चार प्रजातियां बताई हैं परन्तु अधिकांश रुप में सफेद रंग का फूल ही प्राप्त होता है। इसके कोमल पत्ते, फूल और फलियों का साग बनाकर खाया जाता है।

अगस्ति-के फूल-मधुर कड़वा, गुण में रूखे; कफ पित्त दूर करने वाले, ज्वर या बुखार में लाभकारी, प्रतिश्याय (Coryza), रतौंधी, पीनस-रोग में फायदेमंद होते है। अगस्ति के पत्ते-कड़वे, तीखे, थोड़े गर्म प्रकृति के, कृमि, कंडू या खुजली, रक्तपित्त (नाक-कान से खून बहना), विष तथा प्रतिश्याय को दूर करने वाले होते हैं। अगस्ति की फली कड़वी, छोटी, रुचि,बुद्धि और यादाश्त बढ़ाने वाली होने के साथ-साथ पांडु या एनीमिया में लाभकारी होती है। इसके अलावा कीड़ा काटने पर विष का प्रभाव कम करने वाली और सूजन कम करने में सहायक होती है। इसका पका फल रूखा और पित्तकारक होता है। इसकी छाल कड़वी, पौष्टिक, पाचक और शक्ति-वर्धक होती है। इसका पत्ता चिन्ता कम करने वाला (Anxiolytic) होता है।

अगस्ति के फायदे– अगस्ति में विटामिन, आयरन, कैल्शियम, विटामिन ए, बी और सी आदि भरपूर मात्रा में पाया जाता है। साथ ही इसका रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कई बीमारियों के लिए फायदेमंद साबित होता है। चलिये जानते हैं ये कौन-कौन से बीमारियों के लिए फायदेमंद है।

प्रतिश्याय (सर्दी-खांसी) में फायदेमंद अगस्ति – मौसम बदला कि नहीं बच्चे से लेकर बड़े-बूढ़े सबको सर्दी-खांसी की शिकायत हो जाती है। अगस्ति के जड़ तथा पत्ते के काढ़े में शहद मिलाकर पिलाने से भी प्रतिश्याय यानि सर्दी-खांसी जैसे समस्या से राहत मिलती है।

सिरदर्द या माइग्रेन से दिलाये राहत अगस्ति- अगर आपको काम के तनाव और भागदौड़ भरी जिंदगी के वजह से सिरदर्द की शिकायत रहती है तो अगस्ति का घरेलू उपाय बहुत लाभकारी साबित हो सकता है। जिस तरफ के सिर में दर्द हो, उसके दूसरी ओर के नथुने में अगस्ति के पत्तों या फूलों के रस की 2-3 बूंदे टपकाने से , सिरदर्द तथा आधासीसी में लाभ होता है। इसके प्रयोग से प्रतिश्याय जन्य या सर्दी-खांसी के कारण सिरदर्द तथा नाक में जो दर्द होता है उससे राहत मिलती है।

आँख संबंधी समस्याओं में फायदेमंद अगस्ति– आँख संबंधी बीमारियों में बहुत कुछ आता है, जैसे- सामान्य आँख में दर्द, रतौंधी, आँख लाल होना आदि। इन सब तरह के समस्याओं में अगस्ति से बना घरेलू नुस्ख़ा बहुत काम आता है।

-अगस्ति के 250 ग्राम पत्तों को पीसकर या काढ़ा बनाकर 1 किलो घी में मिलाकर अच्छी तरह पकाकर छानकर रख लें। इस घी को 2-5 ग्राम मात्रा में सेवन करने से रतौंधी (नक्तान्धता) आदि आँख के रोगों से राहत मिलती है।

-अगस्ति के फूलों का साग बनाकर मक्खन के साथ सेवन करने से भी रतौंधी की परेशानी कम होती है।

-अगस्ति फूल का रस या फूल का मधु (पुष्पों को तोड़ने में मधु जैसा स्राव निकलना) को 2-2 बूंद नेत्रों में डालने से आँखों का दर्द कम होता है।

-अगस्ति के फूलों की सब्जी या साग बनाकर कुछ समय तक सुबह-शाम मक्खन के साथ सेवन करने से या अगस्ति के फूलों के रस की 2-2 बूंद नेत्रों में डालने से नक्तान्ध्य (रतौंधी) में लाभ होता है।

स्वरभंग में लाभकारी अगस्ति– अक्सर खाँसी के वजह से या ठंड लगने पर या बहुत चिल्लाने पर गले की आवाज में भारीपन या फट जाने पर अगस्ति का इस तरह से इस्तेमाल करने पर लाभ मिलता है। अगस्ति की पत्तियों के काढ़ा से गरारा करने से सूखी खांसी, जीभ का फटना, गले में खराश तथा कफ के साथ खून निकलना आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।

पेटदर्द से आराम दिलाये अगस्ति- अक्सर मसालेदार खाना खाने या असमय खाना खाने से पेट में गैस हो जाने पर पेट दर्द की समस्या होने लगती है। अगस्ति की छाल (5-10 ग्राम) का काढ़ा बनाकर 20-30 मिली काढ़े में थोड़ा सेंधानमक और भुनी हुई 2 नग लौंग अथवा हींग मिलाकर सुबह-शाम पीने से दस्त, प्रवाहिका तथा पेट दर्द से राहत मिलती है।

सफेद पानी निकलने के समस्या से दिलाये राहत अगस्ति- महिलाओं में सफेद पानी निकलने की बीमारी आम होती है। इससे राहत पाने में अगस्त का सेवन बहुत काम आता है। 10 मिली अगस्ति-के पत्ते के रस में थोड़ा शहद मिलाकर सेवन करने से तथा अगस्ति-के छाले-के रस के पिचु को योनि में धारण करने से सफेद पानी निकलने एवं योनिकण्डु (योनि की खुजली) से राहत मिलती है।

गठिया के दर्द से दिलाये आराम- अक्सर उम्र बढ़ने के साथ जोड़ों में दर्द होने की परेशानी शुरू हो जाती है लेकिन अगस्ति का सेवन करने से इससे आराम मिलता है। धतूरे की जड़ और अगस्ति की जड़ दोनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और पुल्टिस जैसा बनाकर वेदनायुक्त भाग पर बांधने से दर्द तथा सूजन से राहत मिलती है।

अगस्ति शीतल, रूक्ष, वातकारक, कड़वा होता है। यह स्वाद में फीका होता है। यह पित्त, कफ और विषम ज्वर नाशक है। इसके सेवन से प्रतिश्याय / खांसी-जुकाम दूर होता है। यह खून को साफ़ करता है और मिर्गी का नाशक है। यह कफ को दूर करने वाली औषध है। इसकी छाल कसैली, चरपरी, तथा बल कारक है। इसके पत्तों और फूलों के नस्य लेने से माथे का कफ के कारण भारीपन, सिर में दर्द, और जुखाम नष्ट होता है। कफ की अधिकता होने पर इसे शहद अथवा मूली के रस के साथ लिया जाता है। अगस्ति के पेड़ बहुत अधिक बड़े नहीं होते। इसकी डालियाँ घनी होती है। इसका तना सीधा होता है। पत्तियां इमली की पत्तें जैसी होती है। जब यह वृक्ष छोटे होते हैं तभी से इन पर फूल आने लगते हैं। पेड़ पर अगस्ति के महीने से पुष्प आते हैं। पुष्प चन्द्र की तरह मुड़े हुए होते हैं। आयुर्वेद में लाल, सफ़ेद, पीले और नीले रंग के पुष्प वाले अगस्ति के पेड़ वर्णित हैं। ज्यादातर तो इसके सफ़ेद और लाल प्रकार ही देखे जाते हैं। पुष्प निकलने के कुछ समय बाद फल आते हैं। फल शिम्बी / फली रूप में होते हैं और उनमें दस-पंद्रह की संख्या में बीज होते हैं।

खाज में फायदेमंद अगस्ति- आजकल के प्रदूषण भरे वातावरण में त्वचा संबंधी रोग होने का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। हर कोई किसी न किसी त्वचा संबंधी परेशानी से ग्रस्त होते हैं, जैसे- खुजली, दाद आदि। अगस्ति-पुष्प के 100 ग्राम चूर्ण को एक लीटर दूध में डालकर दही जमा दें, दूसरे दिन इस दही में मक्खन निकाल कर प्रभावित स्थान की मालिश करने से लाभ होता है।

फोड़ा का दर्द करे कम अगस्ति- फोड़ा अगर सूख नहीं रहा है तो अगस्ति के पत्तों का इस तरह से प्रयोग करने पर जल्दी सूख जाता है। अगस्ति के पत्तों को गर्म कर (यदि पुटपाक-विधि से गर्म करें तो अच्छा है), फोड़े पर बांधने से फोड़ा फूट कर बह जाता है।

मिर्गी में फायदेमंद अगस्ति- मिर्गी के लक्षणों से राहत पाने में अगस्ति बहुत लाभकारी होता है। अगस्ति के पत्ते का चूर्ण और कालीमिर्च-चूर्ण के समान मात्रा में लेकर गोमूत्र के साथ पीसकर मिर्गी के रोगी को सुंघाने से लाभ होता है। यदि बालक छोटा हो तो अगस्ति के दो पत्तों का रस और उसमें आधी मात्रा में काली मिर्च मिलाकर उसमें रूई का फाहा तरकर उसे सूंघने से मिर्गी शांत हो जाती है।

यादाश्त बढ़ाने में सहायक अगस्ति- अक्सर उम्र बढ़ने पर यादाश्त कमजोर होने की समस्या होती है। यादाश्त बढ़ाने में अगस्ति बहुत फायदेमंद साबित होता है। 1-2 ग्राम अगस्ति-बीज-चूर्ण को गाय के 250 मिली धारोष्ण दूध के साथ सुबह शाम कुछ दिन तक खाने से स्मरण-शक्ति तीव्र हो जाती है।

बुखार के लक्षणों से दिलाये राहत- अगर मौसम के बदलने के वजह से या किसी संक्रमण के कारण बुखार हुआ है तो उसके लक्षणों से राहत दिलाने में अगस्ति बहुत मदद करता है। दो या तीन चम्मच अगस्ति-पत्ते-के रस में आधा चम्मच शहद मिलाकर सुबह शाम सेवन करने से शीघ्र ही बुखार का आना रुक जाता है। इसका प्रयोग बराबर 15 दिन तक करना चाहिए।

ब्लीडिंग को रोकने में सहायक अगस्ति- महिलाओं के ब्लीडिंग की समस्या से अगर परेशान है तो अगस्ति के फूलों का शाक खाने से रक्तस्राव या ब्लीडिंग बंद हो जाती है।

अगस्त अगस्ति का उपयोगी भाग- आयुर्वेद में अगस्ति के जड़, छाल, पत्ता, फूल एवं फल का प्रयोग औषधि के लिए किया जाता है।

अगस्ति का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए…? बीमारी के लिए अगस्ति के सेवन और इस्तेमाल का तरीका पहले ही बताया गया है। अगर आप किसी ख़ास बीमारी के इलाज के लिएअगस्ति का उपयोग कर रहे हैं तो आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह ज़रूर लें।

चिकित्सक के परामर्श के अनुसार अगस्ति के पत्ते का-

10-20 मिली रस , 2-4 ग्राम चूर्ण, 20-40 मिली काढ़ा, 1-3 ग्राम बीज का चूर्ण ले सकते हैं।

अगस्ति का सेवन करने के दुष्परिणाम- अगस्ति के छाल का अधिक मात्रा में सेवन करने से वमन या उल्टी तथा दस्त होने लगता है।

अगस्ति के रोपे हुए वृक्ष सर्वत्र मिलते हैं। जहां जल की प्रचुरता तथा वायुमण्डल गर्म होता है, वहां यह खूब फलता फूलता है। भारत में यह पंजाब, बंगाल, आसाम, गुजरात, तमिलनाडू तथा अण्डमान द्वीप समूह में प्राप्त होता है। कुछ पाश्चत्य विशेषज्ञों का कथन है, यह भारत वर्ष का नहीं है अपितु बाहर के देशों से लाया गया वृक्ष है। किन्तु यह बात सत्य नहीं लगती। ऐसा इसलिए है की वैदिक ऋषि अगस्ति इसी पेड़ के नीचे बैठ के तपस्या करते थे और इसी कारण इसे अगस्ति नाम मिला। सुश्रुत ने भी इसका वर्णन किया है। इसलिये ऐसा मानना की यह वृक्ष कहीं बाहर से लाया गया है, गलत है।अगस्ति पूरे भारत में उगाया जाता है। यह मुख्य रूप से नम और गर्म जगहों में पाया जाना वाला पेड़ है और बंगाल में काफी संख्या में पाया जाता है। प्राकृतिक रूप से यह तराई -भावर वाले वनों में मिल जाएगा। यह बहुत अधिक पानी वाले इलाकों में भी आराम से रहता है। इसकी अतिरिक्त जड़ें इसे पानी में खड़े रहने में मदद करती है। यह बाड़ वाले इलाकों में भी पनप जाता है।

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{आचार्य बालकृष्ण, आयुर्वेदिक विशेषज्ञ और पतंजलि योगपीठ के संस्थापक स्तंभ हैं। चार्य बालकृष्ण जी एक प्रसिद्ध विद्वान और एक महान गुरु है, जिनके मार्गदर्शन और नेतृत्व में आयुर्वेदिक उपचार और अनुसंधान ने नए आयामों को छूआ है।}