सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग पर असर क्यों नहीं….?

अनिल जैन

देश का चुनाव आयुक्त कैसा हो, क्या ऐसा हो कि घुटने पर झुक जाए, प्रधानमंत्री के खिलाफ आरोप लगे तो कार्रवाई करने से नहीं हिचके या दबाव पड़ने पर हां में हां मिलाता रहे।दूसरे राज्यों में चुनाव के दौरान जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी के दूसरे नेता आदर्श आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए चुनाव प्रचार करते हैं और चुनाव आयोग मूकदर्शक बना रहता है, वैसा ही बल्कि उससे भी ज़्यादा गुजरात में हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक सप्ताह पहले ही चुनाव आयोग की विवादास्पद और पक्षपातपूर्ण कार्यशैली को लेकर बेहद सख्त टिप्पणियां करते हुए कहा था कि देश को साहसी और खुद्दार चुनाव आयोग की जरूरत है। इतनी कठोर टिप्पणी का भी चुनाव आयोग पर कोई असर होता नहीं दिख रहा है। गुजरात में जारी विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया के दौरान स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार के राजनीतिक सहयोगी की भूमिका निभाते हुए अपने पुराने ढर्रे पर ही काम कर रहा है। जिस तरह दूसरे राज्यों में चुनाव के वक्त चुनाव आयोग के होने का कोई मतलब नहीं होता वैसे ही गुजरात में भी इस समय चुनाव आयोग के होने का कोई मतलब नहीं है। दूसरे राज्यों में चुनाव के दौरान जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी के दूसरे नेता आदर्श आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए चुनाव प्रचार करते हैं और चुनाव आयोग मूकदर्शक बना रहता है, वैसा ही बल्कि उससे भी ज्यादा गुजरात में हो रहा है। कल यानी गुरुवार को सूबे में पहले चरण का मतदान हुआ और कल ही प्रधानमंत्री ने अहमदाबाद में सबसे बड़ा रोड शो किया। 

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि रोड शो साढ़े तीन बजे शुरू हुआ। किसी भी चुनाव की तरह इस चुनाव में भी दोपहर बाद का यह वह समय था जब मतदान चरम पर था और टीवी चैनलों पर मोदी-मोदी के नारे गूंज रहे थे। रोड शो की रिपोर्टिंग के नाम पर टीवी चैनलों के रिपोर्टर और एंकर भी भाजपा का चुनाव प्रचार कर रहे थे। चुनाव आयोग की नजर में यह आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि मोदी का रोड शो दूसरे चरण में होने वाले मतदान के लिए है। सवाल है कि आखिर मतदान वाले दिन ही प्रधानमंत्री का रोड शो क्यों? हर चुनाव की तरह गुजरात विधानसभा चुनाव के समय भी आदर्श आचार संहिता लागू है। लेकिन यह आदर्श आचार संहिता नियमित रूप से तार-तार हो रही है। आचार संहिता हर दल पर लागू होती है, चाहे वो सत्तारूढ़ पार्टी का प्रधानमंत्री हो या विपक्षी शासित राज्य का मुख्यमंत्री चुनाव वाले राज्य में प्रचार करने गया हो। लेकिन मतदान से एक दिन पहले या मतदान वाले दिन रोड शो या रैली करने को प्रधानमंत्री मोदी ने अपना ‘विशेषाधिकार’ मान लिया है और चुनाव आयोग ने भी उन्हें आचार संहिता या किसी भी नियम-कायदे परे मान कर एक तरह से उनके इस ‘विशेषाधिकार’ को मान्यता दे रखी है।

2014 के आम चुनाव के बाद से लेकर अब तक जितने भी चुनाव (राज्यों में विधानसभा के चुनाव और 2019 का लोकसभा चुनाव) हुए हैं उनमें प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी ने आदर्श आचार संहिता का खुल कर मखौल उड़ाया है। हर चुनाव में मोदी ने चुनाव वाले राज्य में मतदान के दिन रोड शो या रैली की है लेकिन चुनाव आयोग ने न तो अपनी ओर से कोई कार्रवाई की और न ही विपक्षी दलों की ओर से मिली शिकायतों को अपने संज्ञान में लिया। हर चुनाव में मतदान की तारीखों का निर्धारण प्रधानमंत्री की सुविधा और प्रचार के लिए उपलब्धता को ध्यान में रख कर करने का भी चुनाव आयोग ने अघोषित रिवाज बना लिया है। 2014 से लेकर अब तक हुए चुनावों में कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी ने प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर चुनाव आयोग को कई ज्ञापन दिए लेकिन कोई कार्रवाई करना तो दूर चुनाव आयोग एक बार भी चेतावनी तक जारी नहीं कर सका। हां, विपक्षी दलों के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत मिलने पर चुनाव आयोग ने चेतावनी जारी करने में जरा भी देरी नहीं की।

बहरहाल गुजरात में अभी जो हो रहा है, उसमें भी नया कुछ नहीं है। इतिहास खुद को दोहरा रहा है। प्रधानमंत्री ने पहले चरण के मतदान वाले दिन अहमदाबाद में रोड शो किया। चूंकि चुनाव आयोग ने उनके ऐसे रोड शो पर पहले कभी ऐतराज नहीं किया, लिहाजा यह मान लिया गया गया कि इसमें कुछ गलत नहीं है या फिर ऐसा करना प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है। इस स्थिति को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह बेहद तल्ख टिप्पणी की थी। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की मांग करने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मौजूदा दौर देश को ऐसे चुनाव आयोग की जरूरत है जो प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायत मिलने पर उनके खिलाफ भी कार्रवाई करने की हिम्मत दिखा सके। 

आदर्श आचार संहिता राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को ऐसी किसी गतिविधि से भी रोकती है जो समुदायों के बीच तनाव की वजह बन सकती है या तनाव को बढ़ा सकती है। आचार संहिता वोट हासिल करने के लिए जातीय, धार्मिक और साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने वाली अपील करने से भी रोकती है। लेकिन इस रोक का भी गुजरात में कोई मतलब नहीं है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के तमाम नेता व उम्मीदवार खुलेआम अपनी चुनावी रैलियों में मुस्लिम समुदाय को निशाना बना कर विभाजनकारी भाषण दे रहे हैं। गुजरात के ग्रामीण इलाकों में मोदी के पुराने भाषणों के वीडियो बड़ी-बड़ी स्क्रीन लगा कर दिखाए-सुनाए जा रहे हैं, जिन्हें भाजपा का समर्थक वर्ग ही नहीं बल्कि चुनाव आयोग भी मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा है। अमित शाह ने खेड़ा जिले में 25 नवंबर को एक चुनावी रैली में 2002 के गुजरात दंगों की याद दिलाई और कहा कि हमने दंगाइयों को सबक सिखा दिया, इसलिए अब यहां कोई दंगा नहीं होता। अमित शाह क्या कहना चाह रहे थे और इशारा क्या था, इसे हर कोई समझ रहा है। कोई नहीं समझ रहा है तो वह है सिर्फ चुनाव आयोग। पूर्व केंद्रीय सचिव ईएएस सरमा समेत कई पूर्व नौकरशाहों ने अमित शाह के इस भाषण पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि यह आईपीसी की धारा 153 ए का उल्लंघन है। देश के कई प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ताओं, नागरिक अधिकार संगठनों और वरिष्ठ पूर्व नौकरशाहों ने अमित शाह के खिलाफ चुनाव आयोग से कार्रवाई की मांग की है, लेकिन चुनाव आयोग शुतुरमुर्ग बना हुआ है। उसने कोई कार्रवाई करना तो दूर प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी तक नहीं की है। 

प्रधानमंत्री मोदी भी अपनी चुनावी रैलियों में आतंकवाद और कट्टरपन का बार-बार जिक्र कर रहे हैं और कह रहे हैं कि गुजरात के युवकों को आतंकवाद से बचाना है। सवाल है कि जो चुनाव गुजरात मॉडल और विकास के मुद्दे पर लड़ा जाना चाहिए, उसमें आतंकवाद और कट्टरपन का जिक्र करके किस तरह इशारा किया जा रहा है। मोदी इससे पहले भी गुजरात के हर चुनाव में इसी तरह के मुद्दे उठाते रहे हैं। 2017 के चुनाव में तो उन्होंने सीधे-सीधे कहा था कि ”अगर कांग्रेस जीती तो मियां अहमद पटेल मुख्यमंत्री बन जाएंगे और उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की योजना पाकिस्तान में बनी है।’’ इस सिलसिले में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भी यह निराधार आरोप लगाया था कि उन्होंने इस बारे में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत के साथ बैठक की है। मोदी इस भड़काऊ गलतबयानी पर पर उस समय भी चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। बाद में इस झूठे आरोप के लिए तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में माफी भी मांगी थी।

2019 के चुनाव में तो प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह पूरे समय चुनाव आचार संहिता का मखौल उड़ाते हुए पुलवामा बम कांड में शहीद हुए सैनिकों के नाम पर वोट मांगते रहे। कांग्रेस ने मोदी और शाह के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत की थी कि इन लोगों ने पुलवामा के शहीदो के नाम पर वोट मांगे। यह सामान्य आरोप नहीं था, लेकिन चुनाव आयोग आंख और कान बंद करके बैठा रहा। फिक्र है। इसलिए अब लोग अगर चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त और संवैधानिक संस्था को सत्तारूढ़ दल के गठबंधन का सदस्य कह रहे हैं या सुप्रीम कोर्ट उसे सरकार की कठपुतली करार दे रहा है तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं हैं। हैरानी की बात तो यही है कि इतनी कठोर टिप्पणियों के बाद भी चुनाव आयोग और सरकार को शर्म स्पर्श तक नहीं कर पा रही है।

————- (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)

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