शोषितों एवं मजलूमों के हिमायती थे जगदेव-भीमराज

लखनऊ। वैभव अकादमी पटेल नगर इंदिरा नगर लखनऊ में खत्तिय पंचशील महासभा द्वारा बाबू जगदेव प्रसाद का शहीदी दिवस एवं बौद्ध सेमिनार का संयुक्त रुप से आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में इंजीनियर भीमराज साहब ने अपने विचार रखते हुए कहा कि बिहार के लेनिन कहे जाने वाले जगदेव प्रसाद का जन्म 02 फरवरी 1922 को गया जिला अरबल के कुरहरी गांव में हुआ था। 1955 में हैदराबाद जाकर इंग्लिश वीकली “सिटीजन” तथा हिंदी वीकली “उदय” का संपादन प्रारंभ किया। उनकी पत्रिकाओं में छपे क्रांतिकारी तथा ओजस्वी विचारों से पत्रिकाओं का सरकुलेशन लाखों की संख्या में पहुंच गया। उन्हें धमकियों का सामना भी करना पड़ा। प्रकाशक से भी उनका मनमुटाव हुआ, पर उन्होंने अपने सिद्धांतों के प्रति कभी समझौता नहीं किया। अतः उन्होंने संपादक के पद से त्यागपत्र दे दिया। बाद में वह बिनोवा भावे की भूदान आंदोलन में सम्मिलित हुए, इस आंदोलन में सम्मिलित होकर जमीदारों का हृदय परिवर्तन कराकर जो जमीन प्राप्त की गई थी, वह पूर्णतया ऊसर बंजर थी। इसे भूमिहीन गरीबों में बांटा गया, गरीबों ने खून पसीना एक करके उसे उपजाऊ बनाया। लेकिन भूसामंतो ने उनकी आवंटित जमीन को हडपना शुरू कर दिया। उसके लिए अनुसूचित जाति के लोगों के साथ मारपीट की गयी। इसके बाद उन्होंने विनोवा भावे का भी साथ छोड़ दिया ।1967 तथा 1969 में विधायक चुने गए और मंत्री भी बने।

जब संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने सिद्धांतों का पालन नहीं किया तो उन्होंने इसका विरोध किया। और फिर इस पार्टी को छोड़कर 25 अगस्त 1967 को एक नए राजनीतिक दल के रूप में “शोषित दल” की स्थापना की और इस दल की सरकार भी बनी। इस दल के गठन के समय “शोषित साप्ताहिक” का सफल संपादन किया। इनकी कलम आग जलती रही। अपने मंत्रित्वकाल में जमीन हडपो की तरह “पद हडपो” का भी नारा दिया। जिससे शोषको में तहलका मच गया। इसीलिए उनको बिहार का लेनिन कहा जाता है। इसके बाद 1968 में अर्जक संघ में शामिल हो गए। इसी समय बिहार में कांग्रेस की तानाशाही सरकार के विरुद्ध जे•पी• के नेतृत्व में छात्र आंदोलन शुरू हो गए। और फिर राजनीति एक नई दिशा का सूत्रपात हुआ। लेकिन जगदेव प्रसाद जी ने छात्र आंदोलन की सहमति नहीं दी। इसके स्थान पर उन्होंने इस छात्र को आंदोलन को “जन आंदोलन”का रूप देने के लिए मई 1974 को 6 सूत्री मांगों के लिए संपूर्ण बिहार प्रदेश में जनसभाएं आहूत की ,तथा सरकार पर दबाव भी डाला गया, लेकिन भ्रष्ट प्रशासन तथा सरकार पर कोई असर नहीं हुआ।

जिससे 05 सितंबर 1974 को प्रदेश व्यापी सत्याग्रह प्रारंभ किया। इसी दिन में हजारों की संख्या में शोषित समाज का नेतृत्व करते हुए अपने दल का काला झंडा लेकर आगे बढ़े तो सत्याग्रह को पुलिस ने रोका तो उन्होंने उसका विरोध किया, जिससे वे पूर्व नियोजित जाल मे फंस गये, और अचानक उनको पुलिस की गोली लगी जिससे गिर पड़े और उनकी 5 सितंबर 1974 को थाने के अंदर शहीद हो गए। आज वर्तमान में अगर हम बाबू जगदेव सिंह कुशवाहा की बात करते हैं तो उन्होंने अनुसूचित जातियों एवं पिछड़ों के लिए लड़ाई लड़ी, हम अगर उनके सपनों का भारत बनाना चाहते हैं तो हम तथागत भगवान बुद्ध एवं डॉ• भीमराव अंबेडकर के सिद्धांतों पर चलने की सपथ ले, तभी बहुसंख्यक समुदाय की शासन प्रसाशन मे संख्या के आधार पर भागीदारी होगी। कार्यक्रम के मुख्य आयोजक डा• सी• पी• सिंह रहे।