लाउडस्पीकर, सियासत और गांधी जी

लाउडस्पीकर, सियासत और गांधी जी- कभी बापू ने सुझाया था हिंदू-मुसलमानों को यह रास्ता।महात्मा गांधी ने अपनी एक प्रार्थना सभा में दोनों संप्रदायों से कहा था———

शिव कुमार शौर्य

“मुसलमानों को यह नहीं सोचना चाहिए कि वे हिन्दुओं को मस्जिदों के सामने से बाजा बजाते हुए या आरती करते हुए निकलने से जबरदस्ती रोक सकते हैं। उन्हें हिन्दुओं को अपना दोस्त बनाना चाहिए और विश्वास रखना चाहिए कि हिन्दू भाई अपने मुसलमान भाइयों की भावनाओं का ख़्याल ज़रूर रखेंगे। दूसरी तरफ हिन्दुओं को भी समझना चाहिए कि मुसलमान भाइयों के पीछे पड़े रहने से कुछ भी नहीं बनेगा।गांधी जी ने अपने सम्पूर्ण लेखन में इस मुद्दे को बार बार उठाया।

गांधी वांग्मय के भाग 24 में पृष्ठ 156 पर गांधी जी कहते हैं- —-

“मस्जिदों के सामने बाजे बजाने और मंदिरों में आरती के मुद्दे पर मैनें काफी सोच विचार किया है। जिस तरह गौ हत्या हिंदुओं के लिए क्षोभ का विषय है, उसी तरह आरती और बाजे मुसलमानों के लिए। जिस तरह हिंदू जबरदस्ती मुसलमानों से गौ हत्या बंद नहीं करा सकते,उसी तरह मुसलमान तलवार के दम पर बाजे और आरती बंद नहीं करा सकते। उन्हें भी हिंदुओं की भलमनसाहत का भरोसा करना चाहिए। एक हिंदू होने के नाते मैं हिंदू भाइयों को सलाह देना चाहूंगा कि सौदा करने की भावना न रखकर उन्हें मुसलमान भाइयों की भावना का ध्यान रखना चाहिए। मैने सुना है कि कई जगह हिंदू भाई जानबूझकर चिढ़ाने के लिए ठीक नमाज के वक्त आरती शुरू कर देते हैं।

यह विवेकहीन और अमैत्रीपूर्ण कृत्य है। मित्रता तो यह मानकर ही आगे चलती है कि उस मित्र की भावनाओं का ध्यान रखा जाएगा ।फिर भी मुसलमानों को हिंदुओं के बाजे ज़ोर जबरदस्ती से रोकने की कोशिश नहीं करना चाहिए। मारपीट की धमकी या मारपीट के डर से किसी काम को न करना अपने आत्म सम्मान और धार्मिक विश्वास को तिलांजलि देने जैसा है, पर जो आदमी स्वयं किसी धमकी से नहीं डरता,वह अपना व्यवहार भी ऐसा रखेगा ,जिससे किसी को चिढ़ने का मौका न आए और संभव हुआ तो वह ऐसा अवसर आने ही नहीं देगा ।

आज़ादी के क़रीब दो महीने बाद तेईस अक्टूबर को अपनी प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी कहते हैं——-

सारे धर्मों की मंज़िल एक ही है। उस मंज़िल तक पहुंचने के लिए हम बेशक़ अलग-अलग रास्ते ले सकते हैं। उसमें लड़ना किस बात का। वह लड़ाई ईश्वर के ख़िलाफ़ है ,जिसमें भाई-भाई को मारता है। जिस अंधेरे में भाई-भाई को नहीं देख सकता, उस अंधेरे का अंधा तो खुद अपने को ही नहीं देखता। जिस उजाले में भाई-भाई को देख सकता है ,उसमें ही ईश्वर का चेहरा दिखाई देता है। जब भाई के प्रेम में दिल भीग जाता है, तब अपने आप ईश्वर को प्रणाम करने के लिए हाथ जुड़ जाते हैं।

आज के भारत में जिस तरह सांप्रदायिक उन्माद और नफ़रत का ज्वार अपना विकराल आकार ले चुका है,वह चिंता में डालता है।दरअसल यह उस जिन्न की तरह है,जो किसी बोतल में बंद था और बाहर आ चुका है।यह ग़ुस्सैल जिन्न अब विध्वंस पर आमादा है। कोई नहीं जानता कि इसे वापस बोतल में कैसे बंद किया जाएगा। मगर किसी भी क़ीमत पर भारत में इसे नियंत्रित करना ज़रूरी है।यदि ऐसा नहीं होता तो ,तो इस निष्कर्ष पर पहुँचने से कौन इनकार करेगा कि आस्तिक भारतीय समाज ईश्वर से ही विद्रोह कर बैठा है।