भारतीय राजनीति में जाति सर्वोपरि

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भारतीय राजनीति में जाति सर्वोपरि
भारतीय राजनीति में जाति सर्वोपरि
राजू यादव
राजू यादव

भारतीय राजनीति के प्रमुख मुद्दों में जातिवाद सर्वोपरि है। जाति किसी न किसी प्रकार हमारी राजनीति को भी प्रभावित करती है। संविधान निर्माण के समय से ही इनमें कुछ सुधार किये जा रहे हैं। कभी किन्हीं राजनेताओं के द्वारा तो कभी सुधार प्रस्ताव के द्वारा जातिवाद नामक मानसिकता को सुधारने का प्रयास किया जाता रहा है। इसका गवाह इतिहास स्वयं है। आज राजनीति में या मनुष्य के जीवन को यदि सबसे ज्यादा प्रभावित कुछ करता है।तो वह है “जातिवाद”।जातिवाद की जड़े प्राचीनकाल से ही भारतीय राजनीति में जमी हुई है। इसे निकाल फेंकने का प्रयास भर मानव मात्र नहीं कर पाया है। तमाम प्रयासों के बावजूद भी भारतीय राजनीति में जाति अपनी जड़ों को जमाये हुए हैं। जो वर्तमान राजनीति में एक भयंकर बीमारी का रूप ले चुकी है। हमारे समाज में एक बड़ी ही व्यापक और मुख्य भूमिका अति पिछड़ों तथा दलितों की है। दलितों की हमारे जीवन में प्राचीन काल से ही विशेष भूमिकाएँ रही हैं।ये समाज के ऐसे वर्ग है, जो अपना एक अलग महत्व रखते हैं। भारतीय राजनीति में जाति सर्वोपरि

“भारत में जाति और राजनीति में आपसी संबंध को समझने के लिए इन बिन्दुओं को समझना आवश्यक होगा। भारत में सामाजिक व्यवस्था का संगठन ही जाति के आधार पर हुआ है। राजनीति केवल सामाजिक संबंधों की अभिव्यक्ति मात्र है, इसलिए सामाजिक व्यवस्था राजनीति का स्वरूप निर्धारित करती है। लोकतांत्रिक समाज में राजनीतिक प्रक्रिया जातीय संरचनाओं को इस प्रकार प्रयोग में लाती है, ताकि उनके सहयोग और समर्थन के द्वारा अपनी राजनीतिक स्थिति को और भी अधिक मजबूत बना सके। भारतीय राजनीति सदैव ‘ जाति ‘ के इर्द – गिर्द घूमती है, यदि किसी व्यक्ति विशेष को राजनीति में सफलता चाहिए तो वह किसी संगठित जाति का सहारा लेता है। वर्तमान समय में जाति विशेष का संगठन ही ज्यादातर राजनीति में भाग ले रही है। अतः स्पष्ट है कि वर्तमान में जाति का विशेष महत्व राजनीति में है। समाज के विभिन्न वर्गों तथा जातियों का समर्थन पाने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन के नेता उन सब संस्थानों के खिलाफ थे।”

एक ओर यह लोगों को एक अलग पहचान का आधार प्रदान करता है तो दूसरी ओर यह लोगों के बीच दिवाल भी बनकर खड़ी हो गई है। आज यह देश की राजनीति का भी बहुत प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा है। नेताओं द्वारा जाति की राजनीति आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास का बहुत बड़ा पहलू है। जाति के इतिहास और भारत पर पड़ रहे इसके प्रभाव को जानना अति आवश्यक है। इसके लिए हमें जाति और साथ ही साथ इसे जन्म देने वाली वर्ण व्यवस्था को समझना ज़रूरी है।भारतीय राजनीति में जातिवाद जिनकी प्रवृत्ति भारतीय जनता को विभाजित करने की थी। लोगों द्वारा विशाल जनसभाओं और सत्याग्रह संघर्षो में सामूहिक रूप से भाग लेने से जाति चेतना बिल्कुल कमजोर गयी थी।

भारतीय समाज जातिगत भेद-भाव जैसे भयानक बीमारियों से जकड़ा हुआ है। इसका गंभीर बीमारी का निदान खोज पाना कठिन मालुम पड़ता है। यह केवल व्यक्ति-व्यक्ति के बीच खाई पैदा नहीं कर रही बल्कि राष्ट्रीय एकता के मार्ग में भी बाधा पहुंचाने का कार्य कर रही है। जातिवाद भारत का एक ऐसा घटक बन गया है जो इसकी संरचना में बहुत गहराई में जा बसा है। भारतीय समाज में यह संरचना इतनी गहरी है कि आज जाति व्यक्ति के नाम, पहचान का प्रमुख हिस्सा हो गया है। भारत में हर छोटी से छोटी जाति अपने से नीचे वाली जाति खोज लेती है। अतः यह एक जटिल और व्यापक व्यवस्था है। इसका प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में भारतीय समाज पर पड़ता है।

हमारे देश के बुद्धिजीवी और राजनीतिक नेता इस संदर्भ में ईमानदारी पूर्वक एक साथ मिलकर इसे मिटाने के लिए कार्य करें। भारतीय राजनीति में जातिवादी व्यवस्था देश के विकास में बाधक है। हम सबको मिलजुल कर इसे मिटाना होगा। समाज में दबे कुचले लोगों को सही शिक्षा का अवसर देकर उन्हें साथ लेकर कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना होगा। देश का विकास तभी संभव होगा। भारतीय राजनीति में जाति सर्वोपरि